सूरदास के पद - Surdas Ke Pad

Anu 8 घंटे पहले 👁 4
सूरदास के पद - Surdas Ke Pad

सूरदास के पद अर्थ सहित : वात्सल्य, भ्रमरगीत और विनय के प्रसिद्ध पद

सूरदास के पद ब्रजभाषा में लिखे वे गीत हैं जिनमें कृष्ण की बाल लीला, गोपियों का विरह और भक्त की विनती एक साथ मिलती है। ये सभी पद उनके महाग्रंथ सूरसागर से आते हैं। इस पेज पर वात्सल्य, भ्रमरगीत और विनय - तीनों धाराओं के 10 प्रसिद्ध पद पूरे मूल पाठ और सरल भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

सूरदास को हिंदी का सबसे बड़ा वात्सल्य कवि कहा जाता है। बालक कृष्ण का माखन से इनकार हो या गोपियों का उद्धव पर तीखा व्यंग्य, सूर का हर पद गाने के लिए बना है, सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं। नीचे पद विषय के अनुसार बाँटे गए हैं, ताकि आपको अपनी ज़रूरत का पद तुरंत मिल जाए।


सूरदास के पद इतने लोकप्रिय क्यों हैं

सूरदास के पद इसलिए लोकप्रिय हैं क्योंकि वे भक्ति को घर के आँगन तक ले आते हैं। उनका कृष्ण मंदिर की मूर्ति नहीं, माँ से झगड़ता हुआ बच्चा है। यही घरेलू आत्मीयता सूर को बाक़ी भक्त कवियों से अलग करती है।

दूसरी वजह उनका सूक्ष्म निरीक्षण है। बच्चे का झूठ बोलते समय बात बदलना, चोटी न बढ़ने पर चिढ़ना, रंग को लेकर भाई से शिकायत करना - ये ब्योरे किसी माँ के देखे हुए लगते हैं। इसीलिए हिंदी आलोचना में उन्हें वात्सल्य रस का सम्राट कहा गया।

तीसरी वजह संगीत है। हर पद किसी न किसी राग में बँधा है और उसमें स्थायी तथा अंतरा की बनावट मिलती है। यही कारण है कि पाँच सौ साल बाद भी ये पद हवेलियों और मंदिरों में गाए जाते हैं।

एक प्रसिद्ध उक्ति उनकी जगह साफ़ कर देती है - "सूर-सूर तुलसी ससि, उडुगन केशवदास।" यानी सूर सूरज हैं, तुलसी चंद्रमा और केशवदास तारे।


सूरदास का संक्षिप्त परिचय

सूरदास 16वीं सदी के कृष्णभक्त कवि थे, जिनका जन्म 1478 के आसपास माना जाता है। वे महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे और अष्टछाप कवियों में सबसे प्रसिद्ध। उनका निधन 1583 में पारसौली में हुआ। उनकी मुख्य रचना सूरसागर है।

जनश्रुति के अनुसार एक मान्यता उनका जन्मस्थान आगरा-मथुरा मार्ग पर रुनकता (रेणुका) बताती है, जबकि कुछ विद्वान दिल्ली के पास सीही को जन्मस्थान मानते हैं। वे मथुरा में गऊघाट पर रहते थे और वल्लभाचार्य के अष्टछाप कवियों में सर्वाधिक ख्यातिप्राप्त थे।

विवरण

जानकारी

जन्म

लगभग 1478 ई.

जन्मस्थान

रुनकता (आगरा-मथुरा मार्ग) अथवा सीही, दिल्ली के पास - विद्वानों में मतभेद

निधन

1583 ई., पारसौली (ब्रज)

गुरु

महाप्रभु वल्लभाचार्य

संप्रदाय

पुष्टिमार्ग, अष्टछाप के आठ कवियों में प्रमुख

भाषा

ब्रजभाषा

मुख्य रचना

सूरसागर

अन्य रचनाएँ

सूरसारावली, साहित्य-लहरी

काव्य धारा

भक्तिकाल, सगुण कृष्ण भक्ति शाखा

प्रसिद्धि

वात्सल्य रस का सर्वश्रेष्ठ कवि

सूरदास के दृष्टिहीन होने की बात प्रचलित है, पर उनके पदों में रंग, गति और मुद्रा का जो सूक्ष्म चित्रण है, उस पर विद्वानों में आज भी बहस है। कुछ आलोचक मानते हैं कि वे जन्म से अंधे नहीं थे।

