रसखान के पद ( Raskhan Ke Pad )
रसखान के पद और सवैये अर्थ सहित: 15 प्रसिद्ध रचनाएँ भावार्थ के साथ
रसखान के पद और सवैये ब्रजभाषा की वे रचनाएँ हैं जिनमें एक मुसलमान कवि ने कृष्ण-प्रेम को सबसे सुंदर रूप दिया। सैयद इब्राहिम नाम के इस कवि को उनकी रसमयता के कारण "रस की खान" कहा गया, और यही नाम आगे चलकर रसखान बन गया। इस पेज पर उनकी 15 प्रसिद्ध रचनाएँ शब्दार्थ और भावार्थ के साथ दी गई हैं।
एक ज़रूरी बात पहले। रसखान असल में "पद" के कवि नहीं, सवैये के कवि हैं। लोग खोजते "रसखान के पद" हैं, पर जो पंक्तियाँ उन्हें चाहिए - जैसे "मानुस हौं तो वही रसखान" - वे सवैये हैं, पद नहीं। इसका पूरा फ़र्क़ नीचे समझाया गया है, क्योंकि परीक्षा में यही अंतर पूछा जाता है।
रसखान के पद हैं या सवैये - असली फ़र्क़ समझिए
रसखान मुख्य रूप से सवैया और कवित्त के कवि हैं, पद के नहीं। हिंदी साहित्य में "पद" गाया जाने वाला छंद है जिसमें स्थायी और अंतरा होते हैं, जैसे सूरदास और मीरा के पद। रसखान की पहचान सवैया से है, जिसमें चार समान चरण होते हैं और लय लंबी तथा प्रवाहपूर्ण होती है।
हिंदवी के रसखान संग्रह में सवैया 60, दोहा 14, सोरठा 3 और पद केवल 1 सूचीबद्ध है। यह आँकड़ा ख़ुद बता देता है कि रसखान की असली विधा कौन सी है। इसीलिए NCERT की कक्षा 9 की पुस्तक में भी अध्याय का नाम "सवैये" है, "पद" नहीं।
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छंद |
बनावट |
रसखान के यहाँ |
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सवैया |
चार समान चरण, हर चरण में 22 से 26 वर्ण |
मुख्य विधा - लगभग 60 रचनाएँ |
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कवित्त (घनाक्षरी) |
चार चरण, हर चरण में 31 वर्ण |
सुजान रसखान में प्रमुख |
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दोहा |
दो पंक्तियाँ, 13 और 11 मात्राएँ |
प्रेमवाटिका में लगभग 14 |
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सोरठा |
दोहे का उलटा रूप, 11 और 13 मात्राएँ |
बहुत कम, लगभग 3 |
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पद |
स्थायी और अंतरा, गाने योग्य |
नाममात्र, लगभग 1 |
तो अगर आप "रसखान के पद" खोज रहे हैं, तो आपको असल में उनके सवैये चाहिए। इस पेज पर दोनों दिए गए हैं - प्रसिद्ध सवैये, कवित्त और प्रेमवाटिका के दोहे भी।
रसखान का संक्षिप्त परिचय
रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था और उनका जन्म लगभग 1548 ई. में हुआ। वे मुसलमान होते हुए भी जीवन भर कृष्ण-भक्ति में डूबे रहे और गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य बने। उनका निधन लगभग 1628 ई. में हुआ और उनकी समाधि महावन (मथुरा) में है।
विकिपीडिया के अनुसार रसखान का जन्म 1548 ई. में पिहानी में हुआ। वे विट्ठलनाथ के शिष्य और वल्लभ संप्रदाय के सदस्य थे, और उन्हें "रस की खान" कहा गया। हिंदी के कृष्णभक्त तथा रीतिकालीन रीतिमुक्त कवियों में उनका महत्वपूर्ण स्थान है और उनके काव्य में भक्ति तथा शृंगार दोनों रस प्रधानता से मिलते हैं।
