मैथिलीशरण गुप्त – कविताएँ
मैथिलीशरण गुप्त की कविताएँ खड़ी बोली हिंदी की नींव मानी जाती हैं। उन्हें राष्ट्रकवि कहा जाता है और उनका जन्म 3 अगस्त 1886 को झाँसी के पास चिरगाँव में हुआ था। इस पेज पर उनकी 12 प्रसिद्ध कविताएँ शब्दार्थ और भावार्थ के साथ दी गई हैं।
गुप्त जी का सबसे बड़ा योगदान भाषा को लेकर है। उनसे पहले हिंदी कविता ब्रजभाषा में लिखी जाती थी और खड़ी बोली को काव्य के योग्य नहीं माना जाता था। उन्होंने खड़ी बोली में लिखकर यह धारणा तोड़ी, और आज हिंदी की सारी कविता उसी रास्ते पर चलती है।
एक बात जो कहीं और नहीं मिलेगी - उनकी रचनाएँ 1 जनवरी 2025 से ही सार्वजनिक डोमेन में आई हैं। इससे पहले तक वे कॉपीराइट में थीं। पूरी जानकारी नीचे दी गई है, जो प्रकाशकों और ब्लॉग लिखने वालों के काम की है।
मैथिलीशरण गुप्त हिंदी साहित्य में इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं
मैथिलीशरण गुप्त हिंदी में इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उन्होंने खड़ी बोली को काव्य-भाषा बनाया। उनके समय तक कविता का मतलब ब्रजभाषा था। उन्होंने वह भाषा चुनी जो आम लोग बोलते थे, और उसे इतनी सफलता से बरता कि बाद के सारे कवियों ने वही रास्ता अपनाया।
कविता कोश के अनुसार महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से उन्होंने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया और उसे काव्य-भाषा के रूप में निर्मित करने में अथक प्रयास किया। ब्रजभाषा जैसी समृद्ध काव्य-भाषा को छोड़कर नए कवियों ने खड़ी बोली को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया, और हिंदी कविता के इतिहास में गुप्त जी का यही सबसे बड़ा योगदान है।
दूसरी वजह उनका विषय-चयन है। उन्होंने रामायण और महाभारत की उन स्त्रियों को केंद्र में रखा जिन्हें परंपरा ने किनारे कर दिया था - उर्मिला और यशोधरा। साकेत में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला मुख्य पात्र हैं, राम नहीं।
तीसरी वजह उनका राष्ट्रीय स्वर है। भारत भारती स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की सबसे प्रभावशाली काव्य-कृतियों में थी, और इसी वजह से महात्मा गांधी ने उन्हें "राष्ट्रकवि" कहा।
📜 जल्दी में हैं? सीधे जाएँ: मनुष्यता • राष्ट्रीय कविताएँ • नारी और करुणा • प्रकृति और जीवन • ⚠️ कॉपीराइट स्थिति
मैथिलीशरण गुप्त का संक्षिप्त परिचय
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 को झाँसी के पास चिरगाँव गाँव में हुआ और निधन 12 दिसंबर 1964 को हुआ। उनके पिता सेठ रामचरण दास स्वयं कवि और रामभक्त थे। महात्मा गांधी ने उन्हें "राष्ट्रकवि" की उपाधि दी और 1954 में उन्हें पद्म भूषण मिला।
NCERT की कवि-परिचय सामग्री के अनुसार 1886 में झाँसी के करीब चिरगाँव में जन्मे गुप्त जी अपने जीवनकाल में ही राष्ट्रकवि के रूप में विख्यात हुए। उनकी शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई और संस्कृत, बांग्ला, मराठी तथा अंग्रेज़ी पर उनका समान अधिकार था। वे रामभक्त कवि हैं और उन्होंने भारतीय जीवन को समग्रता में समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास किया।
|
विवरण |
जानकारी |
|
जन्म |
3 अगस्त 1886, चिरगाँव (झाँसी), उत्तर प्रदेश |
|
निधन |
12 दिसंबर 1964 |
|
पिता |
सेठ रामचरण दास (स्वयं कवि) |
|
माता |
श्रीमती काशीबाई |
|
छोटे भाई |
सियारामशरण गुप्त (वे भी प्रसिद्ध कवि) |
|
साहित्यिक गुरु |
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी |
|
उपाधि |
राष्ट्रकवि (महात्मा गांधी द्वारा), दद्दा |
|
सम्मान |