हिंदी साहित्य के और बड़े नाम पढ़ने हों तो हमारा लेखक संग्रह देखिए।


सूरसागर - सूरदास के पदों का मूल ग्रंथ

सूरसागर सूरदास का महाग्रंथ है और इस पेज के सभी पद इसी से लिए गए हैं। यह श्रीमद्भागवत पुराण की शैली पर बारह स्कंधों में बँटा है। इसका सबसे प्रामाणिक संस्करण नागरी प्रचारिणी सभा, काशी से प्रकाशित हुआ था।

इस संस्करण का संपादन श्यामसुंदर दास ने किया और यह 1922 ई. में प्रकाशित हुआ। इसमें पदों की संख्या 4936 है, हालाँकि कुछ विद्वान यह संख्या 6000 तक मानते हैं।

स्कंध

विषय

1 से 8

पौराणिक कथाएँ

9वाँ

संक्षिप्त राम कथा

10वाँ

सबसे बड़ा स्कंध - बाल लीला और रास लीला

11वाँ और 12वाँ

भ्रमरगीत प्रसंग

दसवाँ स्कंध सबसे बड़ा है और उसी में बाल लीला तथा रास लीला का चित्रण मिलता है, जबकि ग्यारहवें और बारहवें स्कंध में भ्रमरगीत का उल्लेख है। इसी वजह से जो पद आप पाठ्यपुस्तकों में पढ़ते हैं, उनमें से अधिकांश दसवें स्कंध से आते हैं।


वात्सल्य के पद अर्थ सहित

वात्सल्य के पदों में सूरदास बालक कृष्ण और माता यशोदा के रिश्ते का चित्रण करते हैं। इनमें भक्ति कम और घर का दृश्य ज़्यादा है। नीचे दिए चार पद सूर के सबसे प्रसिद्ध वात्सल्य पद हैं और अक्सर पाठ्यक्रम में भी आते हैं।

1. मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो।
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो॥
चार पहर बंसीबट भटक्यो, साँझ परे घर आयो।
मैं बालक बहियन को छोटो, छींको केहि बिधि पायो॥
ग्वाल-बाल सब बैर पड़े हैं, बरबस मुख लपटायो।
तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतिआयो॥
यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो।
सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो॥

भावार्थ: कृष्ण माँ से सफ़ाई दे रहे हैं कि माखन उन्होंने नहीं खाया। सुबह से गायों के पीछे भेज दिया, दिन भर भटकता रहा और शाम को घर लौटा। हाथ इतने छोटे हैं कि छींके तक पहुँचना ही नामुमकिन था। ग्वाल-बाल दुश्मनी निकालने के लिए मुँह पर ज़बरदस्ती माखन लगा गए और भोली माँ उनकी बात पर यक़ीन कर बैठी।

फिर बालक झुँझलाकर कहता है - लो अपनी लाठी और कंबल, बहुत नचा लिया मुझे। यही रूठना पद का सबसे सुंदर मोड़ है, और यशोदा हँसकर उसे गले लगा लेती हैं। झूठ पकड़ में आ जाने के बाद बच्चे का बात बदल देना सूर ने बिल्कुल असली पकड़ा है।

2. मैया कबहुँ बढ़ैगी चोटी

मैया कबहुँ बढ़ैगी चोटी।
किती बार मोहिं दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्वैहै लाँबी मोटी।
काढ़त गुहत न्हवावत जैहै, नागिनि सी भुइँ लोटी॥
काचो दूध पियावति पचि पचि, देति न माखन रोटी।
सूर चिरजीवौ दोउ भैया, हरि हलधर की जोटी॥