जन्मस्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। एक मत के अनुसार उनका जन्म मुग़ल राजवंश से संबंधित एक प्रतिष्ठित पठान परिवार में दिल्ली में हुआ था। कहा जाता है कि श्रीनाथ जी के मंदिर में उन्हें कृष्ण के साक्षात दर्शन हुए, तभी से वे ब्रजभूमि में रहने लगे और आजीवन वहीं रहे।
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विवरण |
जानकारी |
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मूल नाम |
सैयद इब्राहिम |
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जन्म |
लगभग 1548 ई. |
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जन्मस्थान |
पिहानी (हरदोई) अथवा दिल्ली - विद्वानों में मतभेद |
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निधन |
लगभग 1628 ई. |
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समाधि |
महावन, मथुरा (ब्रज) |
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गुरु |
गोस्वामी विट्ठलनाथ |
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संप्रदाय |
वल्लभ संप्रदाय (पुष्टिमार्ग) |
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भाषा |
ब्रजभाषा |
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प्रमुख छंद |
सवैया और कवित्त |
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रचनाएँ |
सुजान रसखान, प्रेमवाटिका |
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उपाधि |
रस की खान |
रसखान की सरसता ऐसी थी कि लोग एक सवैया सुनाने के बजाय "एक रसखान सुनाओ" कहने लगे थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी हिंदी साहित्य के इतिहास में उनकी प्रशंसा की है। यही वजह है कि उनका उपनाम ही उनकी विधा का पर्याय बन गया।
हिंदी साहित्य के और बड़े नाम पढ़ने हों तो हमारा लेखक संग्रह देखिए।
ब्रजभूमि पर रसखान के प्रसिद्ध सवैये
ब्रज वाले सवैयों में रसखान अगले जन्म में भी ब्रज में ही रहना चाहते हैं, चाहे किसी भी रूप में। इनमें भक्ति से ज़्यादा लगाव और अपनापन है। ये चार सवैये NCERT कक्षा 9 में भी हैं और रसखान की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ मानी जाती हैं।
1. मानुस हौं तो वही रसखानि
मानुस हौं तो वही रसखानि, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदंब की डारन॥
शब्दार्थ: मानुस - मनुष्य | ग्वारन - ग्वालों के बीच | पसु - पशु | धेनु - गाय | मँझारन - बीच में | पाहन - पत्थर | गिरि - पर्वत | पुरंदर - इंद्र | खग - पक्षी | कालिंदी - यमुना | कूल - किनारा
भावार्थ: रसखान कहते हैं कि अगर मैं मनुष्य बनूँ तो गोकुल के ग्वालों के बीच ही रहूँ। अगर पशु बनूँ तो इसमें मेरा वश नहीं, फिर भी नंद की गायों के बीच चरता रहूँ। अगर पत्थर बनूँ तो उसी गोवर्धन का, जिसे कृष्ण ने इंद्र के कोप से बचाने के लिए छाते की तरह उठाया था। और अगर पक्षी बनूँ तो यमुना किनारे कदंब की डाल पर बसेरा करूँ।
यह सवैया रसखान की पूरी काव्य-दृष्टि का सार है। उन्हें मोक्ष नहीं चाहिए, बस ब्रज चाहिए - किसी भी रूप में। चारों विकल्प चढ़ते क्रम में हैं और हर विकल्प में एक ही शर्त है, वह जगह कृष्ण की हो।
2. या लकुटी अरु कामरिया पर
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवौ निधि को सुख, नंद की गाइ चराइ बिसारौं॥
