निराला की कविताएँ

Anu 7 घंटे पहले 👁 4
निराला की कविताएँ

 

निराला की कविताएँ हिंदी में मुक्त छंद की शुरुआत मानी जाती हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" छायावाद के चार स्तंभों में से एक थे, पर बाक़ी तीनों से अलग उन्होंने कल्पना कम और यथार्थ ज़्यादा लिखा। इस पेज पर उनकी 14 प्रसिद्ध कविताएँ शब्दार्थ और भावार्थ के साथ दी गई हैं।

निराला की सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने छंद का बंधन तोड़ा। परिमल (1930) की भूमिका में उन्होंने लिखा था कि मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है - मनुष्य की मुक्ति कर्म के बंधन से छूटना है और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग होना।

एक बात जो ज़्यादातर पेजों पर नहीं मिलेगी - उनकी पहली मुक्त छंद कविता "जूही की कली" को सरस्वती पत्रिका ने छापने से मना कर दिया था। पूरी कहानी नीचे दी गई है, क्योंकि वही हिंदी कविता का मोड़ है।


निराला बाक़ी छायावादी कवियों से कैसे अलग हैं

निराला छायावाद के चार स्तंभों में से एक हैं, पर बाक़ी तीनों से उनका रास्ता अलग है। प्रसाद, पंत और महादेवी कल्पना और कोमलता की ओर गए, जबकि निराला यथार्थ और विद्रोह की ओर। "वह तोड़ती पत्थर" जैसी कविता उस दौर के किसी और छायावादी कवि ने नहीं लिखी।

विकिपुस्तक के अनुसार अपने समकालीन अन्य कवियों से अलग उन्होंने कविता में कल्पना का सहारा बहुत कम लिया और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया। वे हिंदी में मुक्तछंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं।

दूसरा अंतर भाषा का है। उनकी भाषा में एक ओर संस्कृतनिष्ठ ओज है ("राम की शक्तिपूजा") और दूसरी ओर बिलकुल बोलचाल की सादगी ("वह तोड़ती पत्थर")। यह दोनों छोर एक ही कवि में मिलना दुर्लभ है।

तीसरा अंतर उनके तेवर का है। "कुकुरमुत्ता" जैसी व्यंग्य कविता और "सरोज स्मृति" जैसा शोकगीत - दोनों उन्हीं की क़लम से निकले। इसी विस्तार के कारण उन्हें "महाप्राण निराला" कहा जाता है।

📜 जल्दी में हैं? सीधे जाएँ: यथार्थ की कविताएँNCERT की कविताएँप्रकृति और प्रेमसरोज स्मृति⚠️ जूही की कली का इतिहास


निराला का संक्षिप्त परिचय

सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" का जन्म 1896 में बंगाल के महिषादल में हुआ और निधन 15 अक्टूबर 1961 को इलाहाबाद में। उनका पैतृक गाँव उन्नाव (उत्तर प्रदेश) का गढ़ाकोला था। वे छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में गिने जाते हैं और हिंदी में मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं।

विकिपुस्तक के अनुसार सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला (11 फरवरी 1896 - 15 अक्टूबर 1961) हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं।

विवरण

जानकारी

पूरा नाम

सूर्यकांत त्रिपाठी

उपनाम

निराला, महाप्राण निराला

जन्म

1896, महिषादल (मेदिनीपुर), बंगाल

पैतृक गाँव

गढ़ाकोला, उन्नाव, उत्तर प्रदेश

निधन

15 अक्टूबर 1961, इलाहाबाद (दारागंज)

काव्य-धारा

छायावाद (चार स्तंभों में एक)

सबसे बड़ा योगदान

हिंदी में मुक्त छंद का प्रवर्तन

भाषा

खड़ी बोली, तत्सम शब्दावली की अधिकता

प्रमुख संग्रह

परिमल, गीतिका, अनामिका, अणिमा, बेला, नये पत्ते

प्रमुख कविताएँ

राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, वह तोड़ती पत्थर, कुकुरमुत्ता

NCERT की कवि-परिचय सामग्री के अनुसार निराला जी ने खड़ी बोली का प्रयोग किया और उनकी कविताओं में तत्सम शब्दावली की अधिकता है। छायावादी रचनाकारों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया, उनकी भाषा में लाक्षणिकता है और कविताओं में संगीतात्मकता का सुंदर निर्वाह मिलता है।

उन्होंने बांग्ला से हिंदी में कई अनुवाद भी किए, जिनमें बंकिमचंद्र के उपन्यास और श्री रामकृष्ण वचनामृत शामिल हैं। जीवन के अंतिम वर्ष उन्होंने इलाहाबाद के दारागंज में बेहद कठिनाई में बिताए।