पद्म भूषण (1954), राज्यसभा सदस्य |
|
भाषा |
खड़ी बोली हिंदी |
|
युग |
द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि |
|
पहली खड़ी बोली कविता |
हेमंत (सरस्वती पत्रिका में) |
विकिपुस्तक के अनुसार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी उन्हें कविता लिखने के लिए प्रेरित करते थे और उनकी रचनाओं में संशोधन करके अपनी पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित करते थे। उनकी पहली खड़ी बोली की कविता "हेमंत" शीर्षक से छपी। 1905 से 1921 तक उनकी रचनाएँ लगातार सरस्वती के पन्नों में जगह पाती रहीं और 12 वर्ष तक भारत की संसद में उनकी कविताएँ सांसदों को मंत्रमुग्ध करती रहीं।
मध्य प्रदेश सरकार ने निर्णय लिया है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती प्रदेश में प्रतिवर्ष तीन अगस्त को "कवि दिवस" के रूप में मनाई जाएगी।
हिंदी साहित्य के और बड़े नाम पढ़ने हों तो हमारा लेखक संग्रह देखिए।
मनुष्यता - सबसे प्रसिद्ध कविता
मनुष्यता गुप्त जी की सबसे प्रसिद्ध कविता है और NCERT कक्षा 10 की स्पर्श भाग 2 में संकलित है। इसका मूल संदेश यह है कि जो दूसरों के लिए जिए और मरे, वही सच्चा मनुष्य है। नीचे इसकी सबसे उद्धृत पंक्तियाँ अर्थ सहित दी गई हैं।
1. विचार लो कि मर्त्य हो
विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करें सभी।
हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए॥
शब्दार्थ: मर्त्य - मरणशील | वृथा - व्यर्थ | सु-मृत्यु - अच्छी मृत्यु | आपके लिए - अपने लिए
भावार्थ: समझ लो कि तुम मरणशील हो, इसलिए मृत्यु से कभी मत डरो। मरो तो ऐसे कि सब तुम्हें याद करें। अगर ऐसी अच्छी मृत्यु न मिली तो जीना और मरना दोनों व्यर्थ गए। असल में वही नहीं मरा जो सिर्फ़ अपने लिए नहीं जिया।
अंतिम पंक्ति में एक चतुर उलटफेर है - "मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए"। जो सिर्फ़ अपने लिए नहीं जिया, वही अमर है।
2. रहो न भूल के कभी मदान्ध
रहो न भूल के कभी मदान्ध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबन्धु के बड़े विशाल हाथ हैं॥
शब्दार्थ: मदान्ध - घमंड में अंधा | वित्त - धन | सनाथ - जिसका कोई स्वामी हो | त्रिलोकनाथ - तीनों लोकों के स्वामी | दीनबन्धु - ग़रीबों का साथी
भावार्थ: थोड़े से धन के घमंड में अंधे मत हो जाइए। ख़ुद को किसी का सहारा वाला मानकर मन में गर्व मत कीजिए। यहाँ अनाथ कौन है, जब त्रिलोकनाथ सबके साथ हैं। दयालु दीनबंधु के हाथ बहुत विशाल हैं।
3. मनुष्य मात्र बन्धु है
मनुष्य मात्र बन्धु है यही बड़ा विवेक है,
पुराणपुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है,
परन्तु अन्तरैक्य में प्रमाणभूत वेद है॥
शब्दार्थ: मनुष्य मात्र - हर मनुष्य | विवेक - समझ | स्वयंभू - स्वयं उत्पन्न | बाह्य भेद - बाहरी अंतर | अन्तरैक्य - भीतरी एकता
भावार्थ: हर मनुष्य एक-दूसरे का भाई है, यही सबसे बड़ी समझदारी है। सबका पिता एक ही है। कर्मों के फल के अनुसार बाहरी अंतर ज़रूर दिखते हैं, पर भीतर से सब एक हैं और इसका प्रमाण वेद में है।
4. चलो अभीष्ट मार्ग में
चलो अभीष्ट मार्ग में सभी सुभीति छोड़कर,
विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते चलो।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सुतर्क संघ हो सभी॥
शब्दार्थ: अभीष्ट - मनचाहा, लक्ष्य | सुभीति - डर | विघ्न - बाधा | हेलमेल - मेलजोल | अतर्क - बिना बहस के
भावार्थ: सारा डर छोड़कर अपने लक्ष्य के रास्ते पर चलो। जो विपत्ति और बाधाएँ आएँ, उन्हें धकेलते हुए आगे बढ़ो। आपसी मेलजोल घटे नहीं और भिन्नता कभी न बढ़े। सब एक ही रास्ते के साथी बनकर चलें।
