रहीम के दोहे ( Rahim ke Dohe )
रहीम के दोहे अर्थ सहित 2026 | 35 प्रसिद्ध दोहे शब्दार्थ सहित
रहीम के दोहे अर्थ सहित : 35 प्रसिद्ध दोहे, शब्दार्थ और भावार्थ
रहीम के दोहे ब्रजभाषा में लिखी वे दो पंक्तियाँ हैं जिनमें दरबार का अनुभव और आम आदमी की समझ एक साथ मिलती है। अब्दुर्रहीम खानखाना अकबर के नवरत्नों में थे, पर उन्होंने लिखा उन लोगों के लिए जो दरबार से बहुत दूर थे। इस पेज पर 35 प्रसिद्ध दोहे विषय के अनुसार, शब्दार्थ और भावार्थ के साथ दिए गए हैं।
रहीम की ख़ासियत यह है कि वे उपदेश नहीं देते, उदाहरण देते हैं। धागा, मेहंदी, सुई, चंदन, कोयल, फटा दूध - इन्हीं रोज़मर्रा की चीज़ों से वे जीवन की सबसे बड़ी बात कह देते हैं। इसी वजह से उनके दोहे स्कूल की किताबों से लेकर बातचीत तक जीवित हैं।
इस पेज पर एक ऐसा हिस्सा भी है जो आपको ज़्यादातर जगह नहीं मिलेगा - कौन से लोकप्रिय दोहे असल में रहीम के हैं ही नहीं। इंटरनेट पर कबीर के कई दोहे रहीम के नाम से छपे हुए हैं, और परीक्षा में यही ग़लती भारी पड़ती है।
रहीम के दोहे आज भी क्यों पढ़े जाते हैं
रहीम के दोहे आज भी पढ़े जाते हैं क्योंकि वे धर्म की नहीं, व्यवहार की बात करते हैं। मित्रता, विपत्ति, विनम्रता, परोपकार और सही समय - ये विषय किसी युग में पुराने नहीं होते। रहीम इन्हें ऐसी उपमाओं से समझाते हैं जो हर पाठक के अनुभव में पहले से मौजूद हैं।
दूसरी वजह उनका जीवन है। रहीम मुग़ल दरबार के सबसे ऊँचे पदों पर रहे और बाद में बुरे दिन भी देखे। इसीलिए जब वे "रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर" लिखते हैं, तो वह किताबी सलाह नहीं लगती।
तीसरी वजह उनकी भाषा है। एक मुसलमान सिपहसालार ने ब्रजभाषा में लिखा, कृष्ण और राम के उदाहरण दिए और गंगा-जमुनी तहज़ीब का सबसे सुंदर उदाहरण बन गए। हिंदी साहित्य में रहीम की जगह इसी वजह से अलग है।
📜 जल्दी में हैं? सीधे जाएँ: नीति के दोहे • मित्रता और संबंध • समय और विपत्ति • परोपकार • ⚠️ जो दोहे रहीम के नहीं हैं
रहीम का संक्षिप्त परिचय
रहीम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था और उनका जन्म 17 दिसंबर 1556 को लाहौर में हुआ। वे अकबर के संरक्षक बैरम खान के पुत्र थे और आगे चलकर अकबर के नवरत्नों में शामिल हुए। उनका निधन 1627 में दिल्ली में हुआ, जहाँ आज भी उनका मक़बरा है।
सक्सेसCDS के अनुसार रहीम का जन्म 17 दिसंबर 1556 को लाहौर में हुआ और उन्हें अकबर के दरबार में नवरत्न की उपाधि मिली थी। उनका पूरा नाम अब्दुल रहीम खान-ए-खाना था। अकबर ने उन्हें गुजरात का सूबेदार नियुक्त कर "ख़ानख़ाना" की उपाधि दी। जहाँगीर के शासनकाल में उन्हें कारावास भी झेलना पड़ा, किंतु बाद में सम्मान सहित पुनः स्थान मिला।
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विवरण |
जानकारी |
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पूरा नाम |
अब्दुर्रहीम खानखाना (मिर्ज़ा खान) |
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जन्म |
17 दिसंबर 1556, लाहौर |
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निधन |
1627 ई., दिल्ली |
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पिता |
बैरम खान (अकबर के संरक्षक) |
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माता |
सुल्ताना बेगम |
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उपाधि |
खानखाना, अकबर के नवरत्नों में एक |
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पद |
गुजरात का सूबेदार, मुग़ल सेना के प्रधान सेनापति |
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भाषाएँ |
ब्रजभाषा, अवधी, संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, तुर्की |
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मक़बरा |
निज़ामुद्दीन, दिल्ली |
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साहित्यिक काल |
भक्तिकाल (रीतिकाल की ओर संक्रमण) |
रहीम सिर्फ़ कवि नहीं थे। उन्होंने बाबरनामा का तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद किया, ज्योतिष पर संस्कृत में लिखा और युद्धकला में भी दक्ष थे। एक इंसान का इतनी भाषाओं और इतने क्षेत्रों में एक साथ काम करना उस दौर में भी असाधारण था।
हिंदी साहित्य के और बड़े नाम पढ़ने हों तो हमारा लेखक संग्रह देखिए।
नीति और व्यवहार पर रहीम के दोहे
नीति के दोहों में रहीम बताते हैं कि इंसान को बोलना कैसे चाहिए और किन जगहों से दूर रहना चाहिए। इनमें आत्मसम्मान, विनम्रता और सही संगति पर ज़ोर है। ये आठ दोहे रहीम के सबसे ज़्यादा उद्धृत नीति-दोहे हैं।
1.