रसखानि कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक ए कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥
शब्दार्थ: लकुटी - लाठी | कामरिया - कंबल | तिहूँ पुर - तीनों लोक | तजि डारौं - छोड़ दूँ | तड़ाग - तालाब | कोटिक - करोड़ों | कलधौत - सोना-चाँदी | धाम - महल | करील - काँटेदार झाड़ी | वारौं - न्योछावर करूँ
भावार्थ: कृष्ण की लाठी और कंबल के बदले मैं तीनों लोकों का राज्य छोड़ दूँ। नंद की गाय चराने के सुख के आगे आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ भूल जाऊँ। रसखान कहते हैं कि कभी इन आँखों से ब्रज के वन, बाग और तालाब देख सकूँ। करोड़ों सोने के महल भी ब्रज की करील की झाड़ियों पर न्योछावर कर दूँ।
तुलना यहीं इस सवैये की ताक़त है - लाठी बनाम तीनों लोकों का राज, और काँटेदार झाड़ी बनाम करोड़ों सोने के महल। रसखान हर बार छोटी चीज़ चुनते हैं, क्योंकि वह ब्रज की है।
3. सेस गनेस महेस दिनेस
सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं।
जाहि अनादि अनंत अखंड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रटैं, पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥
शब्दार्थ: सेस - शेषनाग | दिनेस - सूर्य | सुरेस - इंद्र | अनादि - जिसका आदि न हो | अछेद - जो छेदा न जा सके | सुक - शुकदेव | पचिहारे - थक गए | अहीर - ग्वाला | छोहरियाँ - लड़कियाँ | छछिया - छोटा बरतन
भावार्थ: जिनका गुणगान शेषनाग, गणेश, महेश, सूर्य और इंद्र लगातार करते हैं। जिन्हें वेद अनादि, अनंत, अखंड, अछेद्य और अभेद्य बताते हैं। नारद, शुकदेव और व्यास जैसे ऋषि जिनका नाम रटते-रटते थक गए, फिर भी पार नहीं पा सके। उन्हीं कृष्ण को ग्वालों की लड़कियाँ एक कटोरी छाछ के बदले नचा देती हैं।
यह रसखान का सबसे चर्चित सवैया है और इसकी संरचना बेमिसाल है। तीन पंक्तियों तक वे कृष्ण की अपार महिमा बाँधते हैं और चौथी पंक्ति में एक कटोरी छाछ से पूरा भार गिरा देते हैं। भक्ति के सामने ऐश्वर्य कितना छोटा है, यह इससे बेहतर किसी ने नहीं कहा।
4. मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं
मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरें पहिरौंगी।
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन, गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी॥
भावतो वोहि मेरो रसखानि सो, तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी॥
शब्दार्थ: मोरपखा - मोरपंख | गुंज - घुँघची के लाल बीज | गरें - गले में | पितंबर - पीला वस्त्र | लकुटी - लाठी | गोधन - गायें | स्वाँग - रूप, वेश | अधरान - होंठों पर
भावार्थ: एक गोपी कह रही है कि वह कृष्ण जैसा रूप धर लेगी - सिर पर मोरपंख रखेगी, गले में गुंज की माला पहनेगी, पीतांबर ओढ़ेगी और लाठी लेकर ग्वालों के साथ गाय चराने जाएगी। तुम्हारे कहने पर वह यह सारा स्वाँग कर लेगी। पर एक शर्त है - कृष्ण के होंठों से लगी यह मुरली वह अपने होंठों पर नहीं रखेगी।
अंतिम पंक्ति ही इस सवैये की जान है। गोपी सब कुछ करने को तैयार है, पर मुरली नहीं छुएगी, क्योंकि उसी मुरली ने कृष्ण को उससे दूर किया है। प्रेम में यह हल्की सी जलन इसे इतना मानवीय बनाती है।
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कृष्ण की लीला और रूप पर रसखान की रचनाएँ