हिंदी साहित्य के और बड़े नाम पढ़ने हों तो हमारा लेखक संग्रह देखिए।


 

यथार्थ और विद्रोह की कविताएँ

ये निराला की सबसे विशिष्ट कविताएँ हैं और यही उन्हें बाक़ी छायावादियों से अलग करती हैं। यहाँ न कल्पना है, न कोमलता - सिर्फ़ वह दिखाया गया है जो सड़क पर मौजूद है।

1. वह तोड़ती पत्थर

वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर -
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार -
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।

शब्दार्थ: पथ - रास्ता | श्याम तन - साँवला शरीर | नत नयन - झुकी हुई आँखें | कर्म-रत - काम में लगा हुआ | गुरु - भारी | तरु-मालिका - पेड़ों की क़तार | अट्टालिका - ऊँची इमारत | प्राकार - चारदीवारी

भावार्थ: कवि ने इलाहाबाद की सड़क पर एक स्त्री को पत्थर तोड़ते देखा। उसके ऊपर कोई छायादार पेड़ नहीं है। साँवला शरीर, भरी जवानी, झुकी आँखें और काम में लगा मन। भारी हथौड़ा हाथ में है और वह बार-बार वार कर रही है। सामने पेड़ों की क़तार, ऊँची इमारत और चारदीवारी है।

यही विरोधाभास कविता की जान है - मज़दूर के सिर पर छाया नहीं, जबकि सामने ही पेड़ों वाली आलीशान कोठी खड़ी है। यह हिंदी की पहली सच्ची मज़दूर-कविता मानी जाती है।

2.

उठ गई सहसा दृष्टि नहीं थी काँपी,
देखा उसने जिस ओर, कि जैसे कोई क्रांति!
मैं समझा, कहा वहाँ - "मैं भी हूँ, बोलो!"
फिर ज्यों की त्यों वह तोड़ती पत्थर।

भावार्थ: अचानक उसकी नज़र उठी और उसमें ज़रा भी काँप नहीं थी। उसने जिस ओर देखा, वह देखना क्रांति जैसा था। कवि को लगा कि वह कह रही है - मैं भी हूँ, बोलो। फिर वह वैसे ही पत्थर तोड़ने लगी।

नज़र का "नहीं काँपना" ही सबसे बड़ी बात है। वह दया नहीं माँग रही, अस्तित्व की घोषणा कर रही है। निराला ने यहाँ शिकायत नहीं, आत्मसम्मान लिखा।

3. भिक्षुक

वह आता -
दो टूक कलेजे को करता, पछताता पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को,
मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता -
दो टूक कलेजे को करता, पछताता पथ पर आता।

शब्दार्थ: दो टूक - दो टुकड़े | लकुटिया - छोटी लाठी | झोली - थैली

भावार्थ: वह भिखारी आता है और देखने वाले का कलेजा दो टुकड़े कर देता है। भूख से पेट और पीठ एक हो गए हैं। लाठी टेककर चल रहा है। मुट्ठी भर अनाज के लिए, भूख मिटाने के लिए, वह अपनी फटी पुरानी झोली फैलाता है।

"पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक" - भूख का इससे सटीक चित्र हिंदी में शायद ही कोई हो। पूरी कविता में एक भी शब्द दया माँगने वाला नहीं है, फिर भी असर सबसे गहरा है।

4. कुकुरमुत्ता

अबे, सुन बे, गुलाब,
भूल मत जो पाई ख़ुशबू, रंग-ओ-आब,
ख़ून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट!

शब्दार्थ: रंग-ओ-आब - रंग और चमक | अशिष्ट - असभ्य | कैपिटलिस्ट - पूँजीपति

भावार्थ: कुकुरमुत्ता गुलाब से कह रहा है कि ख़ुशबू और रंग पाकर इतना मत इतराओ। तुमने खाद का ख़ून चूसा है और अब डाल पर पूँजीपति की तरह अकड़ रहे हो।

यह हिंदी की सबसे प्रसिद्ध व्यंग्य कविता है। गुलाब यहाँ विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग है और कुकुरमुत्ता आम आदमी। ध्यान दीजिए कि निराला ने "कैपिटलिस्ट" जैसा अंग्रेज़ी शब्द बेझिझक इस्तेमाल किया - छायावाद के दौर में यह अपने आप में विद्रोह था।


 

NCERT की कविताएँ - उत्साह और अट नहीं रही है

ये दोनों कविताएँ NCERT कक्षा 10 की क्षितिज भाग 2 में एक साथ आती हैं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों प्रकृति पर हैं, पर उनका स्वर बिलकुल अलग है - एक में ओज है, दूसरी में कोमलता।

5. उत्साह

बादल, गरजो! -
घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!
ललित ललित, काले घुँघराले,
बाल कल्पना के-से पाले,
विद्युत-छबि उर में, कवि, नवजीवन वाले!
वज्र छिपा, नूतन कविता
फिर भर दो -
बादल, गरजो!