बड़े बड़ाई ना करैं, बड़ो न बोलैं बोल।
रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मेरो मोल॥
शब्दार्थ: बड़ाई - प्रशंसा | टका - सिक्का, रुपया | मोल - मूल्य
भावार्थ: जिनमें सचमुच बड़प्पन होता है, वे अपनी तारीफ़ ख़ुद नहीं करते। हीरा कितना भी क़ीमती हो, वह कभी नहीं कहता कि मेरा दाम लाख रुपये है। उसकी क़ीमत उसकी चमक बताती है, उसकी ज़ुबान नहीं।
2.
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि॥
शब्दार्थ: लघु - छोटा | डारि - फेंकना, तिरस्कार करना | तरवारि - तलवार
भावार्थ: बड़ी चीज़ मिल जाने पर छोटी को फेंक मत दीजिए। हर वस्तु का अपना काम है। जहाँ सुई का काम है वहाँ तलवार बेकार है, चाहे वह कितनी भी बड़ी हो। यही बात लोगों पर भी लागू होती है।
3.
रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती सहत कपाल॥
शब्दार्थ: जिह्वा - जीभ | बावरी - पगली | सरग - स्वर्ग | कपाल - सिर, माथा
भावार्थ: जीभ पगली है, बिना सोचे स्वर्ग से पाताल तक की बात कह जाती है। कहकर वह मुँह के भीतर छिप जाती है और मार सिर को खानी पड़ती है। बिना सोचे बोलने का नतीजा यही होता है कि भुगतना कोई और हिस्सा भुगतता है।
4.
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥
शब्दार्थ: प्रकृति - स्वभाव | कुसंग - बुरी संगति | व्यापत - असर करना | भुजंग - साँप
भावार्थ: जिसका स्वभाव अच्छा है, उसे बुरी संगति भी नहीं बिगाड़ पाती। चंदन के पेड़ से साँप लिपटे रहते हैं, फिर भी चंदन में ज़हर नहीं उतरता और उसकी ख़ुशबू वैसी ही रहती है।
5.
रहिमन ओछे नरन सों, बैर भली ना प्रीति।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँति विपरीति॥
शब्दार्थ: ओछे - तुच्छ, छिछोरे | स्वान - कुत्ता | विपरीति - नुक़सानदेह
भावार्थ: ओछे लोगों से न दुश्मनी अच्छी है और न दोस्ती। कुत्ता काटे तो भी नुक़सान और चाटे तो भी। दोनों ही स्थितियाँ हानिकारक हैं, इसलिए ऐसे लोगों से बस दूरी बेहतर है।
6.
रहिमन मोहि न सुहाय, अमी पिआवै मान बिनु।
बरु विष देय बुलाय, मान सहित मरिबो भलो॥
शब्दार्थ: अमी - अमृत | मान - सम्मान | बरु - बल्कि | मरिबो - मरना
भावार्थ: बिना सम्मान के कोई अमृत भी पिलाए तो मुझे नहीं भाता। इससे अच्छा है कोई इज़्ज़त से बुलाकर ज़हर दे दे। रहीम के लिए सम्मान जीवन से बड़ा मूल्य है, और यह बात उन्होंने दरबार में रहते हुए लिखी।
7.
आदर घटै नरेस ढिग, बसे रहे कछु नाहिं।
जो रहीम कोटिन मिलै, धिग जीवन जग माहिं॥
शब्दार्थ: नरेस - राजा | ढिग - पास, निकट | कोटिन - करोड़ों | धिग - धिक्कार
भावार्थ: जिस जगह आपका आदर घटता जाए, वहाँ रुकने का कोई फ़ायदा नहीं, चाहे वह राजा का दरबार ही क्यों न हो। वहाँ करोड़ों मिलें तो भी ऐसा जीवन धिक्कार के योग्य है। यह दोहा नौकरी बदलने पर आज भी उतना ही सटीक बैठता है।
8.
रहिमन नीर पखान, बूड़े पै सीझै नहीं।
तैसे मूरख ज्ञान, बूझै पै सूझै नहीं॥
शब्दार्थ: नीर - पानी | पखान - पत्थर | बूड़े - डूबा रहना | सीझै - नरम होना
भावार्थ: पत्थर पानी में पड़ा रहे तो भी नरम नहीं होता। मूर्ख को कितना भी ज्ञान दो, उसकी समझ में कुछ नहीं आता। सीखने की इच्छा न हो तो शिक्षा बेअसर रहती है।
कबीर के दोहों में यही तीखापन और सीधा मिलता है। तुलना करके पढ़ना हो तो कबीर के दोहे पढ़िए।
मित्रता और संबंधों पर रहीम के दोहे
संबंधों वाले दोहों में रहीम रिश्तों की नाज़ुकी समझाते हैं। इनमें प्रेम, मनाना, दूरी और असंगत जोड़ी - सब पर बात है। ये सात दोहे रिश्तों पर रहीम की सबसे गहरी समझ दिखाते हैं।
9.
