बिहारी के दोहे
बिहारी के दोहे अर्थ सहित: 28 प्रसिद्ध दोहे, शब्दार्थ और भावार्थ
बिहारी के दोहे ब्रजभाषा की वे दो पंक्तियाँ हैं जिनमें बहुत कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कह दी जाती है। इसी वजह से उन्हें "गागर में सागर भरने वाला कवि" कहा जाता है। उनकी एकमात्र रचना बिहारी सतसई है, जिसमें लगभग 713 दोहे संकलित हैं। इस पेज पर 28 प्रसिद्ध दोहे शब्दार्थ और भावार्थ के साथ दिए गए हैं।
बिहारी बाक़ी दोहा-कवियों से एक बुनियादी बात में अलग हैं। कबीर, तुलसीदास, सूरदास और रहीम भक्तिकाल के कवि हैं, जबकि बिहारी रीतिकाल के। उनका मुख्य रस शृंगार है, भक्ति नहीं। परीक्षा में यही अंतर सबसे ज़्यादा पूछा जाता है और सबसे ज़्यादा ग़लत लिखा जाता है।
इस पेज पर एक ऐसा हिस्सा भी है जो कहीं और नहीं मिलेगा - "सतसैया के दोहरे" वाला मशहूर दोहा असल में बिहारी का लिखा हुआ नहीं है। पूरी बात नीचे दी गई है।
बिहारी के दोहे इतने प्रसिद्ध क्यों हैं
बिहारी के दोहे इसलिए प्रसिद्ध हैं क्योंकि वे दो पंक्तियों में पूरा दृश्य खड़ा कर देते हैं। जहाँ दूसरे कवि चार पंक्तियाँ लेते हैं, बिहारी एक संकेत से काम चला लेते हैं। यही समास शक्ति उन्हें रीतिकाल का सबसे बड़ा दोहाकार बनाती है।
दूसरी वजह उनकी सूक्ष्म दृष्टि है। आँखों से होने वाली बातचीत, मुरली छिपाने की चालाकी, या जेठ की दुपहरी में छाया का ख़ुद छाया ढूँढना - ये चित्र किसी और के यहाँ नहीं मिलते।
तीसरी वजह विषय की चौड़ाई है। शृंगार उनका मुख्य विषय है, पर उसी सतसई में नीति, भक्ति, अन्योक्ति और व्यंग्य भी मिलता है। "कनक कनक तें सौ गुनी" जैसा दोहा किसी भी नीति-कवि के बराबर बैठता है।
📜 जल्दी में हैं? सीधे जाएँ: भक्ति के दोहे • शृंगार - संयोग • शृंगार - वियोग • नीति के दोहे • अन्योक्ति • ⚠️ जो दोहा बिहारी का नहीं है
बिहारी का संक्षिप्त परिचय
बिहारी का पूरा नाम बिहारीलाल चौबे था और उनका जन्म लगभग 1595 ई. में ग्वालियर के पास बसुआ गोविंदपुर गाँव में हुआ। वे जयपुर नरेश मिर्ज़ा राजा जयसिंह के आश्रित कवि थे। उन्होंने 1662 ई. में बिहारी सतसई की रचना की और लगभग 1663 ई. में उनका निधन हुआ।
यूपी बोर्ड सामग्री के अनुसार बिहारी के पिता का नाम पं. केशवराय चौबे था। उन्होंने आचार्य केशवदास से काव्यशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की और उसमें पारंगत हुए। आगरा आने पर उनकी भेंट रहीम से हुई। 1662 ई. में उन्होंने बिहारी सतसई की रचना की।
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विवरण |
जानकारी |
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पूरा नाम |
बिहारीलाल चौबे |
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जन्म |
लगभग 1595 ई. (कुछ मत 1603 ई.) |
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जन्मस्थान |
बसुआ गोविंदपुर, ग्वालियर के पास |
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पिता |
पं. केशवराय चौबे |
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शिक्षा |
आचार्य केशवदास से काव्यशास्त्र |
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आश्रयदाता |
मिर्ज़ा राजा जयसिंह, आमेर (जयपुर) |
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रचना |
बिहारी सतसई (1662 ई.) |
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निधन |
लगभग 1663 ई. |
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भाषा |
ब्रजभाषा |
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काव्य-धारा |
रीतिकाल, रीतिसिद्ध शाखा |
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मुख्य रस |
शृंगार (संयोग और वियोग दोनों) |
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आराध्य |
राधा-कृष्ण |
बिहारी का विवाह मथुरा में हुआ और वे वहीं बस गए। आगरा में रहीम से उनकी भेंट हुई, जिसके बाद उनकी प्रतिष्ठा बढ़ी। बाद में जयसिंह ने उनकी वार्षिक वृत्ति बाँध दी और वे आमेर से जुड़ गए।
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भक्ति और मंगलाचरण के दोहे
बिहारी सतसई की शुरुआत राधा की स्तुति से होती है, जो रीतिकाल की परंपरा है। इन दोहों में भक्ति है, पर वह शृंगारिक रंग लिए हुए। ये पाँच दोहे सतसई के भक्ति-पक्ष को दिखाते हैं।
1.
मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।
जा तन की झाईं परैं, स्यामु हरित-दुति होइ॥
शब्दार्थ: भव-बाधा - सांसारिक कष्ट | नागरि - चतुर | झाईं - छाया, झलक | स्यामु - साँवले कृष्ण | हरित-दुति - हरी आभा वाले, प्रसन्न
भावार्थ: वही चतुर राधा मेरी सांसारिक बाधाएँ दूर करें, जिनके शरीर की झलक पड़ते ही साँवले कृष्ण हरी आभा वाले हो जाते हैं। यह सतसई का मंगलाचरण है और इसमें श्लेष अलंकार है - "हरित" का अर्थ हरा रंग भी है और प्रसन्न होना भी।
2.
