तुलसीदास के दोहे - Tulsidas Ke Dohe
तुलसीदास के दोहे मध्यकालीन हिंदी साहित्य की वे दो पंक्तियाँ हैं जिनमें नीति, भक्ति और व्यावहारिक जीवन-ज्ञान एक साथ समाया है। गोस्वामी तुलसीदास (1511-1623) ने रामचरितमानस, दोहावली, विनय पत्रिका और कवितावली में सैकड़ों दोहे रचे। इस पेज पर आप 32 प्रसिद्ध दोहे और चौपाइयाँ सरल हिंदी भावार्थ के साथ पढ़ सकते हैं।
तुलसी का दोहा आज भी इसलिए पढ़ा जाता है क्योंकि वह उपदेश नहीं देता, अनुभव बाँटता है। मीठी वाणी, संगति, धैर्य, लोभ और भरोसे जैसे विषय हर पीढ़ी के काम आते हैं। नीचे दोहे विषय के अनुसार बाँटे गए हैं, ताकि आप अपनी ज़रूरत का दोहा तुरंत ढूँढ सकें।
तुलसीदास के दोहे आज भी क्यों पढ़े जाते हैं
तुलसीदास के दोहे आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे धार्मिक उपदेश से ज़्यादा व्यावहारिक जीवन-सूत्र हैं। वाणी, संगति, लोभ, धैर्य और नेतृत्व जैसे विषय समय के साथ नहीं बदलते। यही कारण है कि ये दोहे स्कूल की पाठ्यपुस्तकों से लेकर रोज़मर्रा की बातचीत तक जीवित हैं।
तुलसी ने अवधी और ब्रज जैसी लोकभाषाओं को चुना, संस्कृत को नहीं। संस्कृत के प्रकांड विद्वान होने के बावजूद उन्होंने आम आदमी की भाषा में लिखा। इसी फ़ैसले ने उनके दोहों को गाँव-गाँव तक पहुँचाया।
दूसरी वजह उनका रूपक-कौशल है। शरीर को खेत, मन को किसान, संपत्ति को छाया और राम-नाम को दीपक कहना - ये चित्र पाठक के दिमाग़ में तुरंत बैठ जाते हैं। आलोचकों ने इसीलिए उन्हें उपमा और रूपक का सम्राट कहा है।
📜 जल्दी में हैं? नीचे विषय के अनुसार सीधे जाएँ: नीति के दोहे • कर्म और धैर्य • भक्ति और राम नाम • चौपाइयाँ
गोस्वामी तुलसीदास का संक्षिप्त परिचय
गोस्वामी तुलसीदास 16वीं-17वीं सदी के रामभक्त कवि थे, जिनका जन्म 11 अगस्त 1511 को उत्तर प्रदेश के सोरों गाँव में हुआ माना जाता है। उनका बचपन का नाम रामबोला था। उन्होंने रामचरितमानस और हनुमान चालीसा जैसे ग्रंथ रचे, जो आज भी उत्तर भारत के घर-घर में पढ़े जाते हैं।
विकिपीडिया के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने 2012 में सोरों को आधिकारिक रूप से तुलसीदास का जन्मस्थान घोषित किया था। उनके माता-पिता हुलसी और आत्माराम दुबे थे। रामचरितमानस की रचना उन्होंने अयोध्या में शुरू की और दो वर्ष, सात महीने और छब्बीस दिन में यह ग्रंथ पूरा हुआ।
तुलसीदास के समकालीन विद्वान मधुसूदन सरस्वती ने रामचरितमानस पढ़कर उन्हें काशी का चलता-फिरता तुलसी का पौधा कहा था। अकबर के नवरत्न रहीम उनके निजी मित्र थे।
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नीति और व्यवहार पर तुलसीदास के दोहे अर्थ सहित
नीति के दोहों में तुलसीदास बताते हैं कि इंसान को दूसरों से कैसे पेश आना चाहिए। इनमें मीठी वाणी, दया, विनम्रता और सही जगह पर समय लगाने की सीख है। ये आठ दोहे तुलसी के सबसे ज़्यादा उद्धृत किए जाने वाले नीति-दोहों में गिने जाते हैं।
1.