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परि जाय॥
शब्दार्थ: तोरो - तोड़ो | चटकाय - झटके से | जुरे - जुड़ना | गाँठ - गिरह
भावार्थ: प्रेम का धागा झटके से मत तोड़िए। एक बार टूट गया तो जुड़ता नहीं, और जुड़ भी जाए तो बीच में गाँठ पड़ जाती है। रहीम का यह सबसे प्रसिद्ध दोहा है और आज भी हर रिश्ते पर लागू होता है।
10.
रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार॥
शब्दार्थ: सुजन - सज्जन, भला व्यक्ति | पोइए - पिरोना | मुक्ता - मोती
भावार्थ: अच्छा इंसान सौ बार भी रूठे तो हर बार मनाइए। जैसे मोतियों का हार टूट जाए तो उसे फिर से पिरो लिया जाता है, फेंका नहीं जाता। सज्जन मित्र मोती की तरह क़ीमती होता है।
11.
कहु रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग।
वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग॥
शब्दार्थ: बेर - काँटेदार पेड़ | केर - केला | डोलत - हिलना | फाटत - फटना
भावार्थ: बेर और केले का साथ कैसे निभेगा। बेर अपनी मस्ती में हिलता है और उसके काँटों से केले के पत्ते फट जाते हैं। जिनके स्वभाव मेल न खाते हों, उनकी दोस्ती टिकती नहीं।
12.
रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥
शब्दार्थ: विपदा - मुसीबत | भली - अच्छी | हित - भला चाहने वाला | अनहित - बुरा चाहने वाला
भावार्थ: थोड़े दिन की मुसीबत भी अच्छी है, क्योंकि उसी में पता चलता है कि कौन अपना है और कौन पराया। रहीम मुसीबत को नुक़सान नहीं, पहचान का ज़रिया मानते हैं।
13.
रहिमन जो तुम्हरे रहत, गति समुझै नहिं कोय।
ज्यों माला के सुमन में, लाल गुहा नहिं होय॥
शब्दार्थ: गति - हालत, दशा | सुमन - फूल | गुहा - गुँथा हुआ
भावार्थ: जो आपके साथ रहते हैं, वही अक्सर आपकी असली हालत नहीं समझ पाते। जैसे फूलों की माला में लाल मणि गूँथी हो तो वह फूलों के बीच अलग से दिखती ही नहीं। नज़दीकी कभी-कभी समझ में बाधा बन जाती है।
14.
रहिमन अँसुवा नयन ढरि, जिय दुख प्रगट करेइ।
जाहि निकारो गेह ते, कस न भेद कहि देइ॥
शब्दार्थ: अँसुवा - आँसू | नयन - आँख | ढरि - ढुलककर | गेह - घर | भेद - राज़
भावार्थ: आँसू आँखों से बहकर मन का दुख ज़ाहिर कर देते हैं। इसी तरह जिसे घर से निकाल दिया जाए, वह घर का भेद बाहर कह ही देता है। किसी को बेइज़्ज़त करके निकालने का नतीजा यही होता है।
15.
दोनों रहिमन एक से, जौं लौं बोलत नाहिं।
जान परत हैं काक पिक, ऋतु बसंत के माहिं॥
शब्दार्थ: जौं लौं - जब तक | काक - कौआ | पिक - कोयल
भावार्थ: कौआ और कोयल दोनों काले हैं, इसलिए जब तक बोलते नहीं, फ़र्क़ नहीं दिखता। बसंत आते ही कोयल की आवाज़ से दोनों का अंतर साफ़ हो जाता है। इंसान की असली पहचान भी उसके बोलने से होती है।
समय, विपत्ति और धैर्य पर रहीम के दोहे
समय वाले दोहों में रहीम बुरे दिनों से निपटने का तरीक़ा बताते हैं। इनका मूल संदेश यही है कि हालात बदलते हैं, इसलिए चुप रहना और टिके रहना सीखिए। ये सात दोहे रहीम के अपने उतार-चढ़ाव से निकले हैं।
16.
रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥
शब्दार्थ: दिनन के फेर - समय का चक्र | नीके - अच्छे | बनत - काम बनना
भावार्थ: बुरा वक़्त चल रहा हो तो चुप बैठ जाइए। जब अच्छे दिन आएँगे तो काम बनते देर नहीं लगेगी। रहीम ख़ुद जहाँगीर के दौर में मुश्किल में पड़े थे, इसलिए यह अनुभव की बात है।
17.
पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन।
अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछे कौन॥
शब्दार्थ: पावस - बरसात | कोइल - कोयल | दादुर - मेंढक | वक्ता - बोलने वाला
भावार्थ: बरसात में कोयल चुप हो जाती है क्योंकि तब मेंढकों का शोर चलता है। रहीम कहते हैं कि अब हमें कौन पूछे। कुछ समय ऐसे आते हैं जब गुणवान को चुप रहना पड़ता है और शोर मचाने वालों की चलती है।
18.
समय पाइ फल होत है, समय पाइ झरि जात।
सदा रहै नहिं एक सी, का रहीम पछितात॥
शब्दार्थ: झरि जात - झड़ जाना | पछितात - पछताना
भावार्थ: समय आने पर फल लगते हैं और समय आने पर झड़ जाते हैं। हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते, इसलिए पछताने का कोई मतलब नहीं। यही बात सुख और दुख दोनों पर लागू होती है।
19.