जपमाला छापैं तिलक, सरै न एकौ कामु।
मन काँचै नाचै बृथा, साँचै राँचै रामु॥
शब्दार्थ: जपमाला - माला | छापैं - शरीर पर छाप लगाना | सरै - सिद्ध होना | काँचै - कच्चा, अस्थिर | राँचै - रमना, प्रसन्न होना
भावार्थ: माला जपने, शरीर पर छाप लगाने और तिलक लगाने से एक भी काम नहीं बनता। मन कच्चा हो तो यह सब व्यर्थ का नाच है। राम तो सच्चे मन में ही रमते हैं। बिहारी यहाँ कबीर जैसी सीधी बात कह रहे हैं।
3.
या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोइ।
ज्यों ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों त्यों उज्जलु होइ॥
शब्दार्थ: अनुरागी - प्रेम में डूबा | गति - दशा | बूड़ै - डूबना | उज्जलु - उज्ज्वल
भावार्थ: प्रेम में डूबे इस मन की दशा कोई नहीं समझ पाता। यह जितना साँवले रंग में डूबता है, उतना ही उजला होता जाता है। साधारण नियम उलटा है - काले रंग में डूबने पर चीज़ काली होती है। यहाँ "स्याम रंग" कृष्ण का रंग है, इसलिए नियम पलट जाता है।
4.
कब को टेरतु दीन रट, होत न स्याम सहाइ।
तुमहूँ लागी जगत-गुरु, जग नाइक जिय जाइ॥
शब्दार्थ: टेरतु - पुकारना | दीन रट - विनती की रट | सहाइ - सहायक | नाइक - नायक, स्वामी
भावार्थ: कब से दीन होकर पुकार रहा हूँ, पर श्याम सहायक नहीं होते। हे जगत के गुरु और जगत के नायक, अब तो तुम्हें भी लाज आनी चाहिए। भक्ति में यह उलाहना बिहारी की अपनी शैली है।
5.
मैं समझ्यौ निरधार, यह जग काँचो काँच सौ।
एकै रूप अपार, प्रतिबिंबित लखिऐ जहाँ॥
शब्दार्थ: निरधार - बिना आधार के | काँचो - कच्चा | लखिऐ - दिखाई देना
भावार्थ: मैंने जान लिया कि यह संसार निराधार है और काँच जैसा कच्चा। इसमें जो कुछ दिखता है, वह उसी एक अपार रूप का प्रतिबिंब है। यह दोहा बिहारी के दार्शनिक पक्ष को दिखाता है।
संयोग शृंगार के दोहे
संयोग शृंगार के दोहों में नायक-नायिका के मिलन, इशारों और छेड़छाड़ का चित्रण है। बिहारी की असली ताक़त यहीं दिखती है, क्योंकि वे पूरा दृश्य दो पंक्तियों में बाँध देते हैं। ये सात दोहे सतसई के सबसे उद्धृत शृंगार-दोहे हैं।
6.
कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भौन मैं करत हैं, नैननु हीं सौं बात॥
शब्दार्थ: नटत - मना करना | रीझत - मोहित होना | खिझत - चिढ़ना | भौन - भवन, कमरा | नैननु - आँखों से
भावार्थ: भरे कमरे में नायक-नायिका सिर्फ़ आँखों से बात कर रहे हैं। कहना, मना करना, रीझना, चिढ़ना, मिलना, खिल जाना और लजा जाना - यह सारी बातचीत बिना एक शब्द बोले हो जाती है।
यह बिहारी का सबसे प्रसिद्ध दोहा है। पहली पंक्ति में सात क्रियाएँ एक साथ रखकर उन्होंने प्रेम की पूरी कहानी सुना दी। "गागर में सागर" की सबसे अच्छी मिसाल यही दोहा है।
7.
बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ।
सौंह करै, भौंहनु हँसै, दैन कहै, नटि जाइ॥
शब्दार्थ: बतरस - बातचीत का आनंद | लाल - कृष्ण | लुकाइ - छिपाकर | सौंह - क़सम | नटि जाइ - मुकर जाना
भावार्थ: कृष्ण से बात करने के रस के लालच में गोपी ने मुरली छिपा दी। अब वह क़सम खाती है कि उसने नहीं ली, आँखों से हँसती है, देने को कहती है और फिर मुकर जाती है।
पूरा खेल यही है कि गोपी को मुरली नहीं चाहिए, बातचीत चाहिए। इसलिए वह जानबूझकर मामला लंबा खींच रही है। एक ही पंक्ति में चार क्रियाएँ रखकर बिहारी ने यह नाटक पूरा कर दिया।
8.
अजौं तरयौना ही रह्यौ, श्रुति सेवत इक अंग।
नाक बास बेसरि लह्यौ, बसि मुकुतनु कैं संग॥
शब्दार्थ: तरयौना - कान का आभूषण | श्रुति - कान | बेसरि - नाक की नथ | बास - निवास, स्थान | मुकुतनु - मोतियों
भावार्थ: तरौना आभूषण आज भी सिर्फ़ कान की सेवा करता रह गया, जबकि बेसर मोतियों के साथ रहकर नाक पर जगह पा गई। बिहारी यहाँ संगति का महत्व बता रहे हैं - अच्छी संगति ऊँचा स्थान दिला देती है।
9.