भावार्थ: कृष्ण पूछ रहे हैं कि उनकी चोटी आख़िर बढ़ेगी कब। कितनी बार दूध पी चुका, फिर भी चोटी वहीं की वहीं है। माँ ने वादा किया था कि यह बलराम की चोटी जैसी लंबी और मोटी हो जाएगी, नागिन की तरह ज़मीन पर लोटेगी।

फिर शिकायत असली मुद्दे पर आती है - माँ कच्चा दूध पिलाती रहती है, माखन-रोटी देती ही नहीं। बच्चे की सारी नाराज़गी दरअसल खाने को लेकर है, चोटी तो बहाना है। अंत में सूरदास दोनों भाइयों, कृष्ण और बलराम की जोड़ी के चिरंजीवी होने की कामना करते हैं।

3. मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायो

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायो।
मोसों कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायो॥
कहा करौं इहि रिस के मारें, खेलन हौं नहिं जात।
पुनि पुनि कहत कौन है माता, को है तेरो तात॥
गोरे नंद जसोदा गोरी, तू कत स्यामल गात।
चुटकी दै दै ग्वाल नचावत, हँसत सबै मुसुकात॥
तू मोहीं कौं मारन सीखी, दाउहिं कबहुँ न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि सुनि रीझै॥
सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही को धूत।
सूर स्याम मोहिं गोधन की सौं, हौं माता तू पूत॥

भावार्थ: कृष्ण शिकायत करते हैं कि बलराम उन्हें बहुत चिढ़ाते हैं। कहते हैं कि तुझे तो ख़रीदा गया है, यशोदा ने जना ही नहीं। इसी गुस्से में कृष्ण खेलने जाना छोड़ देते हैं, क्योंकि बलराम बार-बार पूछते हैं कि तेरी माँ कौन है और पिता कौन।

बलराम का तर्क बच्चों जैसा तीखा है - नंद गोरे, यशोदा गोरी, फिर तू साँवला क्यों है। ग्वाल-बाल चुटकी बजाकर हँसते हैं। कृष्ण को सबसे ज़्यादा यही चुभता है कि डाँट हमेशा उसे ही पड़ती है, बलराम को कभी नहीं। यशोदा यह सुनकर रीझ जाती हैं और गोधन की क़सम खाकर कहती हैं कि मैं ही तेरी माता हूँ और तू मेरा पुत्र।

4. जसोदा हरि पालनैं झुलावै

जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै दुलराइ मल्हावै, जोइ सोइ कछु गावै॥
मेरे लाल कौं आउ निंदरिया, काहे न आनि सुवावै।
तू काहै नहिं बेगहिं आवै, तोकौं कान्ह बुलावै॥
कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन ह्वै रहि रहि, करि करि सैन बतावै॥
इहिं अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरै गावै।
जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ, सो नँद-भामिनि पावै॥

भावार्थ: यशोदा कृष्ण को पालने में झुला रही हैं। कभी दुलारती हैं, कभी थपकी देती हैं और जो मन में आता है वही लोरी गा देती हैं। फिर वे नींद को बुलाती हैं - आ जा निद्रा, मेरे लाल को सुला दे, कान्ह तुझे बुला रहा है।

इसके बाद का दृश्य सबसे बारीक है। कृष्ण कभी पलकें मूँद लेते हैं, कभी होंठ हिलाते हैं। यशोदा उन्हें सोया समझकर चुप हो जाती हैं और आसपास वालों को इशारे से चुप रहने को कहती हैं। तभी कृष्ण अकुला कर उठ जाते हैं और माँ फिर मीठा गाने लगती हैं। अंतिम पंक्ति में सूर कहते हैं कि जो सुख देवताओं और मुनियों को भी दुर्लभ है, वह नंद की पत्नी को सहज मिल रहा है।

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भ्रमरगीत के पद अर्थ सहित

भ्रमरगीत में गोपियाँ उद्धव के निर्गुण-ज्ञान और योग के उपदेश को सीधे नकार देती हैं। कृष्ण मथुरा जाकर लौटे नहीं और उद्धव के हाथ संदेश भेज दिया, इसी पर गोपियों का व्यंग्य टिका है। ये चार पद हिंदी के सबसे तीखे संवाद-काव्य में गिने जाते हैं।

5. ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी

ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी॥
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी॥
प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोर्यौ, दृष्टि न रूप परागी।
सूरदास अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी॥

भावार्थ: गोपियाँ ऊपर से उद्धव की तारीफ़ करती हैं और भीतर से ताना मारती हैं। तुम बड़े भाग्यशाली हो कि प्रेम के धागे से बिल्कुल अछूते रह गए, तुम्हारे मन में कभी अनुराग जागा ही नहीं।

फिर दो उपमाएँ आती हैं। कमल का पत्ता पानी में ही रहता है, पर उस पर दाग़ नहीं लगता। तेल से भरी गागर पानी में डूबे तो भी एक बूँद उससे नहीं चिपकती। तुम प्रेम की नदी के किनारे रहे, पर पैर तक नहीं भिगोया। अंत में गोपियाँ ख़ुद को भोली बताती हैं, जो गुड़ में चींटी की तरह चिपक गईं। यह विनम्रता नहीं, सबसे गहरा व्यंग्य है।

6. ऊधौ, मन न भए दस बीस

ऊधौ, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयो स्याम सँग, को अवराधै ईस॥
इंद्री सिथिल भईं केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस।
आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस॥
तुम तौ सखा स्यामसुंदर के, सकल जोग के ईस।
सूरदास रसिकन की बतियाँ, पुरवौ मन जगदीस॥

भावार्थ: गोपियाँ तर्क देती हैं कि मन दस-बीस थोड़े ही होते हैं। जो एक मन था वह श्याम के साथ चला गया, अब निर्गुण ईश्वर की आराधना किस मन से करें। तर्क बिल्कुल सीधा है और उद्धव के पास इसका कोई जवाब नहीं।

आगे वे कहती हैं कि कृष्ण के बिना इंद्रियाँ ऐसे शिथिल हो गई हैं जैसे शरीर बिना सिर के हो। फिर भी साँस चल रही है, क्योंकि लौटने की आशा बची है। अंतिम पंक्तियों में उद्धव को याद दिलाया जाता है कि वे कृष्ण के सखा हैं, तो प्रेमियों की बात समझना उनका ही काम है।

7. हमारैं हरि हारिल की लकरी

हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी॥
जागत सोवत स्वप्न दिवस निसि, कान्ह-कान्ह जकरी।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी॥
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ सूर तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी॥

भावार्थ: हारिल पक्षी उड़ते समय भी एक लकड़ी पंजे में पकड़े रहता है और कभी नहीं छोड़ता। गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण उनके लिए वही लकड़ी हैं - मन, कर्म और वचन तीनों से पकड़ी हुई।

जागते, सोते, सपने में, दिन हो या रात, बस कान्ह-कान्ह रटा हुआ है। ऐसे में योग की बात सुनना कड़वी ककड़ी जैसा लगता है। फिर सबसे तीखा वार आता है - तुम यह रोग हमारे लिए ले आए, जो हमने न देखा था न सुना था। यह योग उन्हें जाकर सौंपो जिनका मन चरखे की तरह घूमता रहता है, हमारा मन तो एक जगह टिका है।

8. निरगुन कौन देस कौ बासी

निरगुन कौन देस कौ बासी।
मधुकर हँसि समुझाइ, सौंह दै बूझति साँच न हाँसी॥
को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी।
कैसो बरन, भेष है कैसो, केहि रस मैं अभिलाषी॥
पावैगो पुनि कियो आपनो, जो रे करैगो गाँसी।
सुनत मौन ह्वै रह्यो बावरो, सूर सबै मति नासी॥

भावार्थ: गोपियाँ पूछती हैं कि यह निर्गुण ब्रह्म आख़िर रहता किस देश में है। वे उद्धव को क़सम देकर पूछती हैं कि सच बताओ, मज़ाक़ मत करो।