इन रचनाओं में रसखान कृष्ण के रूप, बाँसुरी और होली का वर्णन करते हैं। यहाँ भक्ति के साथ शृंगार भी है, जो रसखान को दूसरे कृष्णभक्त कवियों से अलग करता है। ये छह रचनाएँ सुजान रसखान से हैं।
5. धुरि भरे अति सोहत स्याम जू
धुरि भरे अति सोहत स्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति पीरी कछोटी॥
वा छबि को रसखानि बिलोकत, वारत काम कला निज कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥
शब्दार्थ: धुरि - धूल | सोहत - सुशोभित होना | पैंजनी - पायल | पीरी - पीली | कछोटी - लँगोटी | बिलोकत - देखकर | वारत - न्योछावर | कोटी - करोड़ों | काग - कौआ
भावार्थ: धूल से सने हुए कृष्ण बहुत सुंदर लग रहे हैं और सिर पर वैसी ही सुंदर चोटी बनी है। वे आँगन में खेलते-खाते घूम रहे हैं, पैरों की पायल बज रही है और पीली लँगोटी पहने हैं। रसखान कहते हैं कि यह छवि देखकर करोड़ों कामदेव की कला न्योछावर हो जाए। हे सखी, उस कौए के भाग्य बड़े हैं जो कृष्ण के हाथ से माखन-रोटी छीन ले गया।
अंतिम पंक्ति हिंदी की सबसे प्रसिद्ध पंक्तियों में है। कवि को कृष्ण से सीधा संपर्क नहीं मिला, इसलिए वह एक कौए से ईर्ष्या कर रहा है। भक्ति की यह विनम्रता ही रसखान की पहचान है।
6. कानन दै अँगुरी रहिहौं
कानन दै अँगुरी रहिहौं, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।
मोहनी तानन सों रसखानि, अटा चढ़ि गोधन गाइ सुनैहै॥
टेरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि, काल्हि कोऊ कितनो समझैहै।
माई री वा मुख की मुसकानि, सम्हारि न जैहै न जैहै न जैहै॥
शब्दार्थ: कानन - कानों में | अँगुरी - उँगली | धुनि - ध्वनि | अटा - छत | टेरि - पुकारकर | सिगरे - सारे | काल्हि - कल
भावार्थ: एक गोपी कहती है कि जब भी मुरली की धीमी धुन बजेगी, वह कानों में उँगली डाल लेगी। रसखान कहते हैं कि कृष्ण छत पर चढ़कर मोहक तानों से गीत सुनाएँगे। वह सारे ब्रजवासियों को पुकारकर कह देना चाहती है कि कल कोई कितना भी समझा ले। पर हे माई, उस मुख की मुस्कान सँभाली नहीं जाएगी, नहीं जाएगी, नहीं जाएगी।
अंत में तीन बार "न जैहै" दोहराना इस सवैये को असाधारण बनाता है। गोपी संकल्प तो कर रही है, पर उसी वाक्य में हार भी मान रही है। यही आंतरिक टकराव रसखान की सबसे बड़ी कला है।
7. ब्रज के बिपिन बीच जमुना के तीर
ब्रज के बिपिन बीच जमुना के तीर तट,
कदम के डार पर बैठे मुसकात हैं।
कहै रसखानि रूप देखत बनै न कहत,
मोर मुकुट पीत बसन फहरात हैं॥
शब्दार्थ: बिपिन - वन | तीर तट - किनारे | डार - डाली | बसन - वस्त्र | फहरात - लहराना
भावार्थ: ब्रज के वन में यमुना के किनारे कदंब की डाल पर कृष्ण बैठे मुस्कुरा रहे हैं। रसखान कहते हैं कि यह रूप देखते ही बनता है, कहा नहीं जा सकता। सिर पर मोरमुकुट है और पीले वस्त्र हवा में लहरा रहे हैं।
यह कवित्त छंद है, सवैया नहीं। "देखत बनै न कहत" वाली स्वीकृति भक्ति काव्य की एक पुरानी परंपरा है, जिसमें कवि मानता है कि शब्द कम पड़ रहे हैं।
8. खेलत फाग सुहाग भरी
खेलत फाग सुहाग भरी, अनुरागहिं लाल गुलाल लगावै।
छैल छबीले सखा लिए, सँग हँसि हँसि मारत बैन सुनावै॥
देखत ही रसखानि सबै, सुधि बुधि बिसरै मन ही मन भावै।