शब्दार्थ: धाराधर - बादल | ललित - सुंदर | विद्युत-छबि - बिजली की चमक | उर - हृदय | वज्र - बिजली | नूतन - नया

भावार्थ: कवि बादलों को गरजने के लिए पुकार रहा है। पूरे आकाश को घेर लो। सुंदर, काले और घुँघराले बादल बच्चों की कल्पना जैसे लगते हैं। हृदय में बिजली की चमक लिए हुए तुम नया जीवन देने वाले कवि हो। अपने भीतर वज्र छिपाए हुए फिर से नई कविता भर दो।

बादल यहाँ सिर्फ़ बादल नहीं, क्रांति का प्रतीक है। कवि उसे इसलिए बुला रहा है कि वह सूखी और थकी दुनिया में नई चेतना भर दे। "वज्र छिपा" शब्द ही बता देता है कि यह कोमल पुकार नहीं है।

6. अट नहीं रही है

अट नहीं रही है
आभा फागुन की तन
सट नहीं रही है।

कहीं साँस लेते हो,
घर-घर भर देते हो,
उड़ने को नभ में तुम
पर-पर कर देते हो,
आँख हटाता हूँ तो
हट नहीं रही है।

शब्दार्थ: अट नहीं रही - समा नहीं रही | आभा - सुंदरता, चमक | सट नहीं रही - टिक नहीं रही | नभ - आकाश | पर-पर - पंख

भावार्थ: फागुन की सुंदरता इतनी बढ़ गई है कि कहीं समा नहीं रही और शरीर पर टिक नहीं रही। हे फागुन, तुम कहीं भी साँस लेते हो तो घर-घर सुगंध भर देते हो। आकाश में उड़ने के लिए मानो सबको पंख दे देते हो। कवि कहता है कि नज़र हटाना चाहता हूँ, पर हट ही नहीं रही।

यह उत्साह के बिलकुल उलट है - वहाँ ओज था, यहाँ कोमलता। इसी विविधता को NCERT में "निराला की प्रकृति-दृष्टि" कहकर पूछा जाता है। परीक्षा में यही सबसे आम प्रश्न है।

अगर आप भी लिखते हैं तो अपनी रचना ख़ुद की कलम के कविता प्लेटफ़ॉर्म पर मुफ़्त प्रकाशित कर सकते हैं।


 

प्रकृति, प्रेम और आत्मबल की कविताएँ

इन कविताओं में निराला का कोमल और चिंतनशील पक्ष दिखता है। यहाँ प्रकृति सजावट नहीं, संवाद का साथी है। "जूही की कली" इनमें सबसे ऐतिहासिक है।

7. जूही की कली

विजन-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहाग-भरी - स्नेह-स्वप्न-मग्न - अमल-कोमल-तनु तरुणी - जूही की कली,
दृग बंद किए, शिथिल - पत्रांक में,
वासन्ती निशा थी;
विरहविधुर प्रिया-संग छोड़
किसी दूर देश में था पवन।

शब्दार्थ: विजन - सुनसान | वल्लरी - लता | अमल - निर्मल | तनु - शरीर | दृग - आँखें | पत्रांक - पत्तों की गोद | निशा - रात | विरहविधुर - विरह से व्याकुल | पवन - हवा (यहाँ नायक)

भावार्थ: सुनसान वन की लता पर जूही की कली सो रही थी - सुहाग से भरी, प्रेम के सपनों में डूबी, निर्मल और कोमल शरीर वाली। आँखें बंद किए वह पत्तों की गोद में शिथिल पड़ी थी। बसंत की रात थी। उधर पवन अपनी प्रिया को छोड़कर किसी दूर देश में था।

यह कविता हिंदी साहित्य के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण है, और उसका कारण इसका विषय नहीं बल्कि इसका छंद है। इसी की पूरी कहानी नीचे दी गई है।

8. स्नेह-निर्झर बह गया है

स्नेह-निर्झर बह गया है!
रेत ज्यों तन रह गया है।
आम की यह डाल जो सूखी दिखी,
कह रही है - "अब यहाँ पिक या शिखी
नहीं आते, पुष्प-योजन-भर नहीं,
पंक्ति में हैं पत्र-पीले, हैं झरे"