कविता का मूल संदेश: मनुष्यता में गुप्त जी ने रंतिदेव, दधीचि, कर्ण, गौतम बुद्ध और जाफ़र जैसे उदाहरण देकर बताया है कि इन सबने अपना सुख त्यागकर दूसरों को राहत दी। इसी त्याग को वे "मनुष्यता" कहते हैं।
राष्ट्रीय चेतना की कविताएँ
इन कविताओं में गुप्त जी का राष्ट्रकवि वाला रूप सामने आता है। ये स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लिखी गईं और युवाओं में भारी लोकप्रिय हुईं। भारत भारती इनमें सबसे प्रभावशाली मानी जाती है।
5. हम कौन थे, क्या हो गए (भारत भारती)
हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।
भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ,
फैला मनोहर गिरि हिमालय, एक जिसके सिर वहाँ॥
शब्दार्थ: भू लोक - पृथ्वी | पुण्य लीला-स्थल - पवित्र क्रीड़ास्थल | मनोहर - सुंदर | गिरि - पर्वत
भावार्थ: हम कौन थे, अब क्या हो गए हैं और आगे क्या होंगे - आज मिलकर इन सभी सवालों पर विचार करें। वह जगह कहाँ है जो पृथ्वी का गौरव और प्रकृति का पवित्र क्रीड़ास्थल थी, जिसके सिर पर सुंदर हिमालय फैला है।
भारत भारती 1912 में प्रकाशित हुई और यह गुप्त जी की सबसे प्रभावशाली कृति मानी जाती है। इसके तीन खंड हैं - अतीत खंड, वर्तमान खंड और भविष्यत् खंड। इसी रचना ने उन्हें राष्ट्रकवि बनाया।
6. हे मातृभूमि
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं,
बंदी जन खग-वृंद, शेष फन सिंहासन हैं।
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की,
है मातृभूमि! तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की॥
शब्दार्थ: मंडन - आभूषण | खग-वृंद - पक्षियों का समूह | शेष फन - शेषनाग का फन | पयोद - बादल | सगुण मूर्ति - साकार रूप | सर्वेश - सबका स्वामी
भावार्थ: नदियाँ प्रेम की धारा हैं, फूल और तारे आभूषण हैं। पक्षियों का समूह बंदीजन है और शेषनाग का फन सिंहासन। बादल अभिषेक करते हैं। हे मातृभूमि, तू सचमुच ईश्वर का साकार रूप है।
7.
हम खेले कूदे हर्षयुत जिसकी प्यारी गोद में,
हे मातृभूमि! तुझको निरख मग्न क्यों न हों मोद में?
हे मातृभूमि! जब हम कभी शरण न तेरी पाएँगे,
बस तभी प्रलय के पेट में सभी लीन हो जाएँगे॥
शब्दार्थ: हर्षयुत - ख़ुशी से भरे | निरख - देखकर | मग्न - डूबा हुआ | मोद - आनंद | प्रलय - विनाश | लीन - समा जाना
भावार्थ: जिसकी प्यारी गोद में हम ख़ुशी से खेले-कूदे, हे मातृभूमि, तुझे देखकर हम आनंद में क्यों न डूबें। हे मातृभूमि, जिस दिन हमें तेरी शरण नहीं मिलेगी, उसी दिन हम सब प्रलय के पेट में समा जाएँगे।
8. नर हो, न निराश करो मन को
नर हो, न निराश करो मन को,
कुछ काम करो, कुछ काम करो।
जग में रहकर कुछ नाम करो,
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो॥
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो,
कुछ तो उपयुक्त करो तन को,
नर हो, न निराश करो मन को॥
शब्दार्थ: नर - मनुष्य | अहो - अरे | उपयुक्त - काम में लाना
भावार्थ: हे मनुष्य, मन को निराश मत करो। कुछ काम करो, कुछ काम करो। संसार में रहकर कुछ नाम कमाओ। यह जन्म आख़िर किसलिए हुआ है, यह समझो ताकि यह व्यर्थ न जाए। कम से कम इस शरीर को किसी काम में तो लगाओ।
यह गुप्त जी की सबसे ज़्यादा उद्धृत प्रेरक कविता है और स्कूलों में सबसे अधिक पढ़ाई जाती है। "कुछ काम करो" की पुनरुक्ति इसे भाषण जैसा नहीं, पुकार जैसा बनाती है।
अगर आप भी लिखते हैं तो अपनी रचना ख़ुद की कलम के कविता प्लेटफ़ॉर्म पर मुफ़्त प्रकाशित कर सकते हैं।
नारी और करुणा की कविताएँ