ऐसी दसा भइ गोपिन की, कि गुलाल की धूरि में देह छिपावै॥
शब्दार्थ: फाग - होली | अनुरागहिं - प्रेम से | छैल छबीले - सजीले | बैन - वचन | सुधि बुधि - होश | धूरि - धूल
भावार्थ: सुहाग से भरी होली खेली जा रही है और कृष्ण प्रेम से लाल गुलाल लगा रहे हैं। सजीले सखाओं के साथ वे हँस-हँसकर मीठी बातें सुना रहे हैं। रसखान कहते हैं कि यह देखते ही सबकी सुध-बुध जाती रहती है और मन ही मन अच्छा लगता है। गोपियों की ऐसी दशा हो गई कि वे गुलाल की धूल में अपना शरीर छिपा रही हैं।
ब्रज की होली रसखान का प्रिय विषय है। उन्होंने होली के कई सवैये लिखे, जिनमें रंग के साथ छेड़छाड़ और लज्जा दोनों का चित्रण मिलता है।
9. सुनि री सखी मुरली
सुनि री सखी मुरली अधरान धरी, वह तान सुनाइ गई।
रसखानि कहै सुधि बुधि बिसरी, तन की सुध कौन गँवाइ गई॥
जमुना के तीर कदंब तरे, वह मूरति नैनन आइ गई।
अब कैसे रहौं घर बीच सखी, मन तो ब्रज ओर बुलाइ गई॥
शब्दार्थ: अधरान - होंठों पर | तान - स्वर | बिसरी - भूल गई | तरे - नीचे | नैनन - आँखों में
भावार्थ: एक गोपी सखी से कहती है कि होंठों पर रखी मुरली ने वह तान सुना दी। रसखान कहते हैं कि उससे सुध-बुध ही जाती रही, शरीर तक की सुध कौन ले गया, पता नहीं। यमुना किनारे कदंब के नीचे वह मूरत आँखों में बस गई। अब घर में कैसे रहूँ सखी, मन तो ब्रज की ओर बुला रहा है।
रसखान के यहाँ मुरली सिर्फ़ वाद्य नहीं, बुलावा है। जो सुन ले वह घर में नहीं रह पाता - यही उनके कई सवैयों का केंद्रीय भाव है।
10. जोगी हौं जती हौं
जोगी हौं जती हौं, तपी हौं, सतसंगी हौं,
कहै रसखानि रसखान ही में राचिहौं।
मानुस हौं तो कहा, बस मेरो नहीं,
ब्रज की रज में ही जनम याचिहौं॥
शब्दार्थ: जोगी - योगी | जती - यति, संन्यासी | तपी - तपस्वी | राचिहौं - रम जाऊँगा | रज - धूल | याचिहौं - माँगूँगा
भावार्थ: चाहे मैं योगी बनूँ, संन्यासी बनूँ, तपस्वी बनूँ या सत्संगी - रसखान कहते हैं कि मैं रस में ही रमा रहूँगा। मनुष्य बनूँ तो भी मेरा वश नहीं चलता, बस ब्रज की धूल में जन्म माँगूँगा।
यहाँ रसखान अपने ही नाम पर श्लेष कर रहे हैं। "रसखान ही में राचिहौं" का अर्थ है रस में रमना और अपने स्वभाव में रहना, दोनों।
प्रेमवाटिका के दोहे अर्थ सहित
प्रेमवाटिका रसखान की दूसरी रचना है, जिसमें प्रेम पर दोहे हैं। यहाँ कृष्ण-लीला नहीं, प्रेम का दर्शन है। ये पाँच दोहे प्रेमवाटिका के सबसे उद्धृत दोहों में हैं।
11.
प्रेम अगिनि तन जरत है, धुआँ न प्रकटत सोइ।
रसखानि जिन तन जरै, ताहि लखै जग कोइ॥
शब्दार्थ: अगिनि - अग्नि | जरत - जलना | लखै - देखना
भावार्थ: प्रेम की आग शरीर को जलाती रहती है, पर उसका धुआँ बाहर नहीं निकलता। रसखान कहते हैं कि जिसका शरीर इसमें जलता है, उसे दुनिया में कोई पहचान नहीं पाता। प्रेम की पीड़ा भीतर ही रहती है, दिखती नहीं।
12.
प्रेम हरी कौ रूप है, त्यौं हरि प्रेम सरूप।
एक होइ द्वै यौं लसैं, ज्यौं सूरज अरु धूप॥
शब्दार्थ: हरी - ईश्वर, कृष्ण | सरूप - स्वरूप | लसैं - शोभित होना
भावार्थ: प्रेम ही ईश्वर का रूप है और ईश्वर ही प्रेम का स्वरूप। दोनों एक होकर भी दो दिखते हैं, जैसे सूरज और धूप। रसखान की पूरी भक्ति-दृष्टि इसी एक दोहे में है - प्रेम और ईश्वर अलग नहीं हैं।
13.