शब्दार्थ: निर्झर - झरना | पिक - कोयल | शिखी - मोर | योजन - दूरी की माप

भावार्थ: प्रेम का झरना बह चुका है और शरीर रेत जैसा रह गया है। आम की सूखी डाल कह रही है कि अब यहाँ न कोयल आती है न मोर। कोसों तक कोई फूल नहीं है, बस पीले पत्ते क़तार में झर रहे हैं।

यह निराला की सबसे निजी कविताओं में है। सूखी डाल और झरे पत्ते उनके अपने जीवन के अकेलेपन का चित्र हैं।

9. बादल राग

तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया -
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया -
यह तेरी रण-तरी
भरी आकांक्षाओं से,
घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
उर में पृथ्वी के, आशाओं से
नवजीवन की, ऊँचा कर सिर,
ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल!

शब्दार्थ: समीर-सागर - हवा का समुद्र | दग्ध - जला हुआ | विप्लव - क्रांति | प्लावित - बाढ़ लाने वाली | रण-तरी - युद्ध की नाव | घन - बादल | भेरी - नगाड़ा | सुप्त - सोया हुआ

भावार्थ: हवा के समुद्र पर अस्थिर सुख के ऊपर दुख की छाया तैर रही है। दुनिया के जले हुए हृदय पर निर्दय क्रांति की बाढ़ फैली है। हे बादल, यह तुम्हारी युद्ध-नौका आकांक्षाओं से भरी है। तुम्हारे नगाड़े जैसे गर्जन से पृथ्वी के हृदय में सोए अंकुर जाग गए हैं और नए जीवन की आशा में सिर ऊँचा करके तुम्हें ताक रहे हैं।

बादल राग में निराला का क्रांति-स्वर सबसे प्रबल है। यहाँ बादल शोषित वर्ग की जागृति का प्रतीक है और "सोए अंकुर" वे लोग हैं जो अब उठने वाले हैं।

10. तुम और मैं

तुम तुंग हिमालय शृंग
और मैं चंचल गति सुर-सरिता।
तुम विमल हृदय उच्छ्वास
और मैं कान्त-कामिनी कविता॥

शब्दार्थ: तुंग - ऊँचा | शृंग - चोटी | सुर-सरिता - गंगा | विमल - निर्मल | उच्छ्वास - साँस | कान्त-कामिनी - सुंदर स्त्री

भावार्थ: तुम हिमालय की ऊँची चोटी हो और मैं चंचल गति से बहने वाली गंगा। तुम निर्मल हृदय की साँस हो और मैं सुंदर स्त्री जैसी कविता।

यह उनकी सबसे संगीतमय कविताओं में है। हर पंक्ति में "तुम" और "मैं" का यह संतुलन उनकी लय-साधना का उदाहरण है।


 

सरोज स्मृति - हिंदी का सबसे मार्मिक शोकगीत

सरोज स्मृति निराला की सबसे मार्मिक रचना है, जो उन्होंने अपनी बेटी सरोज की मृत्यु पर लिखी। यह हिंदी का सबसे प्रसिद्ध शोकगीत माना जाता है और शायद अकेली ऐसी लंबी रचना जिसमें एक पिता ने बेटी के लिए शोक लिखा हो।

11.

मुझ भाग्यहीन की तू संबल,
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही।

शब्दार्थ: संबल - सहारा | युग वर्ष - अनेक वर्ष | विकल - व्याकुल

भावार्थ: मुझ भाग्यहीन का तू ही सहारा थी। अनेक वर्षों बाद जब तू व्याकुल हुई, तब भी दुख ही जीवन की कहानी रही। आज क्या कहूँ जो अब तक नहीं कहा।

12.

धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
जाना तो अर्थागमोपाय,
पर रहा सदा संकुचितकाय।

शब्दार्थ: धन्ये - हे धन्य पुत्री | निरर्थक - बेकार | हित - भले के लिए | अर्थागमोपाय - धन कमाने के उपाय | संकुचितकाय - सिमटा हुआ

भावार्थ: हे धन्य पुत्री, मैं एक बेकार पिता था और तेरे लिए कुछ भी नहीं कर सका। धन कमाने के तरीक़े जानता तो था, पर हमेशा सिमटा ही रहा।

यही आत्मस्वीकार सरोज स्मृति को असाधारण बनाता है। निराला यहाँ अपनी ग़रीबी और असफलता को छिपाते नहीं, बेटी के सामने रख देते हैं। हिंदी में इतनी निर्मम आत्म-आलोचना दुर्लभ है।

सरोज की मृत्यु 1935 में हुई थी और निराला उस समय आर्थिक रूप से बेहद कठिन दौर में थे। वे बेटी के इलाज तक का ख़र्च नहीं उठा पाए थे।


राम की शक्तिपूजा - निराला की सबसे बड़ी रचना

राम की शक्तिपूजा निराला की सबसे महत्वपूर्ण लंबी कविता मानी जाती है, जो 1936 में लिखी गई। इसमें राम को विजयी नायक नहीं, संदेह से जूझते हुए मनुष्य के रूप में दिखाया गया है।

13.

रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा
अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर।
आज का दिवस भी था अपराजेय समर,
अन्तिम रश्मि, शीर्ष पर आया लोहित रुधिर।

शब्दार्थ: रवि - सूर्य | ज्योति के पत्र - प्रकाश के पन्ने | अपराजेय - जो हारा न जा सके | समर - युद्ध | रश्मि - किरण | लोहित रुधिर - लाल रक्त

भावार्थ: सूरज डूब गया और प्रकाश के पन्ने पर राम-रावण का अजेय युद्ध अमर होकर लिख गया। आज का दिन भी अनिर्णीत युद्ध का दिन था। अंतिम किरण सिर पर लाल रक्त जैसी आ गई।

कविता का मूल भाव: राम युद्ध में थक चुके हैं और उन्हें लगता है कि शक्ति रावण के पक्ष में है। वे आत्म-संदेह में डूब जाते हैं। फिर शक्ति की आराधना करते हैं और अंत में यह अनुभव होता है कि शक्ति उनके भीतर ही है।

निराला ने राम को देवता नहीं, हारते हुए इंसान के रूप में लिखा। यही इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता है। कहा जाता है कि यह कविता उनके अपने संघर्ष का प्रतिबिंब भी है। सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है - "शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन।"


 

⚠️ जूही की कली को सरस्वती ने छापने से मना कर दिया था

यह हिंदी कविता के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है, और ज़्यादातर पेजों पर यह कहानी अधूरी मिलती है। निराला ने "जूही की कली" 1916 के आसपास लिखी थी और उसे सरस्वती पत्रिका में भेजा। संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उसे छापने से मना कर दिया।

कारण विषय नहीं, छंद था। कविता मुक्त छंद में थी - यानी उसमें मात्रा और तुक का पारंपरिक बंधन नहीं था। द्विवेदी युग में कविता का मतलब ही निश्चित छंद था। बिना छंद की रचना को कविता मानना उस समय स्वीकार नहीं था।

यह कविता आख़िरकार 1922 में छपी और बाद में परिमल (1930) में संकलित हुई। तब तक हिंदी काव्य का माहौल बदल चुका था।

इस घटना का महत्व क्या है:

           यह हिंदी में मुक्त छंद की पहली कविता मानी जाती है। इसी के बाद हिंदी कविता छंद के बंधन से बाहर निकली।

           यह द्विवेदी युग और छायावाद के बीच का ठीक मोड़ है। द्विवेदी युग नियम चाहता था, निराला मुक्ति।

           परिमल की भूमिका में निराला ने इसी का उत्तर दिया - कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग होना है।

एक बात ध्यान रखिए - इसका मतलब यह नहीं कि द्विवेदी जी ग़लत थे। वे खड़ी बोली को स्थापित कर रहे थे और उसके लिए अनुशासन ज़रूरी था। निराला अगली पीढ़ी थे, जिन्हें उस अनुशासन को तोड़ना था। दोनों अपनी जगह सही थे।

आज हिंदी की लगभग सारी कविता मुक्त छंद में लिखी जाती है, और उसका रास्ता यहीं से खुला।

द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि पढ़ने हों तो मैथिलीशरण गुप्त की कविताएँ देखिए।


निराला की प्रमुख रचनाएँ

निराला ने कविता के अलावा उपन्यास, कहानी, निबंध और अनुवाद भी लिखे। उनकी रचनाओं का दायरा किसी भी छायावादी कवि से बड़ा है। नीचे उनकी मुख्य कृतियाँ दी गई हैं।

विधा

रचनाएँ

काव्य संग्रह

परिमल (1930), गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये पत्ते, अर्चना, आराधना, गीत गुंज

लंबी कविताएँ

राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, तुलसीदास

उपन्यास

अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा

कहानी संग्रह

लिली, सखी, सुकुल की बीवी, चतुरी चमार

निबंध और आलोचना

प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, चयन

अनुवाद

बांग्ला से - आनंद मठ, कपालकुंडला, देवी चौधरानी, श्री रामकृष्ण वचनामृत, राजयोग

विकिपुस्तक के अनुसार उन्होंने आनंद मठ, विष वृक्ष, कृष्णकांत का वसीयतनामा, कपालकुंडला, दुर्गेश नंदिनी, राज सिंह, राजरानी, देवी चौधरानी, चंद्रशेखर, रजनी, श्री रामकृष्ण वचनामृत और राजयोग का बांग्ला से हिंदी में अनुवाद किया।