गुप्त जी की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि यही है। उन्होंने उन स्त्रियों को केंद्र में रखा जिन्हें परंपरा ने पीछे छोड़ दिया था - उर्मिला और यशोधरा। इन रचनाओं में करुणा है, पर शिकायत नहीं।
9. अबला जीवन हाय (यशोधरा से)
सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
मुझको बहुत उन्होंने माना, फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना, जो वे मन में लाते॥
सखि, वे मुझसे कहकर जाते॥
अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी॥
शब्दार्थ: सखि - सहेली | पथ-बाधा - रास्ते की रुकावट | अबला - निर्बल स्त्री
भावार्थ: यशोधरा अपनी सखी से कह रही है कि काश वे मुझसे कहकर जाते। क्या वे मुझे अपने रास्ते की रुकावट समझते थे? उन्होंने मुझे बहुत माना, फिर भी क्या पूरी तरह पहचाना? मैंने तो वही मुख्य समझा जो उनके मन में था।
अंतिम दो पंक्तियाँ हिंदी की सबसे प्रसिद्ध पंक्तियों में हैं - "आँचल में है दूध और आँखों में पानी।" एक ही पंक्ति में माँ की ममता और पत्नी की पीड़ा दोनों आ गईं। यशोधरा गौतम बुद्ध की पत्नी थीं, जिन्हें वे बिना बताए छोड़ गए थे।
गुप्त जी का कमाल यह है कि उन्होंने बुद्ध की आलोचना नहीं की, बस यशोधरा का पक्ष रख दिया। शिकायत नहीं, सवाल।
10. उर्मिला विलाप (साकेत से)
पृष्ठभूमि: साकेत गुप्त जी का महाकाव्य है, जिसमें राम-कथा उर्मिला की दृष्टि से कही गई है। उर्मिला लक्ष्मण की पत्नी थीं। लक्ष्मण चौदह वर्ष राम के साथ वन गए, पर उर्मिला अयोध्या में ही रह गईं - और वाल्मीकि से लेकर तुलसीदास तक किसी ने उनका दुख नहीं लिखा।
गुप्त जी ने पूरा महाकाव्य इसी उपेक्षित पात्र पर रच दिया। उनका प्रसिद्ध कथन है कि साहित्य में जो पात्र उपेक्षित रह गया, उसे स्वर देना ही कवि का धर्म है।
मूल भाव: साकेत में उर्मिला अकेली छूटी हुई स्त्री नहीं है, वह अपने त्याग की चेतना रखने वाली स्त्री है। वह रोती है, पर टूटती नहीं। यही चित्रण साकेत को हिंदी का सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक महाकाव्य बनाता है।
साकेत 1931 में प्रकाशित हुई और इसमें बारह सर्ग हैं। इसी रचना के लिए उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन का मंगलाप्रसाद पारितोषिक मिला।
प्रकृति और जीवन की कविताएँ
इन कविताओं में गुप्त जी का कोमल पक्ष दिखता है। यहाँ उपदेश नहीं है, सिर्फ़ चित्र है। पंचवटी की पंक्तियाँ हिंदी के सबसे सुंदर प्रकृति-चित्रणों में गिनी जाती हैं।
11. चारु चंद्र की चंचल किरणें (पंचवटी)
चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में।
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है, अवनि और अंबर तल में॥
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से।
मानो झीम रहे हैं तरु भी, मंद पवन के झोंकों से॥
शब्दार्थ: चारु - सुंदर | अवनि - पृथ्वी | अंबर - आकाश | पुलक - रोमांच | हरित तृण - हरी घास | तरु - पेड़ | मंद पवन - धीमी हवा
भावार्थ: सुंदर चंद्रमा की चंचल किरणें जल और थल दोनों में खेल रही हैं। स्वच्छ चाँदनी पृथ्वी और आकाश दोनों में बिछी हुई है। धरती अपना रोमांच हरी घास की नोकों से ज़ाहिर कर रही है। धीमी हवा के झोंकों से पेड़ भी झूमते हुए लगते हैं।
यह हिंदी की सबसे प्रसिद्ध प्रकृति-कविता है। "पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से" में मानवीकरण अलंकार का सबसे सुंदर उदाहरण है - घास की नोकें धरती के रोंगटे बन गई हैं।
पंचवटी उस प्रसंग पर है जब राम, सीता और लक्ष्मण वनवास में पंचवटी में रह रहे थे और लक्ष्मण रात में पहरा दे रहे थे।
12. किसान
हेमन्त, शिशिर, बसन्त और वर्षा भी बीत गई,
पर श्रम का यह मूल्य न पाया, जो थी आस लगी।