जैसी परै सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह।
धरती ही पर परत है, सीत घाम औ मेह॥
शब्दार्थ: सहि रहे - सहन करना | सीत - सर्दी | घाम - धूप | मेह - बारिश
भावार्थ: जो पड़े उसे सह लीजिए, यह शरीर इसीलिए है। धरती पर सर्दी, धूप और बारिश तीनों पड़ती हैं और वह सब सह लेती है। सहनशीलता को रहीम कमज़ोरी नहीं, ताक़त मानते हैं।
20.
बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥
शब्दार्थ: बिगरी - बिगड़ी | लाख करौ - चाहे जितनी कोशिश करो | मथे - मथना
भावार्थ: एक बार बात बिगड़ जाए तो लाख कोशिश करने पर भी नहीं बनती। जैसे दूध फट जाए तो उसे मथकर मक्खन नहीं निकाला जा सकता। इसलिए बात बिगाड़ने से पहले सोच लीजिए।
21.
निज कर क्रिया रहीम कहि, सीधी भावी के हाथ।
पाँसा अपने हाथ में, दाँव न अपने हाथ॥
शब्दार्थ: निज कर - अपने हाथ | भावी - भाग्य, होनी | पाँसा - चौपड़ का पासा
भावार्थ: कर्म अपने हाथ में है, नतीजा भाग्य के हाथ में। जैसे चौपड़ में पासा आपके हाथ में होता है, पर कौन सा दाँव पड़ेगा यह आपके हाथ में नहीं। यह दोहा मेहनत और नतीजे का फ़र्क़ साफ़ करता है।
22.
रहिमन कुटिल कुठार ज्यों, करि डारत द्वै टूक।
चतुरन को कसकत रहे, समय चूक की हूक॥
शब्दार्थ: कुटिल - टेढ़ी | कुठार - कुल्हाड़ी | द्वै टूक - दो टुकड़े | हूक - टीस
भावार्थ: कुल्हाड़ी की तरह कुछ बातें रिश्ते के दो टुकड़े कर देती हैं। समझदार लोगों को सही समय चूक जाने की टीस देर तक कसकती रहती है। मौक़ा निकल जाने का दर्द सबसे लंबा चलता है।
परोपकार और बड़प्पन पर रहीम के दोहे
परोपकार के दोहों में रहीम बताते हैं कि सच्ची बड़ाई देने से आती है, रखने से नहीं। पेड़, नदी, मेहंदी और कीचड़ जैसे उदाहरण इसी बात को सिद्ध करते हैं। ये आठ दोहे रहीम के जीवन-दर्शन का सार हैं।
23.
तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहिं सुजान॥
शब्दार्थ: तरुवर - पेड़ | सरवर - तालाब | पान - पानी | सँचहिं - संचय करना | सुजान - सज्जन
भावार्थ: पेड़ अपने फल ख़ुद नहीं खाता और तालाब अपना पानी ख़ुद नहीं पीता। इसी तरह सज्जन लोग जो जोड़ते हैं, वह दूसरों के काम आने के लिए होता है। यह रहीम का सबसे उद्धृत परोपकार-दोहा है।
24.
वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटन वारे को लगे, ज्यों मेहँदी को रंग॥
शब्दार्थ: धन्य - सराहनीय | पर उपकारी - दूसरों का भला करने वाला | बाँटन वारे - बाँटने वाला
भावार्थ: वे लोग धन्य हैं जिनका जीवन दूसरों के काम आता है। जैसे मेहँदी बाँटने वाले के हाथ भी अपने आप रँग जाते हैं, वैसे ही भलाई करने वाले पर उसका रंग चढ़ ही जाता है।
25.
धनि रहीम जल पंक को, लघु जिय पियत अघाय।
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय॥
शब्दार्थ: पंक - कीचड़ | लघु जिय - छोटे जीव | अघाय - तृप्त होना | उदधि - समुद्र
भावार्थ: कीचड़ का थोड़ा सा पानी धन्य है, क्योंकि उससे छोटे जीव प्यास बुझा लेते हैं। समुद्र की बड़ाई किस काम की, जिसके किनारे जाकर भी दुनिया प्यासी लौटती है। बड़ा होना नहीं, काम आना बड़ी बात है।
26.
जे गरीब पर हित करैं, ते रहीम बड़ लोग।
कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥
शब्दार्थ: हित - भलाई | बापुरो - बेचारा, तुच्छ | मिताई - मित्रता | जोग - योग्य
भावार्थ: जो ग़रीब के काम आते हैं, वही असल में बड़े लोग हैं। सुदामा कहाँ कृष्ण जैसी मित्रता के योग्य थे, फिर भी कृष्ण ने निभाई। बड़प्पन पद से नहीं, व्यवहार से तय होता है।
27.
छिमा बड़न को चाहिए, छोटन को उतपात।
कहा रहीम हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात॥
शब्दार्थ: छिमा - क्षमा | उतपात - शरारत | घट्यो - कम हुआ | भृगु - एक ऋषि
भावार्थ: बड़ों को क्षमा शोभा देती है और छोटों को शरारत। भृगु ऋषि ने विष्णु की छाती पर लात मार दी थी, पर इससे विष्णु का क्या घट गया। बड़ा वही है जो माफ़ कर सके।
28.