फिर सवालों की झड़ी लगती है - उसके पिता कौन हैं, माता कौन, पत्नी कौन, दासी कौन। उसका रंग कैसा है, वेश कैसा है, उसे किस रस में रुचि है। साथ में चेतावनी भी है कि अगर टालमटोल करोगे तो उसका फल भुगतोगे। अंतिम पंक्ति में सूर बताते हैं कि यह सुनकर उद्धव मौन रह गए और उनकी सारी बुद्धि जाती रही।


विनय और भक्ति के पद अर्थ सहित

विनय के पदों में सूरदास कृष्ण के सामने अपनी कमज़ोरियाँ रखते हैं और कृपा माँगते हैं। यहाँ न बाल लीला है, न गोपियों का व्यंग्य, सिर्फ़ आत्म-स्वीकृति है। ये पद सूर की भक्ति का सबसे निजी हिस्सा माने जाते हैं।

9. अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल

अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल।
काम क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल॥
महामोह के नूपुर बाजत, निंदा सबद रसाल।
भ्रम भोयो मन भयो पखावज, चलत असंगत चाल॥
तृस्ना नाद करति घट भीतर, नाना बिधि दै ताल।
माया कौ कटि फेंटा बाँध्यौ, लोभ तिलक दियौ भाल॥
कोटिक कला काछि दिखराई, जल थल सुधि नहिं काल।
सूरदास की सबै अविद्या, दूरि करौ नँदलाल॥

भावार्थ: पूरा पद एक ही रूपक पर टिका है - जीवन एक नाच है और कवि थक चुका है। काम और क्रोध का चोला पहना, गले में विषयों की माला डाली, महामोह के घुँघरू बजते रहे और निंदा ही गीत बन गई।

भ्रम में भीगा मन पखावज बन गया, जिसकी चाल बेसुरी है। भीतर तृष्णा तरह-तरह की ताल दे रही है, कमर पर माया का फेंटा बँधा है और माथे पर लोभ का तिलक। करोड़ों कलाएँ दिखाईं, पर समय की सुध ही नहीं रही। अंत में सूरदास एक ही प्रार्थना करते हैं - नंदलाल, मेरी सारी अविद्या दूर कर दीजिए।

10. प्रभु मेरे औगुन चित न धरो

प्रभु मेरे औगुन चित न धरो।
समदरसी है नाम तिहारो, चाहे तो पार करो॥
एक लोहा पूजा में राखत, एक घर बधिक परो।
पारस गुन अवगुन नहिं चितवत, कंचन करत खरो॥
एक नदिया एक नार कहावत, मैलो नीर भरो।
जब मिलि गए तब एक बरन ह्वै, गंगा नाम परो॥
सूरदास मन ते नहिं बिसरै, जोइ भावै सोइ करो॥

भावार्थ: सूरदास कहते हैं कि हे प्रभु, मेरे अवगुण मन में मत रखिए। आपका नाम ही समदर्शी है, इसलिए चाहें तो पार लगा दीजिए।

दो उदाहरण इस बात को सिद्ध करते हैं। एक लोहा पूजा में रखा जाता है और दूसरा बधिक के घर पड़ा रहता है, पर पारस दोनों का गुण-अवगुण नहीं देखता, दोनों को सोना बना देता है। इसी तरह एक धारा नदी कहलाती है और दूसरी गंदा नाला, पर गंगा में मिलते ही दोनों का एक ही रंग हो जाता है और नाम गंगा पड़ जाता है। अंतिम पंक्ति में बस इतनी विनती है कि मन से मत भुलाइए, बाक़ी जो चाहे कीजिए।


भ्रमरगीत को लेकर सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी

सबसे आम ग़लती यह है कि लोग भ्रमरगीत को सूरदास की अलग किताब समझ लेते हैं। ऐसी कोई पुस्तक सूरदास ने नहीं लिखी। भ्रमरगीत सूरसागर के भीतर का एक प्रसंग है, अलग ग्रंथ नहीं। परीक्षा में यही अंतर सबसे ज़्यादा पूछा जाता है।