बोया जिसने खेत, उसी को रोटी क्यों न मिली,
यह कैसी है रीति जगत की, कैसी है यह गली॥
शब्दार्थ: हेमन्त, शिशिर - ऋतुओं के नाम | श्रम - मेहनत | आस - उम्मीद | रीति - नियम
भावार्थ: हेमंत, शिशिर, बसंत और वर्षा सब ऋतुएँ बीत गईं, पर मेहनत का वह मूल्य नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी। जिसने खेत बोया, उसे ही रोटी क्यों नहीं मिली। यह दुनिया का कैसा नियम है।
किसान पर गुप्त जी की यह दृष्टि प्रेमचंद की "पूस की रात" के बहुत क़रीब है। दोनों ने एक ही सवाल पूछा - मेहनत करने वाला भूखा क्यों है।
मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख रचनाएँ
गुप्त जी ने लगभग चालीस से ज़्यादा रचनाएँ लिखीं, जिनमें महाकाव्य, खंडकाव्य, नाटक और अनुवाद सब शामिल हैं। उनकी समग्र रचनाएँ बारह खंडों में "मैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली" के नाम से प्रकाशित हुई हैं।
|
रचना |
वर्ष |
विधा और विषय |
|
भारत भारती |
1912 |
राष्ट्रीय काव्य - अतीत, वर्तमान और भविष्य खंड |
|
पंचवटी |
1925 |
खंडकाव्य - वनवास प्रसंग और प्रकृति चित्रण |
|
साकेत |
1931 |
महाकाव्य - उर्मिला केंद्रित राम कथा, बारह सर्ग |
|
यशोधरा |
1932 |
खंडकाव्य - बुद्ध की पत्नी की पीड़ा |
|
जयद्रथ वध |
1910 |
खंडकाव्य - महाभारत प्रसंग |
|
द्वापर |
1936 |
कृष्ण कथा |
|
नहुष, सिद्धराज, विष्णुप्रिया |
विभिन्न |
पौराणिक और ऐतिहासिक खंडकाव्य |
|
हेमंत |
प्रारंभिक |
पहली खड़ी बोली कविता, सरस्वती में प्रकाशित |
विकिपीडिया के अनुसार उनकी मौलिक तथा अनूदित समग्र कृतियों का संकलन "मैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली" के नाम से बारह खंडों में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है, जिसके लेखक-संपादक डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल हैं। उनकी फुटकर रचनाएँ केशों की कथा, स्वर्गसहोदर और ये दोनों मंगल घट में संग्रहीत हैं।
हिंदी की और क्लासिक किताबें चाहिए तो हमारे हिंदी बुक स्टोर पर देखिए।
द्विवेदी युग और गुप्त जी की भूमिका
गुप्त जी द्विवेदी युग के सबसे प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। यह युग आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर है, जिन्होंने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से हिंदी को दिशा दी। इस युग की पहचान खड़ी बोली, राष्ट्रीय भावना और सामाजिक सुधार है।
|
हिंदी काव्य का युग |
समय |
विशेषता |
प्रमुख कवि |
|
भारतेंदु युग |
1868-1900 |
नवजागरण, ब्रज से खड़ी बोली की ओर |
भारतेंदु हरिश्चंद्र |
|
द्विवेदी युग |
1900-1920 |
खड़ी बोली, राष्ट्रीयता, आदर्शवाद |
मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय |
|
छायावाद |
1920-1936 |
कल्पना, व्यक्तिवाद, प्रकृति |
प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी |
|
प्रगतिवाद |
1936 के बाद |
सामाजिक यथार्थ, वर्ग-चेतना |
नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल |
यह याद रखने लायक़ बात है कि गुप्त जी छायावादी कवि नहीं हैं। उनकी कविता में स्पष्टता है, छायावाद जैसी धुँधली प्रतीकात्मकता नहीं। परीक्षा में यह अंतर पूछा जाता है।
⚠️ गुप्त जी की रचनाओं की कॉपीराइट स्थिति
मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ 1 जनवरी 2025 से सार्वजनिक डोमेन में हैं। इससे पहले तक वे कॉपीराइट में थीं। यह जानकारी उन प्रकाशकों और वेबसाइट चलाने वालों के लिए महत्वपूर्ण है जो उनकी रचनाएँ प्रकाशित करना चाहते हैं।