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।
जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय॥
शब्दार्थ: दीन - ग़रीब, दुखी | लखत - देखता है | दीनबंधु - ग़रीबों का सहारा, ईश्वर
भावार्थ: ग़रीब सबकी ओर देखता है, पर उसकी ओर कोई नहीं देखता। जो ग़रीब की सुध लेता है, वह ईश्वर के समान हो जाता है। रहीम अपनी दानशीलता के लिए मशहूर थे, इसलिए यह दोहा उनके जीवन से जुड़ा है।
29.
जो बड़ेन को लघु कहैं, नहिं रहीम घटि जाहिं।
गिरिधर मुरलीधर कहें, कछु दुख मानत नाहिं॥
शब्दार्थ: बड़ेन - बड़ों को | लघु - छोटा | घटि जाहिं - कम हो जाना
भावार्थ: बड़े को छोटा कह देने से उसका बड़प्पन घट नहीं जाता। कृष्ण को गिरिधर के बजाय मुरलीधर कह दें तो उन्हें बुरा नहीं लगता। जो सचमुच बड़ा है, वह नाम से नहीं घबराता।
30.
एके साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥
शब्दार्थ: साधे - साधना, ध्यान देना | मूलहिं - जड़ को | सींचिबो - सींचना | अघाय - भरपूर
भावार्थ: एक काम पर ध्यान दो तो सब सध जाता है, सब पर एक साथ दो तो कुछ नहीं होता। पेड़ की सिर्फ़ जड़ सींचिए, फूल और फल अपने आप आ जाएँगे। यह दोहा आज की भाषा में फ़ोकस की सबसे सटीक परिभाषा है।
प्रेम, भक्ति और अन्य प्रसिद्ध दोहे
इन दोहों में रहीम माँगने, संतोष और ईश्वर पर बात करते हैं। इनका स्वर नीति से हटकर ज़्यादा निजी है। ये पाँच दोहे रहीम के दूसरे पहलू दिखाते हैं।
31.
रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं॥
शब्दार्थ: नर - मनुष्य | कहुँ - कहीं | मुए - मरे हुए | निकसत - निकलना
भावार्थ: जो माँगने की नौबत तक पहुँच गया, वह मरे के समान है। पर उससे भी पहले वह मर चुका है जिसके मुँह से माँगने वाले के लिए हाँ नहीं निकलती। रहीम की दानशीलता इसी सोच से आती थी।
32.
चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥
शब्दार्थ: चाह - इच्छा, लालसा | मनुआ - मन | साहन के साह - राजाओं के राजा
भावार्थ: इच्छा गई तो चिंता भी गई और मन बेपरवाह हो गया। जिन्हें कुछ नहीं चाहिए, वही असल में बादशाहों के बादशाह हैं। संतोष को रहीम सबसे बड़ी संपत्ति मानते हैं।
33.
गरज आपनी आप सों, रहिमन कही न जाय।
जैसे कुल की कुलवधू, पर घर जात लजाय॥
शब्दार्थ: गरज - ज़रूरत | कुलवधू - अच्छे घर की बहू | लजाय - शर्माना
भावार्थ: अपनी ज़रूरत किसी से कहते नहीं बनता। स्वाभिमानी आदमी उसे मन में ही रखता है, जैसे अच्छे घर की बहू पराए घर जाते हुए संकोच करती है।
34.
रहिमन अँगुरी बाँधि कै, बीन बजावै लोय।
बिनु अँगुरी दै तार को, बाजत कबहुँ न होय॥
शब्दार्थ: अँगुरी - उँगली | बीन - वीणा | लोय - लोग | तार - वीणा का तार
भावार्थ: उँगली रखकर ही वीणा बजती है, बिना उँगली दिए तार से आवाज़ नहीं निकलती। मेहनत लगाए बिना नतीजा नहीं मिलता, चाहे साधन कितना भी अच्छा हो।
35.