तुलसी इस संसार में, भाँति भाँति के लोग। सबसे हँस मिलिए, नदी नाव संजोग॥
भावार्थ: दुनिया में हर तरह के स्वभाव के लोग हैं। सबसे प्रेम से मिलिए और बात कीजिए। जैसे नाव और नदी का साथ थोड़ी देर का होता है, वैसे ही यह जीवन-संग भी अस्थायी है। कड़वाहट पालने का समय ही किसके पास है।
2.
तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर। बसीकरन इक मंत्र है, परिहरु बचन कठोर॥
भावार्थ: मीठे बोल से चारों ओर सुख फैलता है। यही किसी को अपना बनाने का असली मंत्र है। इसलिए कठोर वचन छोड़ दीजिए। तुलसी यहाँ चापलूसी नहीं, सम्मानजनक भाषा की बात कर रहे हैं।
3.
आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह। तुलसी तहाँ न जाइये, कंचन बरसे मेह॥
भावार्थ: जहाँ आपके पहुँचने पर लोग ख़ुश न हों और आँखों में स्नेह न दिखे, वहाँ मत जाइए, चाहे वहाँ सोने की बारिश ही क्यों न हो रही हो। आत्मसम्मान की क़ीमत किसी लाभ से नहीं चुकाई जा सकती।
4.
दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान। तुलसी दया न छाँड़िए, जब लग घट में प्रान॥
भावार्थ: दया धर्म की जड़ है और अभिमान पाप की जड़। जब तक शरीर में प्राण हैं, दया का भाव मत छोड़िए। तुलसी के लिए धार्मिक होने की पहली शर्त कर्मकांड नहीं, करुणा है।
5.
तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक। साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसो एक॥
भावार्थ: मुसीबत में सात चीज़ें साथ देती हैं - विद्या, विनम्रता, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, सत्य पर टिके रहना और राम पर भरोसा। यह दोहा संकट-प्रबंधन की पूरी सूची है, जिसे आज भी जीवन-कौशल की तरह पढ़ा जा सकता है।
6.
मुखिया मुखु सो चाहिऐ, खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अँग, तुलसी सहित बिबेक॥
भावार्थ: परिवार या समाज का मुखिया मुँह जैसा होना चाहिए। मुँह खाता-पीता अकेला है, पर पोषण पूरे शरीर को देता है। नेतृत्व की यह परिभाषा प्रबंधन की किताबों में आज भी उद्धृत होती है।
7.
सचिव बैद गुरु तीनि जौं, प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर, होइ बेगिहीं नास॥
भावार्थ: मंत्री, वैद्य और गुरु - ये तीनों अगर डर या लालच में आकर सिर्फ़ मीठी बात करें तो राज्य, धर्म और शरीर तीनों जल्दी नष्ट हो जाते हैं। सच बोलने वाला सलाहकार ही असली सलाहकार है।
8.
तुलसी देखि सुबेषु, भूलहिं मूढ़ न चतुर नर। सुंदर केकिहि पेखु, बचन सुधा सम असन अहि॥
भावार्थ: अच्छे कपड़ों से समझदार आदमी धोखा नहीं खाता, मूर्ख खा जाता है। मोर को देखिए - बोली अमृत जैसी मीठी है, पर भोजन साँप है। बाहरी रूप और भीतरी स्वभाव अलग हो सकते हैं।
कबीर के दोहों में यही व्यावहारिक तीखापन और भी सीधा मिलता है। तुलना करके पढ़ना हो तो कबीर के दोहे पढ़िए।
कर्म, समय और धैर्य पर तुलसीदास के दोहे
कर्म से जुड़े दोहों में तुलसीदास यह समझाते हैं कि फल बीज के अनुसार मिलता है और परिस्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती। इन दोहों का स्वर उपदेश का कम, चेतावनी का ज़्यादा है। ये आठ दोहे धैर्य, समय और लोभ पर केंद्रित हैं।
9.
तुलसी काया खेत है, मनसा भयो किसान। पाप पुन्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान॥
भावार्थ: शरीर खेत है और मन किसान। पाप और पुण्य दो बीज हैं। जो बोएँगे, अंत में वही काटना पड़ेगा। कर्म-सिद्धांत को इससे सरल रूपक में शायद ही किसी ने कहा हो।
10.