गणना इस तरह होती है - भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के अनुसार साहित्यिक कृतियों पर लेखक की मृत्यु के वर्ष के बाद वाले कैलेंडर वर्ष की शुरुआत से साठ वर्ष तक कॉपीराइट रहता है।
|
चरण |
तिथि |
|
निधन |
12 दिसंबर 1964 |
|
गणना शुरू |
1 जनवरी 1965 |
|
साठ वर्ष पूरे |
31 दिसंबर 2024 |
|
सार्वजनिक डोमेन से |
1 जनवरी 2025 |
इसका व्यावहारिक मतलब: अब उनकी कविताओं का पूरा पाठ स्वतंत्र रूप से प्रकाशित किया जा सकता है। पर ध्यान रखिए कि किसी आधुनिक विद्वान की टीका, भूमिका या संपादित संस्करण की विशेष सामग्री उस लेखक की अपनी कृति है और उस पर अलग कॉपीराइट लागू रहता है।
तुलना के लिए - प्रेमचंद (निधन 1936) 1997 से सार्वजनिक डोमेन में हैं और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाएँ दिसंबर 2001 से। गुप्त जी सबसे हाल में इस सूची में जुड़े हैं।
गुप्त जी और प्रसाद-निराला में क्या अंतर है
गुप्त जी द्विवेदी युग के हैं और प्रसाद, निराला तथा पंत छायावाद के। सबसे बड़ा अंतर स्पष्टता का है - गुप्त जी सीधे कहते हैं, छायावादी कवि प्रतीकों में। यह भ्रम बहुत आम है क्योंकि तीनों का समय आसपास है।
|
आधार |
मैथिलीशरण गुप्त |
छायावादी कवि (प्रसाद, निराला, पंत) |
|
युग |
द्विवेदी युग |
छायावाद |
|
भाषा |
शुद्ध खड़ी बोली, संस्कृतनिष्ठ |
खड़ी बोली, पर लाक्षणिक और कोमल |
|
शैली |
स्पष्ट कथन, कथात्मक |
प्रतीकात्मक, सांकेतिक |
|
मुख्य विषय |
राष्ट्र, आदर्श, इतिहास, पौराणिक कथा |
व्यक्ति, प्रेम, प्रकृति, रहस्य |
|
दृष्टिकोण |
आदर्शवादी और उपदेशात्मक |
व्यक्तिवादी और भावप्रधान |
|
प्रमुख कृति |
साकेत, भारत भारती |
कामायनी, राम की शक्तिपूजा |
एक और भ्रम दूर कर लीजिए - "नारी! तुम केवल श्रद्धा हो" पंक्ति जयशंकर प्रसाद की कामायनी से है, गुप्त जी की नहीं। गुप्त जी की प्रसिद्ध नारी-पंक्ति है "अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी।"
NCERT में गुप्त जी की कौन सी कविताएँ हैं
गुप्त जी की सबसे प्रसिद्ध NCERT रचना "मनुष्यता" है, जो कक्षा 10 की स्पर्श भाग 2 के पद्य खंड में है। संस्करण के अनुसार यह अध्याय 3 या 4 के रूप में मिलती है, क्योंकि पाठ्यक्रम संशोधन के बाद क्रमांक बदला है।
|
कक्षा |
पुस्तक |
कविता |
|
कक्षा 10 |
स्पर्श भाग 2, पद्य खंड |
मनुष्यता |
|
विभिन्न राज्य बोर्ड |
अलग-अलग |
नर हो न निराश करो मन को, पंचवटी |
|
बी.ए. हिंदी |
द्विवेदी युग का पाठ |
साकेत, भारत भारती के अंश |
कक्षा 10 हिंदी स्पर्श भाग 2 पद्य खंड में "मनुष्यता" अध्याय 4 के रूप में दी गई है। वहीं कुछ संस्करणों में यह अध्याय 3 के रूप में है। अपनी पाठ्यपुस्तक का क्रमांक ज़रूर जाँच लीजिए।
परीक्षा में गुप्त जी की कविताओं पर क्या पूछा जाता है
गुप्त जी पर सबसे ज़्यादा प्रश्न मनुष्यता कविता के भावार्थ और उसमें दिए गए उदाहरणों पर आते हैं। साथ ही उनके योगदान और उपाधि पर तथ्यात्मक प्रश्न बनते हैं। नीचे तैयारी के मुख्य बिंदु दिए गए हैं।
सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले तथ्य:
• जन्म और निधन: 3 अगस्त 1886 (चिरगाँव, झाँसी) और 12 दिसंबर 1964।
• उपाधि: राष्ट्रकवि, जो महात्मा गांधी ने दी। घर में उन्हें "दद्दा" कहा जाता था।
• गुरु: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, जिन्होंने सरस्वती में उनकी रचनाएँ छापीं।
• सबसे बड़ा योगदान: खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में स्थापित करना।
• साकेत की विशेषता: उर्मिला को केंद्रीय पात्र बनाना।
• सम्मान: पद्म भूषण 1954, राज्यसभा सदस्य।
वे ग़लतियाँ जो नंबर काटती हैं:
• गुप्त जी को छायावादी कवि बता देना: वे द्विवेदी युग के हैं, छायावाद के नहीं।