पहले परिचय प्रीति को, पुनि होइ अभिलाष।
रसखानि पाछे प्रेम है, तब जिय होइ हुलास॥
शब्दार्थ: पुनि - फिर | अभिलाष - इच्छा | जिय - मन | हुलास - उल्लास
भावार्थ: पहले परिचय होता है, फिर इच्छा जागती है, उसके बाद प्रेम आता है और तब मन में उल्लास भरता है। रसखान प्रेम को चरणों में बाँटकर दिखाते हैं, जो प्रेमवाटिका की ख़ासियत है।
14.
प्रेम प्रेम सब कोइ कहै, प्रेम न जानै कोइ।
जो जन जानै प्रेम कौ, रसखानि सोइ सुजान होइ॥
शब्दार्थ: जन - व्यक्ति | सुजान - समझदार
भावार्थ: प्रेम-प्रेम सब कहते हैं, पर प्रेम को जानता कोई नहीं। रसखान कहते हैं कि जो व्यक्ति सचमुच प्रेम को जान ले, वही असली समझदार है। यहाँ "सुजान" शब्द उनकी दूसरी रचना "सुजान रसखान" की ओर भी इशारा करता है।
15.
तन मन धन सब वारि कै, रसखानि करै जो प्रीति।
ताहि मिलै ब्रजराज सो, यह प्रेम की रीति॥
शब्दार्थ: वारि कै - न्योछावर करके | ब्रजराज - कृष्ण | रीति - नियम
भावार्थ: जो तन, मन और धन सब न्योछावर करके प्रेम करता है, उसे ही कृष्ण मिलते हैं। यही प्रेम का नियम है। रसखान भक्ति में शर्त नहीं, समर्पण देखते हैं।
रसखान की रचनाएँ
रसखान की दो प्रमुख रचनाएँ हैं - सुजान रसखान और प्रेमवाटिका। पहली में कृष्ण-प्रेम के सवैये तथा कवित्त हैं और दूसरी में प्रेम विषयक दोहे। दोनों ब्रजभाषा में हैं और आकार में छोटी हैं, पर प्रभाव में बहुत बड़ी।
रसखान की दो काव्य रचनाएँ हैं - सुजान रसखान और प्रेमवाटिका। प्रेमवाटिका में प्रेम विषयक दोहे हैं तथा सुजान रसखान में कृष्ण-प्रेम पर कवित्त और सवैये हैं।
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रचना |
छंद |
विषय |
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सुजान रसखान |
सवैया और कवित्त |
कृष्ण की बाल लीला, रूप, मुरली, होली और ब्रज-प्रेम |
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प्रेमवाटिका |
दोहा |
प्रेम का स्वरूप, प्रेम के चरण और प्रेम-दर्शन |
कुछ विद्वान "दानलीला" को भी रसखान की रचना मानते हैं, पर इस पर मतभेद है। सबसे प्रामाणिक और सर्वस्वीकृत रचनाएँ ये दो ही हैं।
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मुसलमान होकर कृष्ण-भक्त क्यों बने रसखान
रसखान का जीवन हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी मिसाल है कि भक्ति धर्म की सीमा नहीं देखती। एक पठान परिवार में जन्मा कवि आजीवन ब्रज में रहा और कृष्ण पर लिखता रहा। उन्हें वल्लभ संप्रदाय में दीक्षा मिली और उनकी समाधि आज भी महावन में है।
भारतकोश के अनुसार रसखान ने सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) को भी कृष्ण के माध्यम से ही प्रकट किया, जिससे पता चलता है कि वे सामाजिक और आपसी सौहार्द के कितने बड़े समर्थक थे। यही बात उनके काव्य को दूसरे कृष्णभक्त कवियों से अलग बनाती है - उनमें सूफ़ी इश्क़ और वैष्णव भक्ति दोनों की परतें मिलती हैं।
प्रचलित कथा के अनुसार रसखान पहले किसी सांसारिक प्रेम में डूबे थे। एक दिन उन्होंने भागवत का चित्र या कृष्ण की छवि देखी और उनका प्रेम उसी क्षण कृष्ण की ओर मुड़ गया। इसके बाद वे ब्रज चले आए और गोस्वामी विट्ठलनाथ ने उन्हें शिष्य बनाया।
यह कथा प्रामाणिक इतिहास नहीं, परंपरा है। पर इससे एक बात साफ़ है - रसखान का प्रेम पहले से गहरा था, बस उसका पात्र बदल गया। शायद इसीलिए उनके सवैयों में भक्ति इतनी निजी और तड़प भरी लगती है।