सोहत ओढ़ैं पीतु पटु, स्याम, सलौनैं गात।
मनौ नीलमनि सैल पर, आतपु परयौ प्रभात॥
शब्दार्थ: पीतु पटु - पीला वस्त्र | सलौनैं - साँवले, सुंदर | गात - शरीर | नीलमनि - नीलमणि | सैल - पर्वत | आतपु - धूप
भावार्थ: पीला वस्त्र ओढ़े साँवले कृष्ण ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो नीलमणि के पर्वत पर सुबह की धूप पड़ रही हो। यह उत्प्रेक्षा अलंकार का सुंदर उदाहरण है।
10.
अधर धरत हरि कै परत, ओठ डीठि पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इंद्रधनुष रँग होति॥
शब्दार्थ: अधर - होंठ | डीठि - दृष्टि | पट - वस्त्र | जोति - प्रकाश | हरित - हरे
भावार्थ: कृष्ण जब बाँसुरी होंठों पर रखते हैं तो उनके लाल होंठ, काली आँखें और पीले वस्त्र का प्रकाश उस पर पड़ता है। हरे बाँस की बाँसुरी इंद्रधनुष के रंगों जैसी हो जाती है। रंगों का यह चित्र हिंदी काव्य में अनोखा है।
11.
पत्रा ही तिथि पाइयै, वा घर कै चहुँ पास।
नित प्रति पून्यौ ई रहै, आनन-ओप-उजास॥
शब्दार्थ: पत्रा - पंचांग | तिथि - दिनांक | पून्यौ - पूर्णिमा | आनन - मुख | ओप - चमक
भावार्थ: उस घर के आसपास तिथि जानने के लिए पंचांग देखना पड़ता है, क्योंकि वहाँ नायिका के मुख की चमक से हर दिन पूर्णिमा ही रहती है। सौंदर्य का इससे बड़ा अतिशयोक्ति-चित्र मुश्किल है।
12.
कीनैं हूँ कोटिक जतन, अब कहि काढ़ैं कौनु।
भो मन मोहन-रूपु मिलि, पानी मैं कौ लौनु॥
शब्दार्थ: कोटिक जतन - करोड़ों प्रयत्न | काढ़ैं - निकालना | लौनु - नमक
भावार्थ: अब करोड़ों प्रयत्न करके भी कोई इसे कैसे निकाले। मन कृष्ण के रूप में ऐसे मिल गया है जैसे पानी में नमक घुल जाता है। एक बार घुल जाने के बाद अलग करना असंभव है।
वियोग शृंगार के दोहे
वियोग के दोहों में नायिका की विरह-दशा का चित्रण है। बिहारी यहाँ भी अतिशयोक्ति का सहारा लेते हैं, पर उनका ज़ोर पीड़ा से ज़्यादा चित्र पर रहता है। ये चार दोहे सतसई के वियोग-वर्णन के प्रतिनिधि हैं।
13.
इति आवति चलि जाति उत, चली छ सातक हाथ।
चढ़ी हिंडोरैं सी रहै, लगी उसासनु साथ॥
शब्दार्थ: इति - इधर | उत - उधर | उसासनु - साँसों के | हिंडोरैं - झूला
भावार्थ: विरह में नायिका इतनी दुबली हो गई है कि साँसों के साथ ही इधर-उधर छह-सात हाथ खिसक जाती है। लगता है वह झूले पर चढ़ी हुई है। दुबलेपन का यह चित्र अतिशयोक्ति का प्रसिद्ध उदाहरण है।
14.
दृग उरझत टूटत कुटुम, जुरत चतुर चित प्रीति।
परति गाँठि दुरजन हियै, दई नई यह रीति॥
शब्दार्थ: दृग - आँखें | उरझत - उलझना | कुटुम - परिवार | जुरत - जुड़ना | दुरजन - दुर्जन | हियै - हृदय में
भावार्थ: आँखें उलझती हैं तो परिवार टूटता है, चतुर हृदयों में प्रीति जुड़ती है और गाँठ दुर्जनों के हृदय में पड़ जाती है। ईश्वर ने यह नई ही रीति बनाई है - काम कोई और करे, असर किसी और पर हो।
15.
बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन तन माँह।
देखि दुपहरी जेठ की, छाँहौं चाहति छाँह॥
शब्दार्थ: सघन बन - घना वन | पैठि - घुसकर | सदन - घर | छाँहौं - छाया भी
भावार्थ: जेठ की दोपहर इतनी तेज़ है कि छाया ख़ुद घने वन में जा बैठी और घरों के भीतर घुस गई। छाया भी छाया ढूँढ रही है। गर्मी का ऐसा चित्र हिंदी में दूसरा नहीं मिलता।
16.
तंत्रीनाद कवित्त रस, सरस राग रति रंग।
अनबूड़े बूड़े, तरे जे बूड़े सब अंग॥
शब्दार्थ: तंत्रीनाद - वीणा की ध्वनि | कवित्त रस - काव्य का आनंद | रति रंग - प्रेम का रंग | अनबूड़े - जो नहीं डूबे
भावार्थ: वीणा की ध्वनि, काव्य का रस, मधुर राग और प्रेम का रंग - इनमें जो नहीं डूबे, वही असल में डूब गए। और जो पूरी तरह डूब गए, वही तर गए। रसिकता को बिहारी मुक्ति का रास्ता मानते हैं।
नीति और उपदेश के दोहे
नीति के दोहों में बिहारी संसार, धन, संगति और आचरण पर बात करते हैं। यह पक्ष कम चर्चित है, पर यहीं उनका दोहा कबीर और रहीम के बराबर पहुँचता है। ये आठ दोहे सतसई के सबसे व्यावहारिक दोहे हैं।
17.