दिएँ पीठि पाछें लगै, सनमुख होत पराइ। तुलसी संपति छाँह ज्यों, लखि दिन बैठि गँवाइ॥
भावार्थ: संपत्ति छाया जैसी है। पीठ करके चलो तो पीछे-पीछे आती है, पकड़ने दौड़ो तो भागती है। धन के पीछे भागने में दिन गँवाने से बेहतर है अपना काम ईमानदारी से करते रहना।
11.
तुलसी पावस के समय, धरी कोकिलन मौन। अब तो दादुर बोलिहैं, हमें पूछिहैं कौन॥
भावार्थ: बरसात में कोयल चुप हो जाती है, क्योंकि तब मेंढक टर्राते हैं और उनकी आवाज़ में कोयल को कौन सुने। समय अनुकूल न हो तो चुप रहना कमज़ोरी नहीं, समझदारी है।
12.
तुलसी भरोसे राम के, निर्भय होके सोय। अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होय॥
भावार्थ: राम पर भरोसा रखकर निश्चिंत सो जाइए। जो होना नहीं है वह होगा नहीं, और जो होना है उसे कोई रोक नहीं सकता। यह दोहा चिंता और तैयारी के बीच का फ़र्क़ बताता है।
13.
ग्यानी तापस सूर कबि, कोबिद गुन आगार। केहि कै लोभ बिडंबना, कीन्ह न एहिं संसार॥
भावार्थ: ज्ञानी, तपस्वी, वीर, कवि, पंडित और गुणों का भंडार - इस संसार में ऐसा कौन है जिसकी लोभ ने दुर्गति न की हो। तुलसी लोभ को सबसे बराबरी वाला दोष मानते हैं, जो किसी को नहीं छोड़ता।
14.
तुलसी जसि भवतब्यता, तैसी मिलइ सहाइ। आपुनु आवइ ताहि पहिं, ताहि तहाँ लै जाइ॥
भावार्थ: जैसी होनी होती है, वैसी ही मदद मिल जाती है। कभी सहायक ख़ुद चलकर आ जाता है, कभी परिस्थिति आपको वहाँ ले जाती है। संयोग को तुलसी अंधा नहीं, दिशा वाला मानते हैं।
15.
सूर समर करनी करहिं, कहि न जनावहिं आपु। बिद्यमान रन पाइ रिपु, कायर कथहिं प्रतापु॥
भावार्थ: वीर युद्ध में काम करके दिखाते हैं, अपनी बड़ाई नहीं करते। कायर दुश्मन को सामने देखकर भी सिर्फ़ अपने पराक्रम की कहानियाँ सुनाते हैं। काम बोले, ज़ुबान नहीं।
16.
तुलसी अदभुत देवता, आसा देवी नाम। सेएँ सोक समर्पई, बिमुख भएँ अभिराम॥
भावार्थ: आशा नाम की एक अनोखी देवी है। इसकी सेवा करो तो दुख देती है, इससे मुँह मोड़ लो तो सुख देती है। यहाँ आशा का अर्थ है अंतहीन लालसा, न कि उम्मीद।
भक्ति और राम नाम पर तुलसीदास के दोहे
भक्ति के दोहों में तुलसीदास राम-नाम को साधन भी मानते हैं और साध्य भी। इन दोहों में कर्मकांड की जगह विश्वास, प्रेम और सरलता पर ज़ोर है। ये आठ दोहे तुलसी की भक्ति-दृष्टि का सार हैं।
17.
राम नाम मनिदीप धरु, जीह देहरीं द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौं चाहसि उजिआर॥
भावार्थ: अगर भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहते हो तो जीभ रूपी देहरी पर राम-नाम का मणि-दीपक रख दो। जीभ को दरवाज़े की चौखट कहना तुलसी के सबसे सुंदर रूपकों में से एक है।
18.
राम नाम अवलंब बिनु, परमारथ की आस। बरसत बारिद बूँद गहि, चाहत चढ़न अकास॥
भावार्थ: राम-नाम के सहारे बिना परमार्थ पाने की उम्मीद ऐसी है जैसे कोई बरसती बूँदों को पकड़कर आसमान पर चढ़ना चाहे। बिना आधार के ऊँचाई नहीं मिलती।
19.