रसखान और सूरदास में क्या अंतर है
रसखान और सूरदास दोनों कृष्णभक्त कवि थे, पर उनका ज़ोर अलग था। सूरदास वात्सल्य के कवि हैं और रसखान ब्रज-प्रेम तथा शृंगार के। सूर पद लिखते हैं, रसखान सवैया।
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आधार |
सूरदास |
रसखान |
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प्रमुख छंद |
पद (गेय) |
सवैया और कवित्त |
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प्रमुख रस |
वात्सल्य |
शृंगार और भक्ति |
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केंद्र |
बाल कृष्ण और यशोदा |
ब्रजभूमि और युवा कृष्ण |
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मुख्य ग्रंथ |
सूरसागर |
सुजान रसखान, प्रेमवाटिका |
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गुरु |
वल्लभाचार्य |
विट्ठलनाथ (वल्लभाचार्य के पुत्र) |
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पृष्ठभूमि |
जन्म से वैष्णव |
पठान परिवार, बाद में वल्लभ संप्रदाय |
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अष्टछाप |
हाँ, आठ कवियों में प्रमुख |
नहीं, पर वल्लभ संप्रदाय से जुड़े |
एक भ्रम अक्सर होता है - रसखान अष्टछाप के कवि नहीं थे। अष्टछाप में सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, नंददास, गोविंदस्वामी, छीतस्वामी और चतुर्भुजदास थे। रसखान विट्ठलनाथ के शिष्य ज़रूर थे, पर अष्टछाप में नहीं।
सूरदास के पद भी इसी तरह अर्थ सहित पढ़ने हों तो सूरदास के पद देखिए।
NCERT में रसखान के सवैये किस कक्षा में हैं
रसखान के सवैये NCERT की कक्षा 9 की पुस्तक क्षितिज भाग 1 में हैं और अध्याय का नाम "सवैये" है। इसमें चार सवैये संकलित हैं, जो इसी पेज पर ऊपर दिए गए हैं। कक्षा 8 की वसंत में भी उनकी एक रचना आती है।
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कक्षा |
पुस्तक |
अध्याय |
सामग्री |
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कक्षा 8 |
वसंत भाग 3 |
कवि रसखान की रचनाएँ |
सवैये और दोहे |
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कक्षा 9 |
क्षितिज भाग 1 |
सवैये |
4 सवैये |
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बी.ए. प्रथम सेमेस्टर |
मध्यकालीन काव्य कुंज |
रसखान के पद |
विस्तृत संकलन |
हरियाणा के विश्वविद्यालयों की बी.ए. प्रथम सेमेस्टर की पाठ्यपुस्तक "मध्यकालीन काव्य कुंज" में भी रसखान के पद संकलित हैं। इसी वजह से "रसखान के पद" शब्द से खोज करने वाले ज़्यादातर विश्वविद्यालय के छात्र होते हैं।
परीक्षा में रसखान के सवैये कैसे लिखें
रसखान के सवैयों का उत्तर लिखते समय सबसे ज़रूरी है छंद का सही नाम लिखना। इन्हें "पद" या "दोहा" लिख देना सबसे आम ग़लती है। इनका छंद सवैया है और भाषा ब्रजभाषा।
उत्तर का सही क्रम:
• संदर्भ: सवैया किसका है और किस रचना से लिया गया है। "सुजान रसखान" लिखना न भूलें।
• प्रसंग: सवैये में कौन बोल रहा है - कवि स्वयं या कोई गोपी। चौथे सवैये में गोपी बोल रही है, कवि नहीं।
• व्याख्या: पंक्ति दर पंक्ति सरल हिंदी में अर्थ, उपमाओं को खोलते हुए।
• काव्य सौंदर्य: भाषा (ब्रजभाषा), छंद (सवैया), रस (भक्ति या शृंगार) और अलंकार। "न जैहै न जैहै न जैहै" में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