कनक कनक तें सौ गुनी, मादकता अधिकाइ।
उहिं खाएँ बौराइ नर, इहिं पाएँ बौराइ॥
शब्दार्थ: कनक - सोना तथा धतूरा (श्लेष) | मादकता - नशा | बौराइ - पागल होना
भावार्थ: सोने में धतूरे से सौ गुना ज़्यादा नशा होता है। धतूरा खाने पर आदमी पागल होता है, पर सोना तो पाते ही पागल कर देता है। "कनक" शब्द के दो अर्थ - सोना और धतूरा - इसे श्लेष अलंकार का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण बनाते हैं।
18.
बढ़त बढ़त संपति-सलिल, मन-सरोज बढ़ि जाइ।
घटत घटत सु न फिरि घटै, बरु समूल कुम्हिलाइ॥
शब्दार्थ: सलिल - जल | सरोज - कमल | बरु - बल्कि | समूल - जड़ सहित
भावार्थ: संपत्ति रूपी जल बढ़ता है तो मन रूपी कमल भी उसी के साथ ऊपर उठता जाता है। पर जल घटने पर मन उस हिसाब से नहीं घटता, बल्कि जड़ समेत मुरझा जाता है। इसीलिए अचानक ग़रीबी इंसान को तोड़ देती है।
19.
नर की अरु नल-नीर की, गति एकै करि जोइ।
जेतौ नीचौ ह्वै चलै, तेतौ ऊँचौ होइ॥
शब्दार्थ: नल-नीर - नल का पानी | गति - चाल | जेतौ - जितना | तेतौ - उतना
भावार्थ: मनुष्य और नल के पानी की चाल एक जैसी है। जितना नीचे होकर चलेगा, उतना ही ऊँचा उठेगा। विनम्रता पर इतना सटीक दोहा दुर्लभ है।
20.
जो चाहौ चटक न घटै, मैलौ होइ न मित्त।
रज राजस न छुवाइ तोहिं, नेह चीकनौ चित्त॥
शब्दार्थ: चटक - चमक | मित्त - मित्र | रज - धूल | राजस - रजोगुण | चीकनौ - चिकना
भावार्थ: मित्र, अगर चाहते हो कि तुम्हारी चमक न घटे और तुम मैले न हो, तो धूल और रजोगुण को छूने मत दो। प्रेम से चिकने हुए मन पर धूल जल्दी चिपकती है, इसलिए सावधान रहो।
21.
बसै बुराई जासु तन, ताही कौ सनमानु।
भलौ भलौ कहि छोड़िऐ, खोटैं ग्रह जपु दानु॥
शब्दार्थ: जासु - जिसके | सनमानु - सम्मान | खोटैं ग्रह - अशुभ ग्रह | जपु दानु - जप और दान
भावार्थ: जिसमें बुराई बसती है, सम्मान उसी का होता है। भले को भला कहकर छोड़ दिया जाता है, जबकि अशुभ ग्रहों के लिए जप और दान किया जाता है। समाज की विडंबना पर यह तीखा व्यंग्य है।
22.
दीरघ साँस न लेहि दुख, सुख साँईहि न भूलि।
दई दई क्यों करतु है, दई दई सु कबूलि॥
शब्दार्थ: दीरघ - लंबी | साँईहि - स्वामी, ईश्वर | दई - दैव, ईश्वर तथा "दिया हुआ" (श्लेष)
भावार्थ: दुख में लंबी साँस मत लो और सुख में ईश्वर को मत भूलो। "दैव-दैव" क्या पुकारते रहते हो, ईश्वर ने जो दिया है उसे स्वीकार कर लो। "दई" शब्द के दोहरे अर्थ से पूरा दोहा घूम जाता है।
23.
गिरि तैं ऊँचे रसिक-मन, बूड़े जहाँ हजारु।
बहै सदा पसु-नरनु कौ, प्रेम-पयोधि पगारु॥
शब्दार्थ: गिरि - पर्वत | रसिक-मन - रसिक हृदय | पयोधि - सागर | पगारु - खाई, नाली
भावार्थ: प्रेम का सागर इतना गहरा है कि पर्वत से ऊँचे रसिक मन भी हज़ारों बार डूबकर उसकी थाह नहीं पाते। पर पशु जैसे अरसिक लोगों के लिए वही सागर एक छोटी खाई जैसा है। एक ही चीज़ किसी के लिए अथाह और किसी के लिए मामूली।
24.
जो जिय की रुचि सौं लगै, कीजै सोई काम।
लोक-लाज कै डर बिना, सधै अपनो नाम॥
शब्दार्थ: जिय - मन | रुचि - इच्छा | सधै - सिद्ध होना
भावार्थ: जो काम मन की सच्ची रुचि से लगे, वही कीजिए। लोक-लाज के डर के बिना किया गया काम ही अपना नाम बनाता है। बिहारी दरबारी कवि थे, फिर भी यह स्वतंत्रता की बात कह रहे हैं।
अन्योक्ति के दोहे
अन्योक्ति यानी किसी और के बहाने अपनी बात कहना। बिहारी ने इसी शैली से राजा जयसिंह को सचेत किया था। ये चार दोहे उनकी सबसे चर्चित अन्योक्तियाँ हैं।
25.
नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं विकासु इहिं काल।
अली कली ही सौं बिंध्यौ, आगैं कौन हवाल॥
शब्दार्थ: परागु - फूल का पराग | मधु - रस | विकासु - खिलना | अली - भौंरा | बिंध्यौ - बिंध गया, फँस गया
भावार्थ: अभी न पराग है, न मीठा रस, न कली खिली ही है। फिर भी हे भौंरे, तू कली में ही उलझ गया, आगे तेरा क्या हाल होगा।
प्रचलित प्रसंग के अनुसार जब बिहारी अपनी वृत्ति लेने आमेर पहुँचे तो राजा जयसिंह नई रानी के प्रेम में इतने आसक्त थे कि राजकाज ही भुला बैठे थे। बिहारी ने राजा को सचेत करने के लिए यही दोहा लिखकर भिजवाया और इसे पढ़कर जयसिंह की आँखें खुल गईं।
यही दोहा बिहारी सतसई की रचना का कारण बना। दरबारी कवि होकर राजा को इतनी सफ़ाई से टोक देना अपने आप में बड़ी बात है।
26.
स्वारथु सुकृतु न, श्रमु वृथा, देखि विहंग विचारि।
बाज पराऐं पानि परि, तू पछिनु न मारि॥
शब्दार्थ: स्वारथु - स्वार्थ | सुकृतु - पुण्य | श्रमु - मेहनत | विहंग - पक्षी | पानि - हाथ | पछिनु - पक्षियों को
भावार्थ: हे बाज़, सोचकर देख - इसमें न तेरा स्वार्थ है, न पुण्य, मेहनत भी बेकार है। दूसरे के हाथ में पड़कर तू अपने ही जाति-भाइयों को मत मार।
यह भी अन्योक्ति है। बिहारी ने इसके ज़रिए जयसिंह को रोका था कि मुग़लों का पक्ष लेकर हिंदू राजाओं पर आक्रमण न करें। "बाज" यहाँ राजा है और "पछिनु" दूसरे राजा।
27.
जनम-जनम कौ बैर सौ, कासौं कहौं दुराइ।
या मन कौ मन ही सहै, कहत न बनि आइ॥
शब्दार्थ: बैर - दुश्मनी | कासौं - किससे | दुराइ - छिपाकर
भावार्थ: जन्मों पुरानी दुश्मनी जैसी यह बात किससे छिपाकर कहूँ। इस मन का दुख मन ही सहता है, कहते नहीं बनता। भीतर की पीड़ा पर बिहारी का सबसे संयत दोहा।
28.
इन दुखिया अँखियान कौं, सुख सिरजै ही नाहिं।
देखत बनै न देखतैं, अनदेखैं अकुलाहिं॥
शब्दार्थ: सिरजै - रचा, बनाया | अकुलाहिं - व्याकुल होना
भावार्थ: इन दुखियारी आँखों के लिए सुख बनाया ही नहीं गया। देखने पर देखते नहीं बनता और न देखने पर व्याकुल हो जाती हैं। प्रेम की यह दुविधा दो पंक्तियों में पूरी बैठ गई है।
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⚠️ "सतसैया के दोहरे" बिहारी का लिखा हुआ नहीं है
बिहारी के नाम से सबसे ज़्यादा उद्धृत होने वाला दोहा यह है -
सतसैया के दोहरे, ज्यौं नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गंभीर॥
शब्दार्थ: नावक - एक छोटा तीर, जो नली से चलाया जाता था
भावार्थ: सतसई के दोहे नावक के तीर जैसे हैं। देखने में छोटे लगते हैं, पर गहरा घाव करते हैं।
असली बात यह है कि यह दोहा बिहारी ने नहीं लिखा। यह दोहा बिहारी की प्रशंसा में किसी और ने लिखा था और परंपरा से चला आ रहा है। कवि संग्रह के अनुसार भी यह दोहा बिहारी के दोहों के बारे में किसी ने कहा है, यह उनका अपना दोहा नहीं है।
पहचान का तरीक़ा भी सीधा है - इस दोहे में सतसई की तारीफ़ की जा रही है। कोई कवि अपनी ही रचना की इस तरह तारीफ़ नहीं करता। इसके अलावा बिहारी के अपने दोहों में अक्सर "बिहारी" शब्द छाप के रूप में नहीं आता, पर विषय हमेशा शृंगार, नीति या भक्ति होता है, अपनी रचना की प्रशंसा नहीं।
बहुत सी वेबसाइटें और कुछ गाइड इसे बिहारी का दोहा बताकर छापती हैं। परीक्षा में अगर पूछा जाए कि यह दोहा किसका है, तो सही उत्तर है - यह बिहारी की प्रशंसा में कही गई पंक्ति है, उनकी अपनी रचना नहीं। इसे उद्धृत कीजिए, पर "बिहारी ने कहा" लिखने से बचिए।
बिहारी सतसई में कितने दोहे हैं
बिहारी सतसई में दोहों की संख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद है। सबसे स्वीकृत संख्या 713 है, जबकि कुछ संस्करणों में 719 दोहे मिलते हैं। "सतसई" नाम का अर्थ ही सात सौ है, इसलिए संख्या इसी के आसपास मानी जाती है।
कवि संग्रह के अनुसार बिहारी सतसई में 713 दोहे हैं। वहीं कुछ स्रोत राजा जयसिंह के दरबार में रहकर लिखे गए 719 दोहे बताते हैं। बिहारी सतसई मुक्तक काव्य है और इसमें 713 से 719 दोहे संकलित माने जाते हैं।
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संस्करण / स्रोत |
दोहों की संख्या |
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सर्वाधिक स्वीकृत गणना |
713 |