हिंदी की और क्लासिक किताबें चाहिए तो हमारे हिंदी बुक स्टोर पर देखिए।


छायावाद के चार स्तंभ - निराला की जगह

छायावाद के चार प्रमुख कवि हैं - जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा। इनमें निराला सबसे विविध और सबसे विद्रोही माने जाते हैं।

कवि

मुख्य विशेषता

प्रमुख कृति

जयशंकर प्रसाद

दार्शनिकता, सांस्कृतिक गौरव

कामायनी

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

मुक्त छंद, यथार्थ, विद्रोह

राम की शक्तिपूजा, परिमल

सुमित्रानंदन पंत

प्रकृति-सौंदर्य, कोमलता

पल्लव

महादेवी वर्मा

वेदना, रहस्यवाद

यामा

निराला की जगह इसलिए अलग है कि वे छायावाद में रहते हुए भी उससे आगे निकल गए। "वह तोड़ती पत्थर" और "कुकुरमुत्ता" जैसी कविताएँ प्रगतिवाद की ओर इशारा करती हैं, जो छायावाद के बाद आया।

एक भ्रम दूर कर लीजिए - "नारी! तुम केवल श्रद्धा हो" जयशंकर प्रसाद की कामायनी से है, निराला की नहीं। निराला की सबसे प्रसिद्ध नारी-केंद्रित रचना "वह तोड़ती पत्थर" है।


निराला की रचनाओं की कॉपीराइट स्थिति

निराला की रचनाएँ 1 जनवरी 2022 से सार्वजनिक डोमेन में हैं। भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के अनुसार साहित्यिक कृतियों पर लेखक की मृत्यु के अगले कैलेंडर वर्ष से साठ वर्ष तक कॉपीराइट रहता है।

चरण

तिथि

निधन

15 अक्टूबर 1961

गणना शुरू

1 जनवरी 1962

साठ वर्ष पूरे

31 दिसंबर 2021

सार्वजनिक डोमेन से

1 जनवरी 2022

इसका मतलब है कि अब उनकी कविताओं का पूरा पाठ स्वतंत्र रूप से प्रकाशित किया जा सकता है। पर ध्यान रखिए कि किसी आधुनिक विद्वान की टीका, भूमिका या संपादित संस्करण की विशेष सामग्री पर अलग कॉपीराइट लागू रहता है।

तुलना के लिए - मैथिलीशरण गुप्त (निधन 1964) की रचनाएँ जनवरी 2025 से, रवीन्द्रनाथ ठाकुर की दिसंबर 2001 से और प्रेमचंद की 1997 से सार्वजनिक डोमेन में हैं।


NCERT में निराला की कौन सी कविताएँ हैं

निराला की दो कविताएँ - "उत्साह" और "अट नहीं रही है" - NCERT कक्षा 10 की क्षितिज भाग 2 में एक ही अध्याय में आती हैं। पाठ्यक्रम संशोधन के बाद यह अध्याय 4 या 5 के रूप में मिलता है, इसलिए अपनी पुस्तक का क्रमांक जाँच लीजिए।

कक्षा

पुस्तक

कविताएँ

कक्षा 10

क्षितिज भाग 2 (कोर्स A), पद्य खंड

उत्साह, अट नहीं रही है

कक्षा 11-12

विभिन्न बोर्ड

बादल राग, वह तोड़ती पत्थर

बी.ए. हिंदी

छायावाद का पाठ

राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति

कक्षा 10 हिंदी क्षितिज के अध्याय 4 में निराला की दो प्रसिद्ध कविताएँ "उत्साह" और "अट नहीं रही है" शामिल हैं। उत्साह में बादलों के माध्यम से नवजागरण, परिवर्तन और क्रांति का संदेश है, जबकि अट नहीं रही है में फागुन ऋतु के सौंदर्य और प्रकृति की मादकता का चित्रण है।


परीक्षा में निराला की कविताओं पर क्या पूछा जाता है

निराला पर सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला प्रश्न "उत्साह और अट नहीं रही है के आधार पर निराला की प्रकृति-दृष्टि" है। इसका उत्तर विविधता पर केंद्रित होना चाहिए - एक कविता में ओज और दूसरी में कोमलता।

उत्तर लिखने का सही तरीक़ा:

           प्रकृति-दृष्टि वाला प्रश्न: दोनों रूप बताइए - उत्साह में बादल ओजस्वी और क्रांतिकारी हैं, अट नहीं रही है में फागुन कोमल और मादक। यही विविधता उत्तर का केंद्र है।