बिनु बिस्वास भगति नहिं, तेहि बिनु द्रवहिं न रामु। राम कृपा बिनु सपनेहुँ, जीव न लह बिश्रामु॥
भावार्थ: विश्वास के बिना भक्ति नहीं होती, भक्ति के बिना राम पिघलते नहीं, और उनकी कृपा के बिना जीव को सपने में भी शांति नहीं मिलती। तुलसी की पूरी भक्ति-श्रृंखला की पहली कड़ी विश्वास है।
20.
तुलसी ममता राम सों, समता सब संसार। राग न रोष न दोष दुख, दास भए भव पार॥
भावार्थ: जिनका लगाव सिर्फ़ राम से है और बाक़ी सारे संसार से समान भाव है, जिनमें राग, क्रोध, दोष और दुख नहीं - वे भक्त संसार-सागर पार कर जाते हैं।
21.
तुलसी सब छल छाँड़िकै, कीजै राम सनेह। अंतरपट को दूरि करि, जो देखे सब देह॥
भावार्थ: सारे छल छोड़कर सच्चे मन से राम से प्रेम कीजिए। जो सब कुछ देख ही रहा है, उससे पर्दा रखना बेकार है। दिखावे की भक्ति पर यह सबसे सीधा प्रहार है।
22.
नाम राम को कलपतरु, कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें, तुलसी तुलसीदासु॥
भावार्थ: राम का नाम कल्पवृक्ष है और कलियुग में कल्याण का घर है। तुलसी कहते हैं कि इसी नाम के स्मरण से भाँग जैसा साधारण व्यक्ति तुलसीदास बन गया। यह उनकी विनम्रता का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
23.
जड़ चेतन गुन दोषमय, बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार॥
भावार्थ: ईश्वर ने यह संसार गुण और दोष दोनों से बनाया है। संत हंस की तरह होते हैं, जो दूध ले लेते हैं और पानी छोड़ देते हैं। दृष्टि तय करती है कि आपको क्या मिलेगा।
24.
चित्रकूट के घाट पर, भइ संतन की भीर। तुलसिदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥
भावार्थ: चित्रकूट के घाट पर संतों की भीड़ लगी है। तुलसीदास चंदन घिस रहे हैं और स्वयं राम उनके माथे पर तिलक लगा रहे हैं। किंवदंती के अनुसार यह दोहा हनुमान ने तोते का रूप धरकर कहा था, ताकि तुलसीदास राम को पहचान सकें।
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रामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाइयाँ अर्थ सहित
चौपाई चार चरणों का छंद है, जबकि दोहा दो पंक्तियों का। रामचरितमानस मुख्य रूप से चौपाइयों में लिखी गई है और बीच-बीच में दोहे आते हैं। नीचे दी गई आठ चौपाइयाँ सबसे ज़्यादा उद्धृत होती हैं और अक्सर लोग इन्हें भी दोहा ही समझ लेते हैं।
25. सीय राम मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥ भावार्थ: सारे संसार को सीता और राम से भरा हुआ जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। यह रामचरितमानस के बालकांड की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है।
26. होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ भावार्थ: वही होगा जो राम ने पहले से तय कर रखा है, फिर तर्क करके बात को कौन बढ़ाए। यह पंक्ति स्वीकार-भाव सिखाती है, आलस्य नहीं।
27. धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥ भावार्थ: धैर्य, धर्म, मित्र और जीवनसाथी - इन चारों की असली परख संकट के समय ही होती है। सुख में सब साथ दिखते हैं।
28. जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥ भावार्थ: जहाँ अच्छी बुद्धि होती है वहाँ अनेक प्रकार की संपत्ति आती है, और जहाँ बुरी बुद्धि होती है वहाँ अंत में विपत्ति ही मिलती है। सोच ही परिणाम की जड़ है।
29. गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥ भावार्थ: गुरु के बिना कोई संसार-सागर पार नहीं कर सकता, भले ही वह ब्रह्मा या शंकर के समान क्यों न हो। तुलसी के अपने गुरु नरहरिदास ने ही उन्हें पहली बार रामकथा सुनाई थी।
30. सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधातु सुहाई॥ भावार्थ: अच्छी संगति पाकर दुष्ट भी सुधर जाता है, जैसे पारस के स्पर्श से घटिया धातु भी सोना बन जाती है। संगति को तुलसी सबसे बड़ा सुधार-साधन मानते हैं।
31. जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥ भावार्थ: जिसकी जैसी भावना थी, उसे प्रभु की मूर्ति वैसी ही दिखाई दी। यह पंक्ति धनुष-यज्ञ प्रसंग की है और बताती है कि दुनिया वैसी दिखती है जैसा हमारा मन होता है।
32. हरि व्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥ भावार्थ: ईश्वर हर जगह समान रूप से मौजूद हैं, पर वे प्रेम से ही प्रकट होते हैं - यह मैंने जान लिया है। भक्ति में तुलसी का पूरा ज़ोर प्रेम पर है, विधि पर नहीं।
तुलसीदास के दोहे किन ग्रंथों में मिलते हैं
तुलसीदास के दोहे मुख्य रूप से दोहावली, रामचरितमानस, विनय पत्रिका और कवितावली में मिलते हैं। दोहावली एक शुद्ध दोहा-संग्रह है, जबकि रामचरितमानस में दोहे चौपाइयों के बीच आते हैं। नीचे स्रोत ग्रंथों की तालिका दी गई है।
नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा प्रकाशित सूची में रामचरितमानस, दोहावली, वैराग्य-संदीपनी, बरवै रामायण, पार्वती-मंगल, जानकी-मंगल और रामाज्ञाप्रश्न जैसे ग्रंथ शामिल हैं। इनमें से दोहावली के अधिकांश दोहे रामचरितमानस से भी लिए गए हैं, इसलिए एक ही दोहा दो ग्रंथों में मिल सकता है।
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कबीर और तुलसीदास के दोहों में क्या अंतर है
कबीर और तुलसीदास दोनों भक्तिकाल के कवि थे, पर उनकी धारा अलग थी। कबीर निर्गुण भक्ति के कवि थे और तुलसीदास सगुण राम भक्ति के। कबीर का स्वर विद्रोही है, तुलसी का स्वर मर्यादा और समन्वय का है।
दोनों में एक बात समान है - दोनों ने आम आदमी की भाषा चुनी और दोनों के दोहे लोकजीवन में गीत की तरह घुल गए। यही वजह है कि पाँच सौ साल बाद भी ये दोहे बिना किताब खोले याद रहते हैं।
छात्रों के लिए तुलसीदास के दोहे कैसे याद करें
तुलसीदास के दोहे याद करने का सबसे कारगर तरीक़ा है पहले भावार्थ समझना, फिर लय के साथ बोलकर दोहराना। दोहा 13 और 11 मात्राओं की लय में बँधा होता है, इसलिए गाकर पढ़ने पर यह अपने आप याद हो जाता है। रटने से पहले अर्थ पकड़िए।
काम आने वाले तरीक़े:
- लय पकड़िए: दोहे को चार टुकड़ों में तोड़कर पढ़िए - 13 मात्रा, विराम, 11 मात्रा, विराम। लय पकड़ते ही शब्द जुड़ने लगते हैं।
- विषय से जोड़िए: दोहे को अपने जीवन की किसी घटना से जोड़िए। "आवत ही हरषै नहीं" को किसी ऐसी जगह से जोड़िए जहाँ आपको अच्छा नहीं लगा था।
- रोज़ दो दोहे: एक दिन में दस दोहे रटने से बेहतर है पाँच दिन तक रोज़ दो दोहे। दोहराव ही असली ट्रिक है।
- लिखकर देखिए: मुँह से बोलने के बाद एक बार कॉपी पर लिखिए। परीक्षा में वर्तनी की ग़लती यहीं पकड़ में आती है।