रहिमन प्रीति सराहिए, मिले होत रँग दून।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून॥
शब्दार्थ: सराहिए - प्रशंसा कीजिए | दून - दुगुना | जरदी - पीलापन | हरदी - हल्दी | चून - चूना
भावार्थ: उस प्रेम की तारीफ़ कीजिए जिसमें मिलने पर रंग दुगुना हो जाए। जैसे हल्दी अपना पीलापन और चूना अपनी सफ़ेदी छोड़ देता है, और दोनों मिलकर नया लाल रंग बन जाते हैं। सच्चे रिश्ते में दोनों बदलते हैं।
अगर आप भी लिखते हैं तो अपनी रचना ख़ुद की कलम के कविता प्लेटफ़ॉर्म पर मुफ़्त प्रकाशित कर सकते हैं।
⚠️ ये लोकप्रिय दोहे रहीम के नहीं हैं
इंटरनेट पर कबीर के कई दोहे रहीम के नाम से छपे हुए हैं। परीक्षा में ग़लत कवि का नाम लिखने पर पूरे प्रश्न के अंक कट जाते हैं। नीचे वे दोहे दिए हैं जो सबसे ज़्यादा ग़लत नाम से घूमते हैं।
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ग़लत नाम से प्रचलित दोहा |
असली रचयिता |
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ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय |
कबीर |
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बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर |
कबीर |
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दुख में सुमिरन सब करैं, सुख में करै न कोय |
कबीर |
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साईं इतना दीजिए, जामें कुटुम समाय |
कबीर |
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पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय |
कबीर |
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निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय |
कबीर |
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वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखैं, नदी न संचै नीर |
कबीर शैली - रहीम का असली दोहा "तरुवर फल नहिं खात है" है |
पहचानने का सबसे आसान तरीक़ा - छाप देखिए
रहीम के दोहों में लगभग हमेशा "रहीम" या "रहिमन" शब्द आता है। इसे भणिता या छाप कहते हैं और यह कवि के हस्ताक्षर जैसा होता है। कबीर के दोहों में इसी तरह "कबीर" या "कहै कबीर" आता है।
इसलिए नियम सीधा है - अगर किसी दोहे में "रहिमन" या "रहीम" कहीं नहीं है, तो उसे रहीम का मानने से पहले जाँच लीजिए। "ऐसी बानी बोलिए" में रहीम शब्द कहीं नहीं है, और यही सबसे बड़ा संकेत है।
यह एक ही जाँच आपको दस ग़लतियों से बचा लेगी। इस पेज पर दिए सभी 35 दोहों में रहीम की छाप मौजूद है।
रहीम की प्रमुख रचनाएँ
रहीम ने सिर्फ़ दोहे नहीं लिखे। उन्होंने बरवै छंद में नायिका भेद लिखा, ज्योतिष पर संस्कृत में काम किया और बाबरनामा का फ़ारसी अनुवाद किया। नीचे उनकी मुख्य रचनाओं की सूची दी गई है।
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रचना |
भाषा और छंद |
विषय |
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रहीम सतसई (रहीम दोहावली) |
ब्रजभाषा, दोहा |
नीति, प्रेम, भक्ति और लोक-व्यवहार |
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बरवै नायिका भेद |
अवधी, बरवै छंद |
नायिका के भेद और शृंगार वर्णन |
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नगर शोभा |
ब्रजभाषा |
नगर की स्त्रियों का वर्णन |
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मदनाष्टक |
ब्रजभाषा |
कृष्ण और गोपियों का शृंगार वर्णन |
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रास पंचाध्यायी |
ब्रजभाषा |
कृष्ण की रासलीला |
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खेटकौतुकम् |
संस्कृत और फ़ारसी मिश्रित |
ज्योतिष |
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बाबरनामा अनुवाद |
तुर्की से फ़ारसी |
बाबर की आत्मकथा |
बरवै छंद को साहित्य में स्थापित करने का श्रेय रहीम को ही जाता है। कहा जाता है कि तुलसीदास ने रहीम की बरवै रचनाओं से प्रभावित होकर "बरवै रामायण" लिखी।
हिंदी की और क्लासिक किताबें चाहिए तो हमारे हिंदी बुक स्टोर पर देखिए।
रहीम और तुलसीदास की मित्रता
रहीम और तुलसीदास समकालीन थे और दोनों में गहरी मित्रता थी। दोनों ने एक-दूसरे को दोहों में संबोधित भी किया। यह प्रसंग हिंदी साहित्य की सबसे सुंदर मित्रताओं में गिना जाता है और परीक्षा में भी पूछा जाता है।
रहीम दान देते समय नज़रें नीचे रखते थे। तुलसीदास ने यह देखकर पूछा -
सीखे कहाँ नवाबजू, ऐसी देनी देन।
ज्यों ज्यों कर ऊँचो करो, त्यों त्यों नीचे नैन॥
भावार्थ: नवाब साहब, यह देने का तरीक़ा कहाँ से सीखा। जैसे-जैसे आपका हाथ देने के लिए ऊपर उठता है, वैसे-वैसे आपकी आँखें नीची हो जाती हैं।
रहीम का उत्तर और भी सुंदर था -
देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करैं, ताते नीचे नैन॥
भावार्थ: देने वाला तो कोई और है, जो दिन-रात भेजता रहता है। लोग भ्रम में मुझे देने वाला समझ लेते हैं, इसी शर्म से मेरी आँखें झुक जाती हैं।