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कुछ संस्करण |
719 |
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"सतसई" शब्द का शाब्दिक अर्थ |
सात सौ (700) |
परीक्षा में अगर संख्या पूछी जाए तो 713 लिखना सबसे सुरक्षित है, और चाहें तो कोष्ठक में जोड़ सकते हैं कि कुछ संस्करणों में 719 मिलते हैं। यह अंतर इसलिए है कि अलग-अलग हस्तलिखित प्रतियों में कुछ दोहे जुड़ते-घटते रहे।
बिहारी की यही एकमात्र रचना है। इतनी छोटी रचना से इतनी बड़ी प्रतिष्ठा पाने वाले कवि हिंदी में कम ही हैं।
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बिहारी को "गागर में सागर" वाला कवि क्यों कहते हैं
बिहारी को गागर में सागर भरने वाला कवि इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे दोहे जैसे छोटे छंद में बहुत गहरी और विस्तृत बात कह देते हैं। दोहे में केवल 24 मात्राओं की दो पंक्तियाँ होती हैं, और इतनी सी जगह में बिहारी पूरा दृश्य, भाव और व्यंग्य एक साथ भर देते हैं।
इसके तीन कारण हैं:
• समास पद्धति: वे शब्दों को जोड़कर वाक्य छोटा कर देते हैं। "भरे भौन मैं करत हैं नैननु हीं सौं बात" में पूरा प्रसंग एक पंक्ति में आ गया।
• श्लेष का प्रयोग: एक शब्द के दो अर्थ निकालकर वे दोहे की क्षमता दोगुनी कर देते हैं। "कनक", "दई" और "हरित" इसके उदाहरण हैं।
• संकेत शैली: वे पूरा वर्णन नहीं करते, सिर्फ़ इशारा करते हैं और बाक़ी पाठक की कल्पना पर छोड़ देते हैं।
पंडित पद्मसिंह शर्मा ने इसी बात को सराहते हुए लिखा था कि बिहारी के दोहों का अर्थ गंगा की विशाल जलधारा जैसा है, जो शिव की जटाओं में समा गई थी।
बिहारी भक्तिकाल के कवि हैं या रीतिकाल के
बिहारी रीतिकाल के कवि हैं, भक्तिकाल के नहीं। यह भ्रम इसलिए होता है क्योंकि उनके दोहे कबीर और रहीम जैसे लगते हैं और उनमें राधा-कृष्ण भी आते हैं। पर उनका मुख्य रस शृंगार है और उद्देश्य काव्य-कौशल दिखाना, भक्ति नहीं।
रीतिकाल के कवि तीन वर्गों में बाँटे जाते हैं, और बिहारी रीतिसिद्ध शाखा के प्रमुख कवि माने जाते हैं।
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शाखा |
विशेषता |
प्रमुख कवि |
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रीतिबद्ध |
लक्षण-ग्रंथ लिखे, नियमों के अनुसार रचना |
केशवदास, चिंतामणि, मतिराम, देव |
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रीतिसिद्ध |
लक्षण नहीं लिखे, पर रीति की पूरी जानकारी |
बिहारी |
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रीतिमुक्त |
रीति के बंधन से मुक्त, स्वच्छंद प्रेम काव्य |
घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर |
इस अंतर को याद रखने का आसान तरीक़ा है - बिहारी ने काव्यशास्त्र आचार्य केशवदास से सीखा था, इसलिए उन्हें रीति का पूरा ज्ञान था, पर उन्होंने कोई लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा। सिर्फ़ रचना की। इसीलिए वे रीतिसिद्ध हैं।
बिहारी और रहीम के दोहों में क्या अंतर है
बिहारी और रहीम दोनों दोहा-कवि हैं और दोनों ब्रजभाषा में लिखते हैं, इसलिए भ्रम होता है। पर रहीम भक्तिकाल के नीति-कवि हैं और बिहारी रीतिकाल के शृंगार-कवि। रहीम समझाते हैं, बिहारी चित्र खींचते हैं।
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आधार |
रहीम के दोहे |
बिहारी के दोहे |
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काव्य-काल |
भक्तिकाल |
रीतिकाल (रीतिसिद्ध) |
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मुख्य विषय |
नीति, मित्रता, परोपकार |
शृंगार, फिर नीति और भक्ति |
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मुख्य रस |
शांत |
शृंगार |
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शैली |
उदाहरण देकर समझाना |
संकेत से चित्र खींचना |
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भाषा-विशेषता |
सरल और सीधी |
समासयुक्त, श्लेष से भरी |
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रचना |
रहीम सतसई, बरवै नायिका भेद |
बिहारी सतसई (एकमात्र) |
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छाप |
"रहीम" या "रहिमन" आता है |
प्रायः कोई छाप नहीं |