           प्रतीक स्पष्ट कीजिए: उत्साह में बादल क्रांति का प्रतीक है, सिर्फ़ मौसम नहीं। यह लिखे बिना उत्तर अधूरा है।

           काव्य सौंदर्य: भाषा (खड़ी बोली, तत्सम शब्दावली), छंद (मुक्त छंद), और लाक्षणिकता का उल्लेख कीजिए।

           जीवन परिचय: मुक्त छंद के प्रवर्तक और छायावाद के चार स्तंभों में एक - ये दो बातें हर उत्तर में आ सकती हैं।

वे ग़लतियाँ जो नंबर काटती हैं:

           निराला को द्विवेदी युग का कवि लिख देना: वे छायावाद के हैं। द्विवेदी युग के प्रतिनिधि मैथिलीशरण गुप्त हैं।

           "नारी! तुम केवल श्रद्धा हो" उनकी पंक्ति बताना: यह जयशंकर प्रसाद की कामायनी से है।

           उत्साह में बादल को सिर्फ़ प्रकृति-वर्णन मान लेना: वह क्रांति और नवजागरण का प्रतीक है।

           मुक्त छंद और छंदमुक्त को अलग समझ लेना: दोनों एक ही हैं। निराला इसी के प्रवर्तक हैं।

           सरोज स्मृति और राम की शक्तिपूजा मिला देना: पहली बेटी की मृत्यु पर शोकगीत है, दूसरी राम के आत्म-संघर्ष पर।

           जन्म वर्ष: अधिकतर स्रोत 1896 देते हैं, कुछ 1899। परीक्षा में अपनी पाठ्यपुस्तक का वर्ष लिखिए।

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मुख्य बातें (Key Takeaways)

           सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" का जन्म 1896 में बंगाल के महिषादल में हुआ और निधन 15 अक्टूबर 1961 को इलाहाबाद में। पैतृक गाँव उन्नाव का गढ़ाकोला था।

           वे छायावाद के चार स्तंभों में से एक हैं और हिंदी में मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं।

           उनकी पहली मुक्त छंद कविता "जूही की कली" को सरस्वती पत्रिका ने छंद न होने के कारण छापने से मना कर दिया था। यह हिंदी कविता का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।

           परिमल (1930) की भूमिका में उन्होंने लिखा कि मनुष्य की तरह कविता की भी मुक्ति होती है, और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग होना है।

           "वह तोड़ती पत्थर" हिंदी की पहली सच्ची मज़दूर-कविता मानी जाती है और यही उन्हें बाक़ी छायावादियों से अलग करती है।

           "सरोज स्मृति" उनकी बेटी सरोज की मृत्यु पर लिखा गया शोकगीत है और हिंदी का सबसे मार्मिक शोकगीत माना जाता है।

           NCERT कक्षा 10 की क्षितिज भाग 2 में उनकी दो कविताएँ हैं - उत्साह और अट नहीं रही है, दोनों एक ही अध्याय में।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. निराला की सबसे प्रसिद्ध कविता कौन सी है?
"वह तोड़ती पत्थर" उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता है, जो इलाहाबाद की सड़क पर पत्थर तोड़ती एक मज़दूर स्त्री पर लिखी गई है। साहित्यिक दृष्टि से "राम की शक्तिपूजा" उनकी सबसे महत्वपूर्ण रचना मानी जाती है। NCERT कक्षा 10 में "उत्साह" और "अट नहीं रही है" पढ़ाई जाती हैं।

Q2. निराला को मुक्त छंद का प्रवर्तक क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उन्होंने हिंदी में पहली बार बिना मात्रा और तुक के बंधन वाली कविता लिखी। उनकी "जूही की कली" हिंदी की पहली मुक्त छंद कविता मानी जाती है। परिमल की भूमिका में उन्होंने लिखा कि कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग होना है।

Q3. जूही की कली को सरस्वती ने क्यों नहीं छापा था?
कारण विषय नहीं, छंद था। कविता मुक्त छंद में थी और उसमें पारंपरिक मात्रा तथा तुक का बंधन नहीं था। द्विवेदी युग में कविता का अर्थ ही निश्चित छंद था, इसलिए संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसे छापने से मना कर दिया। यह कविता बाद में 1922 में छपी।

Q4. निराला किस काव्य-धारा के कवि हैं?
वे छायावाद के कवि हैं और उसके चार प्रमुख स्तंभों में गिने जाते हैं। बाक़ी तीन हैं जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा। निराला बाक़ी तीनों से अलग हैं क्योंकि उन्होंने कल्पना कम और यथार्थ ज़्यादा लिखा।