• "नारी! तुम केवल श्रद्धा हो" को उनकी पंक्ति बताना: यह जयशंकर प्रसाद की कामायनी से है।
• साकेत को राम-केंद्रित बताना: इसकी विशेषता ही यह है कि केंद्र में उर्मिला हैं।
• यशोधरा और उर्मिला को मिला देना: यशोधरा बुद्ध की पत्नी हैं, उर्मिला लक्ष्मण की।
• मनुष्यता में दिए उदाहरण भूल जाना: रंतिदेव, दधीचि, कर्ण, गौतम बुद्ध और जाफ़र।
• भारत भारती का वर्ष ग़लत लिखना: 1912। साकेत 1931 में आई।
हिंदी कविता की और किताबें चुननी हों तो हिंदी कविता की बेहतरीन किताबें वाली सूची देखिए।
मुख्य बातें (Key Takeaways)
• मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 को चिरगाँव (झाँसी) में हुआ और निधन 12 दिसंबर 1964 को। मध्य प्रदेश में उनकी जयंती "कवि दिवस" के रूप में मनाई जाती है।
• उनका सबसे बड़ा योगदान खड़ी बोली को काव्य-भाषा बनाना है। उनसे पहले हिंदी कविता ब्रजभाषा में लिखी जाती थी।
• उनके साहित्यिक गुरु आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी थे, जो सरस्वती पत्रिका में उनकी रचनाएँ संशोधित करके छापते थे।
• महात्मा गांधी ने उन्हें "राष्ट्रकवि" कहा और 1954 में उन्हें पद्म भूषण मिला। वे राज्यसभा सदस्य भी रहे।
• साकेत (1931) उनका महाकाव्य है, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता उर्मिला को केंद्रीय पात्र बनाना है।
• "अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी" यशोधरा से उनकी सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है।
• उनकी रचनाएँ 1 जनवरी 2025 से सार्वजनिक डोमेन में आई हैं, क्योंकि निधन 1964 में हुआ और भारत में कॉपीराइट अवधि साठ वर्ष है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. मैथिलीशरण गुप्त की सबसे प्रसिद्ध कविता कौन सी है?
मनुष्यता उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता है, जो NCERT कक्षा 10 की स्पर्श भाग 2 में संकलित है। इसकी सबसे उद्धृत पंक्ति है "विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी"। इसके अलावा "नर हो, न निराश करो मन को" और "चारु चंद्र की चंचल किरणें" भी बहुत प्रसिद्ध हैं।
Q2. मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि किसने कहा था?
उन्हें "राष्ट्रकवि" की उपाधि महात्मा गांधी ने दी थी। यह उपाधि मुख्य रूप से उनकी कृति भारत भारती (1912) के आधार पर मिली, जो स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में बेहद प्रभावशाली रही। घर और साहित्यिक जगत में उन्हें "दद्दा" भी कहा जाता था।
Q3. हिंदी साहित्य में गुप्त जी का सबसे बड़ा योगदान क्या है?
उनका सबसे बड़ा योगदान खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में स्थापित करना है। उनसे पहले हिंदी कविता ब्रजभाषा में लिखी जाती थी और खड़ी बोली को काव्य के योग्य नहीं माना जाता था। उन्होंने यह धारणा तोड़ी और बाद के सभी कवियों ने उसी रास्ते को अपनाया।
Q4. साकेत की विशेषता क्या है?
साकेत (1931) गुप्त जी का महाकाव्य है जिसमें बारह सर्ग हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें राम-कथा उर्मिला की दृष्टि से कही गई है। उर्मिला लक्ष्मण की पत्नी थीं, जिनके चौदह वर्ष के अकेलेपन को वाल्मीकि से तुलसीदास तक किसी ने नहीं लिखा था।
Q5. "अबला जीवन हाय" पंक्ति किस रचना से है?
यह पंक्ति उनके खंडकाव्य "यशोधरा" से है। पूरी पंक्ति है - "अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी।" यशोधरा गौतम बुद्ध की पत्नी थीं, जिन्हें वे बिना बताए छोड़कर चले गए थे।
Q6. मैथिलीशरण गुप्त के गुरु कौन थे?