एक बात याद रखने लायक़ है - रहीम के दोहे में लगभग हमेशा "रहिमन" शब्द मिलता है, जबकि बिहारी के दोहों में उनका नाम नहीं आता। यह पहचान का सबसे आसान तरीक़ा है।
रहीम के दोहे भी इसी तरह अर्थ सहित पढ़ने हों तो रहीम के दोहे देखिए। भक्तिकाल की तुलना करनी हो तो कबीर के दोहे पढ़िए।
NCERT में बिहारी के दोहे किस कक्षा में हैं
बिहारी के दोहे NCERT की कक्षा 10 हिंदी पाठ्यक्रम ब (स्पर्श भाग 2) में हैं और अध्याय का नाम "दोहे" है। इसमें बिहारी के चुने हुए दोहे संकलित हैं। कई छात्र इसे रहीम या कबीर का अध्याय समझ लेते हैं, जो सबसे आम भ्रम है।
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कक्षा |
पुस्तक |
अध्याय |
कवि |
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कक्षा 9 |
स्पर्श भाग 1 |
रैदास और रहीम के दोहे |
रहीम |
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कक्षा 10 |
स्पर्श भाग 2, अध्याय 3 |
दोहे |
बिहारी |
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कक्षा 10 |
क्षितिज भाग 2 |
पद, सवैये |
सूरदास, देव |
सक्सेसCDS की सामग्री जम्मू-कश्मीर बोर्ड कक्षा 10 हिंदी भास्कर भाग 2 के पाठ 2 "बिहारी के दोहे" पर भी उपलब्ध है। यानी CBSE के अलावा राज्य बोर्डों में भी बिहारी कक्षा 10 में ही पढ़ाए जाते हैं।
परीक्षा में बिहारी के दोहे कैसे लिखें
बिहारी के दोहों का उत्तर लिखते समय सबसे ज़्यादा अंक अलंकार की पहचान में मिलते हैं। उनके दोहे श्लेष, उत्प्रेक्षा और अतिशयोक्ति से भरे हैं, और यही हिस्सा छात्र सबसे ज़्यादा छोड़ देते हैं।
उत्तर का सही क्रम:
• संदर्भ: दोहा बिहारी का है और बिहारी सतसई से लिया गया है। एक वाक्य काफ़ी है।
• शब्दार्थ: कठिन ब्रज शब्दों का अर्थ अलग से। यह आसान अंक है।
• भावार्थ: सरल हिंदी में पूरा अर्थ, श्लेष वाले शब्दों के दोनों अर्थ खोलते हुए।
• काव्य सौंदर्य: भाषा (ब्रजभाषा), छंद (दोहा), रस (शृंगार) और अलंकार। "कनक कनक" में श्लेष, "मनौ नीलमनि सैल पर" में उत्प्रेक्षा और "चढ़ी हिंडोरैं सी रहै" में अतिशयोक्ति है।
वे ग़लतियाँ जो नंबर काटती हैं:
• बिहारी को भक्तिकाल का कवि लिख देना: वे रीतिकाल के रीतिसिद्ध कवि हैं। यह सबसे भारी ग़लती है।
• "सतसैया के दोहरे" को बिहारी का दोहा बताना: यह उनकी प्रशंसा में कही गई पंक्ति है, उनकी रचना नहीं।
• श्लेष छोड़ देना: "कनक" के दोनों अर्थ - सोना और धतूरा - लिखे बिना उत्तर अधूरा माना जाता है। यही बात "दई" और "हरित" पर भी लागू है।
• दोहों की संख्या ग़लत लिखना: 713 लिखिए। चाहें तो जोड़ दें कि कुछ संस्करणों में 719 मिलते हैं।
• ब्रज शब्दों को शुद्ध हिंदी बना देना: "नैननु" को "नयनों" और "भौन" को "भवन" मूल पाठ में लिखना ग़लत है। अर्थ में लिखिए, पाठ में नहीं।
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मुख्य बातें (Key Takeaways)
• बिहारी का पूरा नाम बिहारीलाल चौबे था, जन्म लगभग 1595 ई. में बसुआ गोविंदपुर (ग्वालियर के पास) और निधन लगभग 1663 ई. में हुआ।
• उनकी एकमात्र रचना बिहारी सतसई है, जो 1662 ई. में लिखी गई और जिसमें लगभग 713 दोहे हैं। कुछ संस्करणों में यह संख्या 719 है।
• वे रीतिकाल की रीतिसिद्ध शाखा के प्रमुख कवि हैं, भक्तिकाल के नहीं। उनका मुख्य रस शृंगार है।
• उन्हें "गागर में सागर भरने वाला कवि" कहा जाता है, क्योंकि वे समास, श्लेष और संकेत शैली से दोहे की क्षमता कई गुना बढ़ा देते हैं।
• "सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर" वाला दोहा बिहारी का लिखा हुआ नहीं है, बल्कि उनकी प्रशंसा में कहा गया है।
• "नहिं परागु नहिं मधुर मधु" अन्योक्ति लिखकर उन्होंने राजा जयसिंह को राजकाज की ओर लौटाया था, और यही सतसई की रचना का कारण बना।
• NCERT में बिहारी के दोहे कक्षा 10 स्पर्श भाग 2 के अध्याय 3 "दोहे" में हैं। कक्षा 9 वाले दोहे रहीम के हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. बिहारी के सबसे प्रसिद्ध दोहे कौन से हैं?
बिहारी के सबसे प्रसिद्ध दोहों में "कहत, नटत, रीझत, खिझत", "मेरी भव-बाधा हरौ", "कनक कनक तें सौ गुनी" और "नहिं परागु नहिं मधुर मधु" शामिल हैं। पहला संयोग शृंगार का, दूसरा मंगलाचरण, तीसरा नीति और चौथा अन्योक्ति का उदाहरण है।
Q2. बिहारी सतसई में कितने दोहे हैं?