आम ग़लतियाँ जो नंबर काटती हैं:
- अवधी शब्दों को हिंदी बना देना: "बसीकरन" को "वशीकरण" और "बिबेक" को "विवेक" लिखना ग़लत माना जाता है। मूल पाठ जैसा है वैसा ही लिखिए।
- दोहा और चौपाई मिला देना: "सीय राम मय सब जग जानी" चौपाई है, दोहा नहीं। परीक्षा में यह भेद पूछा जाता है।
- भावार्थ में सिर्फ़ अनुवाद: शब्दशः अनुवाद लिख देना काफ़ी नहीं होता। दोहे का निहितार्थ यानी संदेश भी एक पंक्ति में लिखिए।
- ग़लत ग्रंथ बता देना: हर दोहा रामचरितमानस का नहीं होता। कई दोहे दोहावली के हैं। स्रोत पूछे जाने पर सावधान रहिए।
हिंदी कविता की और अच्छी किताबें चुननी हों तो हिंदी कविता की बेहतरीन किताबें वाली सूची देखिए।
मुख्य बातें (Key Takeaways)
- तुलसीदास के दोहे भक्ति के साथ-साथ नीति और व्यावहारिक जीवन-ज्ञान का ख़ज़ाना हैं, इसलिए ये धार्मिक और सामान्य दोनों पाठकों में लोकप्रिय हैं।
- गोस्वामी तुलसीदास का जन्म 11 अगस्त 1511 को सोरों (उत्तर प्रदेश) में हुआ माना जाता है और उन्होंने अवधी तथा ब्रजभाषा में लिखा।
- दोहे मुख्य रूप से दोहावली और रामचरितमानस में मिलते हैं, जबकि विनय पत्रिका पदों में और कवितावली कवित्त में रची गई है।
- दोहा दो पंक्तियों का छंद है और चौपाई चार चरणों की, इसलिए "सीय राम मय सब जग जानी" को दोहा कहना ग़लत है।
- तुलसी की सबसे बड़ी ताक़त उनके रूपक हैं - शरीर को खेत, संपत्ति को छाया और जीभ को देहरी कहना उनके चित्र-कौशल का उदाहरण है।
- कबीर निर्गुण भक्ति के कवि थे और तुलसीदास सगुण राम भक्ति के, यही दोनों के दोहों के स्वर का बुनियादी अंतर है।
- दोहे याद करने का सही क्रम है - पहले भावार्थ, फिर लय, फिर दोहराव। सीधे रटने से परीक्षा में वर्तनी की ग़लतियाँ होती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. तुलसीदास के सबसे प्रसिद्ध दोहे कौन से हैं? तुलसीदास के सबसे प्रसिद्ध दोहों में "तुलसी इस संसार में भाँति भाँति के लोग", "दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान", "तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर" और "चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीर" शामिल हैं। ये चारों दोहे नीति और भक्ति दोनों दृष्टि से सबसे ज़्यादा उद्धृत होते हैं।
Q2. तुलसीदास का जन्म कब और कहाँ हुआ था? अधिकांश जीवनीकारों के अनुसार तुलसीदास का जन्म 11 अगस्त 1511 को उत्तर प्रदेश के सोरों गाँव में हुआ था। उनके माता-पिता हुलसी और आत्माराम दुबे थे। उत्तर प्रदेश सरकार ने 2012 में सोरों को आधिकारिक रूप से उनका जन्मस्थान घोषित किया।
Q3. तुलसीदास ने कुल कितने ग्रंथ लिखे? तुलसीदास के नाम से लगभग बारह प्रामाणिक ग्रंथ जुड़े हैं, जिनमें रामचरितमानस, दोहावली, विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली, जानकी मंगल और पार्वती मंगल प्रमुख हैं। नागरी प्रचारिणी सभा काशी ने इन्हीं रचनाओं को प्रामाणिक माना है।
Q4. दोहा और चौपाई में क्या अंतर है? दोहा दो पंक्तियों का छंद है जिसमें 13 और 11 मात्राओं की लय होती है। चौपाई चार चरणों का छंद है जिसमें हर चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। रामचरितमानस मुख्य रूप से चौपाइयों में लिखी गई है और बीच-बीच में दोहे आते हैं।