सूरदास ने भ्रमरगीत नाम की कोई पुस्तक नहीं लिखी। यह प्रसंग श्रीमद्भागवत पुराण से आया है, जिसमें कृष्ण के मित्र उद्धव को ज्ञान और योग का अहंकार हो जाता है और कृष्ण उन्हें गोपियों के पास भेजते हैं।

दूसरी बात - भ्रमरगीतसार नाम की जो किताब बाज़ार में मिलती है, वह आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संपादित संकलन है। शुक्ल जी ने सूरसागर से भ्रमरगीत प्रसंग के पद चुनकर उन्हें एक जगह इकट्ठा किया और भूमिका लिखी। रचना सूर की है, संकलन शुक्ल जी का।

तीसरी बात - "भ्रमर" यानी भौंरा इस प्रसंग में सिर्फ़ बहाना है। गोपियाँ सीधे उद्धव पर व्यंग्य करने के बजाय पास उड़ते भौंरे को संबोधित करके बात कहती हैं। यही अन्योक्ति शैली भ्रमरगीत को साहित्यिक रूप से इतना ऊँचा बनाती है।


सूरदास और तुलसीदास में क्या अंतर है

सूरदास और तुलसीदास दोनों सगुण भक्ति के कवि थे, पर उनके आराध्य और स्वर अलग थे। सूर का केंद्र कृष्ण की लीला है और तुलसी का केंद्र राम की मर्यादा। सूर गाने के लिए लिखते हैं, तुलसी सुनाने के लिए।

आधार

सूरदास

तुलसीदास

आराध्य

कृष्ण

राम

भक्ति भाव

सख्य और वात्सल्य

दास्य

भाषा

ब्रजभाषा

अवधी और ब्रजभाषा

प्रमुख छंद

पद (गेय)

चौपाई और दोहा

मुख्य ग्रंथ

सूरसागर

रामचरितमानस

मुख्य रस

वात्सल्य और शृंगार

शांत और वीर

दृष्टिकोण

लीला और प्रेम

मर्यादा और लोकधर्म

तुलसीदास के दोहे भी इसी शैली में अर्थ सहित पढ़ने हों तो तुलसीदास के दोहे देखिए। निर्गुण भक्ति की तुलना करनी हो तो कबीर के दोहे पढ़िए।


परीक्षा में सूरदास के पद कैसे लिखें

सूरदास के पद Class 8, 10 और 12 तीनों में आते हैं, पर हर कक्षा में अलग पद हैं। Class 10 (क्षितिज) में भ्रमरगीत के पद आते हैं, जबकि Class 8 और 12 में वात्सल्य तथा विनय के पद ज़्यादा हैं। सबसे ज़्यादा नंबर सप्रसंग व्याख्या में कटते हैं, इसलिए ढाँचा याद रखिए।

सप्रसंग व्याख्या का सही क्रम:

           संदर्भ: पद का नाम, कवि का नाम और यह कि वह सूरसागर से लिया गया है। एक ही वाक्य काफ़ी है।

           प्रसंग: पद से पहले क्या घट रहा है। भ्रमरगीत के लिए बताइए कि कृष्ण मथुरा जा चुके हैं और उद्धव संदेश लेकर आए हैं।

           व्याख्या: पंक्ति दर पंक्ति अर्थ, सरल हिंदी में। शब्दशः अनुवाद नहीं, भाव खोलिए।

           काव्य सौंदर्य: भाषा (ब्रजभाषा), छंद (पद), रस (वात्सल्य या शृंगार) और अलंकार का उल्लेख। यही हिस्सा ज़्यादातर छात्र छोड़ देते हैं।

वे ग़लतियाँ जो हर साल नंबर काटती हैं:

           भ्रमरगीत को अलग पुस्तक बताना: यह सूरसागर का प्रसंग है। भ्रमरगीतसार रामचंद्र शुक्ल का संकलन है, सूर की रचना नहीं।

           ब्रजभाषा को शुद्ध हिंदी में बदल देना: "पुरइनि" को "पुरैनी" और "बड़भागी" को "बड़भागी" के बजाय "भाग्यशाली" लिख देना ग़लत है। मूल पाठ जैसा है वैसा ही लिखिए।