उनके साहित्यिक गुरु आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी थे। वे गुप्त जी को लिखने के लिए प्रेरित करते थे, उनकी रचनाओं में संशोधन करते थे और अपनी पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित करते थे। उनकी पहली खड़ी बोली कविता "हेमंत" इसी पत्रिका में छपी थी।
Q7. गुप्त जी छायावादी कवि हैं या द्विवेदी युग के?
वे द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि हैं, छायावादी नहीं। छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा हैं। गुप्त जी की कविता स्पष्ट कथन वाली है, जबकि छायावाद प्रतीकात्मक और सांकेतिक है।
Q8. मनुष्यता कविता में किन महापुरुषों के उदाहरण दिए गए हैं?
मनुष्यता में रंतिदेव, दधीचि, कर्ण, गौतम बुद्ध और जाफ़र जैसे उदाहरण दिए गए हैं। इन सभी ने अपना सुख त्यागकर दूसरों को राहत पहुँचाई। कवि का संदेश है कि जो दूसरों के लिए नहीं जिया, उसका जीवन व्यर्थ है।
Q9. क्या मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ कॉपीराइट में हैं?
नहीं, उनकी रचनाएँ 1 जनवरी 2025 से सार्वजनिक डोमेन में हैं। भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के अनुसार साहित्यिक कृतियों पर लेखक की मृत्यु के अगले कैलेंडर वर्ष से साठ वर्ष तक कॉपीराइट रहता है। उनका निधन 1964 में हुआ, इसलिए यह अवधि 31 दिसंबर 2024 को पूरी हुई।
Q10. भारत भारती कब प्रकाशित हुई और उसमें क्या है?
भारत भारती 1912 में प्रकाशित हुई। इसके तीन खंड हैं - अतीत खंड, वर्तमान खंड और भविष्यत् खंड। इसमें भारत के गौरवशाली अतीत, पतनशील वर्तमान और आशापूर्ण भविष्य का चित्रण है। इसी कृति ने उन्हें राष्ट्रकवि बनाया।
Q11. NCERT में गुप्त जी की कौन सी कविता है?
NCERT में उनकी कविता "मनुष्यता" कक्षा 10 की स्पर्श भाग 2 के पद्य खंड में है। संस्करण के अनुसार यह अध्याय 3 या अध्याय 4 के रूप में मिलती है, क्योंकि पाठ्यक्रम संशोधन के बाद क्रमांक बदला है। अपनी पाठ्यपुस्तक ज़रूर जाँच लें।
Q12. क्या मैं भी अपनी कविता ऑनलाइन प्रकाशित कर सकता हूँ?
हाँ, ख़ुद की कलम के कविता प्लेटफ़ॉर्म पर कोई भी लेखक मुफ़्त में अपनी कविता, गीत या शायरी प्रकाशित कर सकता है। अगर आप अपनी रचनाओं की किताब छपवाना चाहते हैं तो प्रकाशन सेवा ₹9,999 से शुरू होती है।
निष्कर्ष
गुप्त जी को पढ़ते समय एक बात ध्यान में रखिए - वे कवि से पहले पक्षधर हैं। जहाँ भी कोई छूटा हुआ पात्र मिला, उन्होंने उसका पक्ष लिख दिया। उर्मिला, यशोधरा और किसान - तीनों को उन्होंने वही जगह दी जो परंपरा ने नहीं दी थी।
इस पेज पर दी गई 12 रचनाएँ शुरुआत के लिए काफ़ी हैं। आगे बढ़ना हो तो पूरा साकेत पढ़िए, ख़ासकर उर्मिला वाले सर्ग। और भाषा पर ध्यान दीजिए - यह वही खड़ी बोली है जो आज आप बोलते हैं, और उसे कविता बनाने का काम इन्हीं ने किया।
✍️ आपकी अपनी कलम का क्या?
गुप्त जी ने उस भाषा में लिखना चुना जिसे उस समय कविता के योग्य नहीं माना जाता था। लोग हँसे, पर उन्होंने लिखना जारी रखा - और आज पूरी हिंदी कविता उसी भाषा में लिखी जाती है।
अपनी किताब publish करने का सपना अधूरा मत छोड़िए - ख़ुद की कलम के साथ ₹9,999 से शुरू करें।
👉 www.khudkikalam.com/publication
500+ लेखक अपनी किताब ख़ुद की कलम से प्रकाशित कर चुके हैं और 25,000+ पाठक हमारे साथ जुड़े हैं। अगला नाम आपका हो सकता है। 🖋️