Q5. सरोज स्मृति किस पर लिखी गई है?
सरोज स्मृति निराला ने अपनी बेटी सरोज की मृत्यु पर लिखी थी, जिसका निधन 1935 में हुआ। यह हिंदी का सबसे प्रसिद्ध शोकगीत माना जाता है। इसमें निराला अपनी ग़रीबी और असफलता को छिपाते नहीं, बल्कि खुलकर स्वीकार करते हैं।

Q6. "उत्साह" कविता में बादल किसका प्रतीक है?
उत्साह में बादल क्रांति, नवजागरण और परिवर्तन का प्रतीक है, सिर्फ़ मौसम नहीं। कवि बादल को गरजने के लिए पुकारता है ताकि वह सूखी और थकी दुनिया में नई चेतना भर दे। "वज्र छिपा" शब्द ही बताता है कि यह कोमल पुकार नहीं है।

Q7. राम की शक्तिपूजा की विशेषता क्या है?
इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें राम को विजयी देवता नहीं, आत्म-संदेह से जूझते मनुष्य के रूप में दिखाया गया है। युद्ध में थके राम को लगता है कि शक्ति रावण के पक्ष में है। अंत में उन्हें अनुभव होता है कि शक्ति उनके भीतर ही है।

Q8. निराला की भाषा-शैली की क्या विशेषता है?
उन्होंने खड़ी बोली का प्रयोग किया और उनकी कविताओं में तत्सम शब्दावली की अधिकता है। छायावादी रचनाकारों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उनकी भाषा में लाक्षणिकता है और कविताओं में संगीतात्मकता का सुंदर निर्वाह मिलता है।

Q9. कुकुरमुत्ता कविता किस बारे में है?
कुकुरमुत्ता हिंदी की सबसे प्रसिद्ध व्यंग्य कविता है, जिसमें कुकुरमुत्ता गुलाब को फटकारता है। गुलाब यहाँ विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का प्रतीक है और कुकुरमुत्ता आम आदमी का। निराला ने इसमें "कैपिटलिस्ट" जैसे अंग्रेज़ी शब्द भी बेझिझक इस्तेमाल किए।

Q10. क्या निराला की रचनाएँ कॉपीराइट में हैं?
नहीं, उनकी रचनाएँ 1 जनवरी 2022 से सार्वजनिक डोमेन में हैं। उनका निधन 15 अक्टूबर 1961 को हुआ और भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के अनुसार साठ वर्ष की गणना 1 जनवरी 1962 से शुरू होकर 31 दिसंबर 2021 को पूरी हुई। हालाँकि किसी आधुनिक विद्वान की टीका पर अलग कॉपीराइट लागू हो सकता है।

Q11. NCERT में निराला की कौन सी कविताएँ हैं?
NCERT कक्षा 10 की क्षितिज भाग 2 में उनकी दो कविताएँ एक ही अध्याय में हैं - "उत्साह" और "अट नहीं रही है"। पाठ्यक्रम संशोधन के बाद यह अध्याय 4 या 5 के रूप में मिलता है, इसलिए अपनी पाठ्यपुस्तक का क्रमांक ज़रूर जाँच लें।

Q12. क्या मैं भी अपनी कविता ऑनलाइन प्रकाशित कर सकता हूँ?
हाँ, ख़ुद की कलम के कविता प्लेटफ़ॉर्म पर कोई भी लेखक मुफ़्त में अपनी कविता, गीत या शायरी प्रकाशित कर सकता है। अगर आप अपनी रचनाओं की किताब छपवाना चाहते हैं तो प्रकाशन सेवा ₹9,999 से शुरू होती है।


निष्कर्ष

निराला को पढ़ते समय एक बात ध्यान रखिए - वे एक ही तरह के कवि नहीं हैं। "राम की शक्तिपूजा" की भाषा संस्कृतनिष्ठ और भारी है, जबकि "वह तोड़ती पत्थर" इतनी सादी कि कोई भी समझ ले। दोनों एक ही व्यक्ति ने लिखीं, और यही उनका असली कमाल है।

शुरुआत "वह तोड़ती पत्थर" और "भिक्षुक" से कीजिए, फिर "उत्साह" पर आइए और सबसे अंत में "राम की शक्तिपूजा" तथा "सरोज स्मृति" पढ़िए। ये दोनों लंबी और भारी हैं, पर वहीं निराला अपने पूरे क़द में मिलते हैं।

✍️ आपकी अपनी कलम का क्या?

निराला की पहली मुक्त छंद कविता उस दौर की सबसे बड़ी पत्रिका ने छापने से मना कर दी थी। उन्होंने लिखना बंद नहीं किया - और आज पूरी हिंदी कविता उसी मुक्त छंद में लिखी जाती है।

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