यही जवाब बताता है कि रहीम को हिंदी साहित्य में इतना सम्मान क्यों मिला। तुलसीदास के दोहे भी इसी तरह अर्थ सहित पढ़ने हों तो तुलसीदास के दोहे देखिए।
कबीर और रहीम के दोहों में क्या अंतर है
कबीर और रहीम दोनों दोहा-कवि थे, पर उनका उद्देश्य अलग था। कबीर समाज को झकझोरते हैं, रहीम समझाते हैं। कबीर का स्वर विद्रोही है और रहीम का अनुभवी।
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आधार |
कबीर के दोहे |
रहीम के दोहे |
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मुख्य विषय |
आडंबर पर चोट, आत्मबोध, निर्गुण भक्ति |
लोक-व्यवहार, नीति, मित्रता, परोपकार |
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स्वर |
विद्रोही, चुनौती देने वाला |
अनुभवी, समझाने वाला |
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भाषा |
सधुक्कड़ी, खिचड़ी बोली |
ब्रजभाषा और अवधी |
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उदाहरण की शैली |
तीखे और चौंकाने वाले |
घरेलू और कोमल |
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छाप |
कबीर, कहै कबीर |
रहीम, रहिमन |
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पृष्ठभूमि |
जुलाहा, फ़क़ीरी जीवन |
मुग़ल दरबार, सेनापति और सूबेदार |
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समय |
15वीं सदी |
16वीं-17वीं सदी |
दोनों में एक बात समान है - दोनों ने आम आदमी की भाषा चुनी और दोनों के दोहे बिना किताब खोले याद रह जाते हैं।
NCERT में रहीम के दोहे किस कक्षा में हैं
रहीम के दोहे NCERT की कक्षा 7 और कक्षा 9 दोनों में पढ़ाए जाते हैं। कक्षा 9 में ये स्पर्श भाग 1 के अध्याय में आते हैं, जबकि कक्षा 7 में सरल दोहे रखे गए हैं। कई छात्र दोनों के दोहे आपस में मिला देते हैं।
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कक्षा |
पुस्तक |
अध्याय |
दोहों की संख्या |
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कक्षा 7 |
वसंत भाग 2 |
रहीम की दोहे |
11 दोहे |
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कक्षा 9 |
स्पर्श भाग 1 |
रैदास और रहीम के दोहे |
11 दोहे |
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कक्षा 10 |
स्पर्श भाग 2 |
दोहे (बिहारी) |
रहीम नहीं, बिहारी हैं |
कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में रहीम के ग्यारह दोहे दिए गए हैं, जो जीवन के किसी न किसी पहलू से जुड़े हैं। ध्यान रखिए कि कक्षा 10 के "दोहे" अध्याय में बिहारी के दोहे हैं, रहीम के नहीं। यह भ्रम बहुत आम है।
परीक्षा में रहीम के दोहे कैसे लिखें
रहीम के दोहों का उत्तर लिखते समय ढाँचा तय रखिए - पहले संदर्भ, फिर भावार्थ, फिर संदेश। ज़्यादातर अंक भावार्थ में कटते हैं क्योंकि छात्र शब्दशः अनुवाद लिख देते हैं और निहित संदेश छोड़ देते हैं।
उत्तर का सही क्रम:
• संदर्भ: दोहा किसका है और किस विषय पर है। एक वाक्य काफ़ी है।
• शब्दार्थ: कठिन ब्रज शब्दों का अर्थ अलग से लिखिए। यह आसान अंक है जो अक्सर छूट जाता है।
• भावार्थ: सरल हिंदी में पूरा अर्थ, उपमा को खोलकर समझाते हुए।
• संदेश: दोहे से क्या सीख मिलती है, एक पंक्ति में। यही हिस्सा उत्तर को पूरा करता है।
वे ग़लतियाँ जो नंबर काटती हैं:
• कबीर के दोहे रहीम के नाम लिख देना: सबसे आम और सबसे भारी ग़लती। छाप देखकर जाँच कीजिए।
• ब्रज शब्दों को शुद्ध हिंदी बना देना: "रहिमन" को "रहीम", "तरुवर" को "वृक्ष" और "सरवर" को "सरोवर" लिखना ग़लत माना जाता है। मूल पाठ जैसा है वैसा ही लिखिए।
• उपमा छोड़ देना: "धागा", "मेहँदी", "सुई" जैसे उदाहरण ही दोहे की जान हैं। भावार्थ में इन्हें ज़रूर खोलिए।
• कक्षा 7 और 9 के दोहे मिला देना: दोनों में अलग दोहे हैं। अपनी कक्षा का पाठ ही पढ़िए।
• मात्रा भूल जाना: दोहा 13 और 11 मात्राओं का छंद है। छंद पूछे जाने पर यही उत्तर है।
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मुख्य बातें (Key Takeaways)
• रहीम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था, जन्म 17 दिसंबर 1556 को लाहौर में और निधन 1627 में दिल्ली में हुआ।
• वे बैरम खान के पुत्र, अकबर के नवरत्नों में एक और गुजरात के सूबेदार थे, फिर भी उन्होंने ब्रजभाषा में आम आदमी के लिए लिखा।
• रहीम के दोहों की पहचान उनकी छाप है - लगभग हर दोहे में "रहीम" या "रहिमन" शब्द आता है।
• इंटरनेट पर कबीर के कई दोहे रहीम के नाम से प्रचलित हैं, जैसे "ऐसी बानी बोलिए" और "साईं इतना दीजिए"।
• उनकी मुख्य रचनाएँ रहीम सतसई, बरवै नायिका भेद, मदनाष्टक और खेटकौतुकम् हैं। उन्होंने बाबरनामा का फ़ारसी अनुवाद भी किया।
• तुलसीदास से उनकी गहरी मित्रता थी और दोनों का दोहा-संवाद हिंदी साहित्य का प्रसिद्ध प्रसंग है।
• NCERT में रहीम के दोहे कक्षा 7 और कक्षा 9 में हैं। कक्षा 10 के "दोहे" अध्याय में बिहारी हैं, रहीम नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. रहीम के सबसे प्रसिद्ध दोहे कौन से हैं?