बिहारी सतसई में सर्वाधिक स्वीकृत गणना के अनुसार 713 दोहे हैं, जबकि कुछ संस्करणों में 719 मिलते हैं। यह अंतर अलग-अलग हस्तलिखित प्रतियों के कारण है। "सतसई" शब्द का शाब्दिक अर्थ ही सात सौ है।
Q3. क्या "सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर" बिहारी का दोहा है?
नहीं, यह दोहा बिहारी का लिखा हुआ नहीं है। यह बिहारी की प्रशंसा में किसी और द्वारा कहा गया दोहा है और परंपरा से चला आ रहा है। पहचान का तरीक़ा सीधा है - इसमें सतसई की तारीफ़ की जा रही है, और कोई कवि अपनी ही रचना की ऐसी तारीफ़ नहीं करता।
Q4. बिहारी भक्तिकाल के कवि हैं या रीतिकाल के?
बिहारी रीतिकाल के कवि हैं, भक्तिकाल के नहीं। वे रीतिसिद्ध शाखा के प्रमुख कवि माने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने कोई लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा पर उन्हें रीति का पूरा ज्ञान था। उनका मुख्य रस शृंगार है।
Q5. बिहारी को "गागर में सागर" वाला कवि क्यों कहते हैं?
क्योंकि वे दोहे जैसे छोटे छंद में बहुत गहरी और विस्तृत बात कह देते हैं। इसके तीन कारण हैं - समास पद्धति से वाक्य छोटा करना, श्लेष से एक शब्द के दो अर्थ निकालना, और पूरा वर्णन करने के बजाय सिर्फ़ संकेत देना।
Q6. बिहारी के आश्रयदाता कौन थे?
बिहारी के आश्रयदाता आमेर यानी जयपुर के मिर्ज़ा राजा जयसिंह थे। उन्होंने बिहारी की वार्षिक वृत्ति बाँध दी थी। बिहारी ने उन्हीं के दरबार में रहकर बिहारी सतसई की रचना की।
Q7. बिहारी ने राजा जयसिंह को कौन सा दोहा भेजा था?
बिहारी ने "नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं विकासु इहिं काल। अली कली ही सौं बिंध्यौ, आगैं कौन हवाल" दोहा भेजा था। राजा जयसिंह नई रानी के प्रेम में राजकाज भूल गए थे। यह अन्योक्ति पढ़कर उनकी आँखें खुलीं और वे कर्तव्य पर लौट आए।
Q8. "कनक कनक तें सौ गुनी" में कौन सा अलंकार है?
इसमें श्लेष अलंकार है। "कनक" शब्द के दो अर्थ हैं - सोना और धतूरा। धतूरा खाने पर नशा होता है, जबकि सोना तो पाते ही आदमी को पागल कर देता है। यह श्लेष का हिंदी साहित्य में सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
Q9. बिहारी के गुरु कौन थे?
बिहारी ने काव्यशास्त्र की शिक्षा आचार्य केशवदास से प्राप्त की थी। इसी शिक्षा के कारण उन्हें रीति और अलंकारों का गहरा ज्ञान था, हालाँकि उन्होंने ख़ुद कोई लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा।
Q10. NCERT में बिहारी के दोहे किस कक्षा में हैं?
बिहारी के दोहे NCERT कक्षा 10 हिंदी पाठ्यक्रम ब यानी स्पर्श भाग 2 के अध्याय 3 "दोहे" में हैं। कक्षा 9 की स्पर्श भाग 1 में जो दोहे हैं, वे रहीम के हैं, बिहारी के नहीं। यह भ्रम बहुत आम है।
Q11. क्या बिहारी के दोहे कॉपीराइट में हैं?
नहीं, बिहारी की रचनाएँ सार्वजनिक डोमेन में हैं क्योंकि वे लगभग साढ़े तीन सौ साल पुरानी हैं। इन्हें कोई भी पढ़, उद्धृत और प्रकाशित कर सकता है। हालाँकि किसी आधुनिक विद्वान की टीका या संपादित संस्करण की भूमिका पर कॉपीराइट लागू हो सकता है।
Q12. क्या मैं भी अपनी कविता ऑनलाइन प्रकाशित कर सकता हूँ?
हाँ, ख़ुद की कलम के कविता प्लेटफ़ॉर्म पर कोई भी लेखक मुफ़्त में अपनी कविता, दोहे या शायरी प्रकाशित कर सकता है। अगर आप अपनी रचनाओं की किताब छपवाना चाहते हैं तो प्रकाशन सेवा ₹9,999 से शुरू होती है।
निष्कर्ष
बिहारी को पढ़ते समय जल्दबाज़ी मत कीजिए। उनका दोहा पहली बार में साधारण लगता है और दूसरी बार में खुलता है। "कनक कनक" या "दई दई" जैसे शब्दों पर रुककर सोचिए कि दूसरा अर्थ क्या हो सकता है - वहीं असली मज़ा है।
इस पेज पर दिए 28 दोहे शुरुआत के लिए काफ़ी हैं। आगे बढ़ना हो तो पूरी बिहारी सतसई पढ़िए। और दो बातें याद रखिए - बिहारी रीतिकाल के कवि हैं, और "सतसैया के दोहरे" उनका अपना दोहा नहीं है। यही दो बातें परीक्षा में आपके नंबर बचा लेंगी।
✍️ आपकी अपनी कलम का क्या?
बिहारी ने सिर्फ़ एक किताब लिखी - सात सौ दोहे। और उसी एक किताब ने उन्हें हिंदी साहित्य में हमेशा के लिए जगह दिला दी। लिखने के लिए बहुत लिखना ज़रूरी नहीं, सही लिखना ज़रूरी है।
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