           छाप-पंक्ति छोड़ देना: हर पद की अंतिम पंक्ति में "सूर" या "सूरदास" आता है, जिसे भणिता या छाप कहते हैं। इसे लिखे बिना पद अधूरा माना जाता है।

           रस की पहचान में चूक: वात्सल्य के पदों में रस वात्सल्य है, शृंगार नहीं। भ्रमरगीत में वियोग शृंगार है।

           गोपियों के व्यंग्य को तारीफ़ पढ़ना: "ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी" प्रशंसा नहीं, ताना है। यह अर्थ उलटा लिखने पर पूरे उत्तर के नंबर जाते हैं।

हिंदी कविता की और किताबें चुननी हों तो हिंदी कविता की बेहतरीन किताबें वाली सूची देखिए, या सीधे हिंदी बुक स्टोर से मँगा लीजिए।


मुख्य बातें (Key Takeaways)

           सूरदास के सभी पद उनके महाग्रंथ सूरसागर से आते हैं, जिसका नागरी प्रचारिणी सभा संस्करण 1922 में प्रकाशित हुआ था और उसमें 4936 पद हैं।

           उनका जन्म लगभग 1478 में हुआ और निधन 1583 में पारसौली में। वे वल्लभाचार्य के शिष्य तथा अष्टछाप के सबसे प्रसिद्ध कवि थे।

           सूर के पद तीन धाराओं में बँटते हैं - वात्सल्य (बाल लीला), भ्रमरगीत (गोपी-उद्धव संवाद) और विनय (आत्म-निवेदन)।

           भ्रमरगीत सूरदास की अलग किताब नहीं है, बल्कि सूरसागर के ग्यारहवें और बारहवें स्कंध का प्रसंग है।

           भ्रमरगीतसार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संपादित संकलन है, इसलिए रचना और संकलन का श्रेय अलग-अलग है।

           हर पद की अंतिम पंक्ति में "सूर" या "सूरदास" की छाप आती है, जो कवि की पहचान है और परीक्षा में ज़रूरी है।

           सूर का आराध्य कृष्ण और भाव वात्सल्य है, जबकि तुलसीदास का आराध्य राम और भाव दास्य है - यही दोनों का बुनियादी अंतर है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. सूरदास के सबसे प्रसिद्ध पद कौन से हैं?
सूरदास के सबसे प्रसिद्ध पदों में "मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो", "ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी", "हमारैं हरि हारिल की लकरी" और "जसोदा हरि पालनैं झुलावै" शामिल हैं। पहला और चौथा वात्सल्य के पद हैं, जबकि बीच के दो भ्रमरगीत प्रसंग से आते हैं।

Q2. सूरदास के पद किस ग्रंथ से लिए गए हैं?
सूरदास के लगभग सभी प्रसिद्ध पद सूरसागर से लिए गए हैं। यह बारह स्कंधों में बँटा ग्रंथ है और इसका सबसे प्रामाणिक संस्करण नागरी प्रचारिणी सभा काशी से 1922 में प्रकाशित हुआ, जिसका संपादन श्यामसुंदर दास ने किया था।

Q3. सूरसागर में कुल कितने पद हैं?
नागरी प्रचारिणी सभा के संस्करण में सूरसागर के पदों की संख्या 4936 है। कुछ विद्वान यह संख्या 6000 तक मानते हैं। लोकप्रिय मान्यता में सवा लाख पदों की बात कही जाती है, पर उसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

Q4. भ्रमरगीत क्या है?
भ्रमरगीत सूरसागर के भीतर का एक प्रसंग है, अलग पुस्तक नहीं। इसमें कृष्ण मथुरा जाने के बाद उद्धव को गोपियों के पास निर्गुण और योग का संदेश देकर भेजते हैं, और गोपियाँ तर्क तथा व्यंग्य से उस संदेश को नकार देती हैं।

Q5. भ्रमरगीतसार किसने लिखा?
भ्रमरगीतसार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संपादित संकलन है। उन्होंने सूरसागर से भ्रमरगीत प्रसंग के पद चुनकर एक जगह इकट्ठा किए और विस्तृत भूमिका लिखी। पदों की रचना सूरदास की है, संकलन और भूमिका शुक्ल जी की।