रहीम के सबसे प्रसिद्ध दोहों में "रहिमन धागा प्रेम का", "तरुवर फल नहिं खात है", "बड़े बड़ाई ना करैं" और "रहिमन देखि बड़ेन को" शामिल हैं। इनमें पहला प्रेम और रिश्तों पर है, दूसरा परोपकार पर और बाक़ी दो विनम्रता तथा हर वस्तु के महत्व पर।
Q2. रहीम का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
रहीम का जन्म 17 दिसंबर 1556 को लाहौर में हुआ था। उनका पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था और वे अकबर के संरक्षक बैरम खान के पुत्र थे। उनका निधन 1627 में दिल्ली में हुआ, जहाँ निज़ामुद्दीन क्षेत्र में उनका मक़बरा आज भी मौजूद है।
Q3. क्या "ऐसी बानी बोलिए" रहीम का दोहा है?
नहीं, यह कबीर का दोहा है। इसे बहुत सी वेबसाइटों पर ग़लती से रहीम के नाम से छापा गया है। पहचान का आसान तरीक़ा यह है कि रहीम के दोहों में लगभग हमेशा "रहीम" या "रहिमन" शब्द आता है, जो इस दोहे में कहीं नहीं है।
Q4. रहीम की प्रमुख रचनाएँ कौन सी हैं?
रहीम की प्रमुख रचनाओं में रहीम सतसई, बरवै नायिका भेद, नगर शोभा, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी और ज्योतिष पर लिखी खेटकौतुकम् शामिल हैं। उन्होंने बाबर की आत्मकथा बाबरनामा का तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद भी किया था।
Q5. रहीम अकबर के दरबार में किस पद पर थे?
रहीम अकबर के नवरत्नों में शामिल थे और उन्हें "खानखाना" की उपाधि मिली थी। वे गुजरात के सूबेदार और मुग़ल सेना के प्रधान सेनापति भी रहे। जहाँगीर के शासनकाल में उन्हें कठिन दौर से गुज़रना पड़ा, पर बाद में सम्मान वापस मिला।
Q6. रहीम किस भाषा में लिखते थे?
रहीम मुख्य रूप से ब्रजभाषा और अवधी में लिखते थे। दोहे ब्रजभाषा में हैं, जबकि बरवै नायिका भेद अवधी में। इसके अलावा वे संस्कृत, फ़ारसी, अरबी और तुर्की भी जानते थे और इन भाषाओं में भी काम किया।
Q7. दोहा छंद में कितनी मात्राएँ होती हैं?
दोहा दो पंक्तियों का अर्धसम मात्रिक छंद है। इसके पहले और तीसरे चरण में 13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11 मात्राएँ होती हैं। यही 13-11 की लय दोहे को गाने और याद रखने में आसान बनाती है।
Q8. रहीम और तुलसीदास का क्या संबंध था?
रहीम और तुलसीदास समकालीन थे और उनमें गहरी मित्रता थी। तुलसीदास ने रहीम की दानशीलता पर दोहा लिखकर पूछा था कि वे देते समय आँखें क्यों झुका लेते हैं, और रहीम ने उत्तर दिया कि देने वाला कोई और है, लोग भ्रम से उन्हें दाता समझ लेते हैं।
Q9. NCERT में रहीम के दोहे किस कक्षा में हैं?
NCERT में रहीम के दोहे कक्षा 7 की वसंत भाग 2 और कक्षा 9 की स्पर्श भाग 1 में आते हैं। दोनों कक्षाओं में अलग-अलग दोहे हैं। कक्षा 10 के "दोहे" अध्याय में बिहारी के दोहे हैं, रहीम के नहीं।
Q10. कबीर और रहीम के दोहों में क्या अंतर है?
कबीर आडंबर और कर्मकांड पर सीधा प्रहार करते हैं, जबकि रहीम लोक-व्यवहार और रिश्तों की बात करते हैं। कबीर का स्वर विद्रोही है और रहीम का अनुभवी। कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है और रहीम की ब्रजभाषा।
Q11. क्या रहीम के दोहे कॉपीराइट में हैं?
नहीं, रहीम की रचनाएँ सार्वजनिक डोमेन में हैं क्योंकि वे लगभग चार सौ साल पुरानी हैं। इन्हें कोई भी पढ़, उद्धृत और प्रकाशित कर सकता है। हालाँकि किसी आधुनिक विद्वान की टीका या संपादित संस्करण की भूमिका पर कॉपीराइट लागू हो सकता है।
Q12. क्या मैं भी अपनी कविता ऑनलाइन प्रकाशित कर सकता हूँ?
हाँ, ख़ुद की कलम के कविता प्लेटफ़ॉर्म पर कोई भी लेखक मुफ़्त में अपनी कविता, दोहे या शायरी प्रकाशित कर सकता है। अगर आप अपनी रचनाओं की किताब छपवाना चाहते हैं तो प्रकाशन सेवा ₹9,999 से शुरू होती है।
निष्कर्ष
रहीम के दोहे इसलिए टिके हैं क्योंकि वे किसी को बदलने की कोशिश नहीं करते, बस दिखा देते हैं। धागा टूटने पर गाँठ पड़ती है, मेहँदी बाँटने वाले के हाथ रँग जाते हैं, फटा दूध मथने से मक्खन नहीं देता - ये बातें किसी दलील से ज़्यादा असर करती हैं।
इस पेज पर दिए 35 दोहे शुरुआत के लिए काफ़ी हैं। आगे पढ़ना हो तो रहीम सतसई की ओर बढ़िए। और किसी भी नए दोहे पर छाप ज़रूर देख लीजिए - "रहिमन" है या नहीं, यही एक जाँच आपको ग़लत जानकारी से बचा लेगी।
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