Q5. तुलसीदास किस भाषा में लिखते थे? तुलसीदास ने मुख्य रूप से अवधी और ब्रजभाषा में लिखा। रामचरितमानस अवधी में है, जबकि विनय पत्रिका, कवितावली और गीतावली ब्रजभाषा में रची गई हैं। संस्कृत के विद्वान होने के बावजूद उन्होंने लोकभाषा को चुना।
Q6. रामचरितमानस लिखने में कितना समय लगा? रामचरितमानस की रचना संवत 1631 की रामनवमी को अयोध्या में शुरू हुई और दो वर्ष, सात महीने तथा छब्बीस दिन में पूरी हुई। सातों कांड संवत 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में राम-विवाह के दिन पूर्ण हुए।
Q7. "चित्रकूट के घाट पर" दोहा किसने कहा था? प्रचलित कथा के अनुसार यह दोहा हनुमान ने तोते का रूप धारण करके कहा था। उद्देश्य यह था कि तुलसीदास सामने खड़े राम को पहचान सकें, क्योंकि पिछली बार वे उन्हें देखकर भी पहचान नहीं पाए थे।
Q8. तुलसीदास के गुरु कौन थे? तुलसीदास के गुरु नरहरिदास थे, जिन्होंने अयोध्या में उनका यज्ञोपवीत संस्कार कराया और सोरों के वराह क्षेत्र में उन्हें पहली बार रामायण सुनाई। तुलसीदास ने रामचरितमानस में स्वयं इस प्रसंग का उल्लेख किया है।
Q9. क्या तुलसीदास के दोहे कॉपीराइट में हैं? नहीं, तुलसीदास की रचनाएँ सार्वजनिक डोमेन में हैं क्योंकि उनकी रचना लगभग 400 साल पहले हुई थी। इन्हें कोई भी पढ़, उद्धृत और प्रकाशित कर सकता है। हालाँकि किसी आधुनिक विद्वान की टीका या अनुवाद पर कॉपीराइट लागू हो सकता है।
Q10. तुलसीदास और कबीर में कौन बड़ा कवि माना जाता है? दोनों को हिंदी साहित्य में समान रूप से बड़ा माना जाता है, बस उनकी धारा अलग है। कबीर निर्गुण भक्ति के सबसे प्रभावशाली कवि हैं और तुलसीदास सगुण राम भक्ति के। तुलना करने के बजाय दोनों को अलग-अलग परंपराओं का शिखर मानना ज़्यादा सही है।
Q11. क्या मैं भी अपनी कविता ऑनलाइन प्रकाशित कर सकता हूँ? हाँ, ख़ुद की कलम के कविता प्लेटफ़ॉर्म पर कोई भी लेखक मुफ़्त में अपनी कविता, दोहे या शायरी प्रकाशित कर सकता है। अगर आप अपनी रचनाओं की किताब छपवाना चाहते हैं तो प्रकाशन सेवा ₹9,999 से शुरू होती है।
Q12. तुलसीदास का निधन कब हुआ? तुलसीदास ने संवत 1680 यानी सन 1623 में श्रावण शुक्ल सप्तमी को काशी के असीघाट पर देह त्याग की। मान्यता है कि अंतिम समय में भी वे राम-नाम का उच्चारण कर रहे थे।
निष्कर्ष
तुलसीदास के दोहे सिर्फ़ परीक्षा के लिए याद करने वाली पंक्तियाँ नहीं हैं। ये पाँच सौ साल पुराने वे सूत्र हैं जो आज भी बातचीत, नेतृत्व, धैर्य और रिश्तों पर उतने ही सटीक बैठते हैं। मीठी वाणी, अच्छी संगति और कर्म पर भरोसा - यही तुलसी की तीन बड़ी सीख है।
इस पेज पर दिए गए 32 दोहे और चौपाइयाँ शुरुआत के लिए काफ़ी हैं। इसके बाद दोहावली और रामचरितमानस के बालकांड से आगे बढ़िए। अर्थ समझकर पढ़ेंगे तो अगली बार दोहा याद करना नहीं पड़ेगा, अपने आप याद रह जाएगा।
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तुलसीदास ने अपने समय की आम बोली में लिखा था, किसी बड़े प्रकाशक के इंतज़ार में नहीं बैठे थे। आपकी कविता भी इंतज़ार की मोहताज नहीं है।
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