Q6. सूरदास किस रस के कवि माने जाते हैं?
सूरदास वात्सल्य रस के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनके बाल लीला के पदों में माता यशोदा और बालक कृष्ण के रिश्ते का जो सूक्ष्म चित्रण है, वैसा हिंदी में किसी और कवि के यहाँ नहीं मिलता। भ्रमरगीत में वियोग शृंगार प्रमुख है।

Q7. सूरदास किस संप्रदाय से जुड़े थे?
सूरदास महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे और पुष्टिमार्ग से जुड़े थे। वे अष्टछाप के आठ कवियों में सबसे प्रसिद्ध थे। अष्टछाप की स्थापना वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने की थी।

Q8. "ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी" का असली अर्थ क्या है?
ऊपर से यह प्रशंसा लगती है, पर असल में यह व्यंग्य है। गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं कि तुम भाग्यशाली हो कि प्रेम से बिल्कुल अछूते रह गए। कमल के पत्ते और तेल की गागर की उपमाएँ यही ताना और गहरा करती हैं।

Q9. हारिल की लकरी का क्या मतलब है?
हारिल एक पक्षी है जो उड़ते समय भी एक लकड़ी अपने पंजे में पकड़े रहता है और कभी नहीं छोड़ता। गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण उनके लिए वही लकड़ी हैं, जिसे मन, कर्म और वचन तीनों से मज़बूती से पकड़ रखा है।

Q10. सूरदास और तुलसीदास में क्या अंतर है?
दोनों सगुण भक्ति के कवि थे, पर सूर का आराध्य कृष्ण और तुलसी का राम है। सूर सख्य और वात्सल्य भाव में लिखते हैं, तुलसी दास्य भाव में। सूर की भाषा ब्रजभाषा और छंद पद है, जबकि तुलसी अवधी में चौपाई और दोहा लिखते हैं।

Q11. क्या सूरदास के पद कॉपीराइट में हैं?
नहीं, सूरदास की रचनाएँ सार्वजनिक डोमेन में हैं क्योंकि वे लगभग साढ़े चार सौ साल पुरानी हैं। इन्हें कोई भी पढ़, उद्धृत और प्रकाशित कर सकता है। हालाँकि किसी आधुनिक विद्वान की टीका, संपादन या भूमिका पर कॉपीराइट लागू हो सकता है।

Q12. क्या मैं भी अपनी कविता ऑनलाइन प्रकाशित कर सकता हूँ?
हाँ, ख़ुद की कलम के कविता प्लेटफ़ॉर्म पर कोई भी लेखक मुफ़्त में अपनी कविता, पद या शायरी प्रकाशित कर सकता है। अगर आप अपनी रचनाओं की किताब छपवाना चाहते हैं तो प्रकाशन सेवा ₹9,999 से शुरू होती है।


निष्कर्ष

सूरदास के पद पढ़ते समय एक बात ध्यान रखिए - ये गाने के लिए लिखे गए थे। इसलिए इन्हें चुपचाप पढ़ने के बजाय एक बार बोलकर पढ़िए, लय अपने आप खुल जाएगी। वात्सल्य के पदों में घर का दृश्य देखिए, भ्रमरगीत में तर्क का खेल पकड़िए और विनय के पदों में कवि की सादगी।

इस पेज पर दिए दस पद शुरुआत के लिए काफ़ी हैं। इसके बाद सूरसागर के दसवें स्कंध और रामचंद्र शुक्ल के भ्रमरगीतसार की ओर बढ़िए। अर्थ समझकर पढ़ेंगे तो परीक्षा में रटना नहीं पड़ेगा।

✍️ आपकी अपनी कलम का क्या?

सूरदास ने अपने समय की बोलचाल वाली ब्रजभाषा में लिखा, किसी दरबारी भाषा में नहीं। आपकी कविता को भी किसी की अनुमति का इंतज़ार नहीं चाहिए।

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