वे ग़लतियाँ जो नंबर काटती हैं:
• सवैये को पद लिख देना: सबसे बड़ी और सबसे आम ग़लती। NCERT अध्याय का नाम ही "सवैये" है।
• रसखान को अष्टछाप का कवि बता देना: वे विट्ठलनाथ के शिष्य थे, पर अष्टछाप के आठ कवियों में नहीं थे।
• ब्रज शब्दों को शुद्ध हिंदी बना देना: "पाहन" को "पत्थर" और "कालिंदी" को "यमुना" लिख देना मूल पाठ में ग़लत माना जाता है। अर्थ में लिखिए, पाठ में नहीं।
• चौथे सवैये में वक्ता ग़लत बताना: "मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं" में गोपी बोल रही है, रसखान नहीं। यह सीधा प्रश्न बनता है।
• "काग के भाग बड़े" का भाव न समझना: यह ईर्ष्या नहीं, विनम्रता है। कवि ख़ुद को कौए से भी कम भाग्यशाली बता रहा है।
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मुख्य बातें (Key Takeaways)
• रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था, जन्म लगभग 1548 ई. में और निधन लगभग 1628 ई. में हुआ। उनकी समाधि महावन, मथुरा में है।
• वे मुख्य रूप से सवैया और कवित्त के कवि हैं। हिंदवी के संग्रह में उनके 60 सवैये हैं, जबकि पद केवल एक।
• उनकी दो प्रामाणिक रचनाएँ हैं - सुजान रसखान (सवैये और कवित्त) तथा प्रेमवाटिका (प्रेम विषयक दोहे)।
• वे गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य और वल्लभ संप्रदाय के सदस्य थे, पर अष्टछाप के आठ कवियों में शामिल नहीं थे।
• "सेस गनेस महेस दिनेस" उनका सबसे प्रसिद्ध सवैया है, जिसमें तीन पंक्तियों की महिमा एक कटोरी छाछ के आगे झुक जाती है।
• NCERT कक्षा 9 की क्षितिज भाग 1 में उनके चार सवैये हैं और अध्याय का नाम "सवैये" है, "पद" नहीं।
• मुसलमान होते हुए कृष्ण-भक्ति करना उन्हें गंगा-जमुनी तहज़ीब की सबसे बड़ी मिसाल बनाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. रसखान के सबसे प्रसिद्ध सवैये कौन से हैं?
रसखान के सबसे प्रसिद्ध सवैयों में "मानुस हौं तो वही रसखानि", "या लकुटी अरु कामरिया पर", "सेस गनेस महेस दिनेस" और "मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं" शामिल हैं। ये चारों NCERT कक्षा 9 की पुस्तक क्षितिज भाग 1 में भी संकलित हैं।
Q2. क्या रसखान ने पद लिखे थे या सवैये?
रसखान मुख्य रूप से सवैया और कवित्त के कवि थे। हिंदवी के संग्रह में उनके 60 सवैये, 14 दोहे और 3 सोरठे हैं, जबकि पद केवल एक है। इसीलिए NCERT के अध्याय का नाम भी "सवैये" है। लोग खोजते "रसखान के पद" हैं, पर उन्हें असल में सवैये चाहिए होते हैं।
Q3. रसखान का असली नाम क्या था?
रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था। उनकी रचनाओं की अनुपम सरसता के कारण उन्हें "रस की खान" कहा जाने लगा और यही नाम धीरे-धीरे रसखान बन गया। लोग एक सवैया सुनाने के बजाय "एक रसखान सुनाओ" कहने लगे थे।
Q4. रसखान की प्रमुख रचनाएँ कौन सी हैं?
रसखान की दो प्रामाणिक रचनाएँ हैं - सुजान रसखान और प्रेमवाटिका। सुजान रसखान में कृष्ण-प्रेम पर सवैये और कवित्त हैं, जबकि प्रेमवाटिका में प्रेम विषयक दोहे। कुछ विद्वान दानलीला को भी उनकी रचना मानते हैं, पर इस पर मतभेद है।
Q5. रसखान के गुरु कौन थे?
रसखान के गुरु गोस्वामी विट्ठलनाथ थे, जो महाप्रभु वल्लभाचार्य के पुत्र थे। उन्होंने रसखान की कृष्ण-भक्ति देखकर उन्हें अपना शिष्य बनाया और वल्लभ संप्रदाय यानी पुष्टिमार्ग में दीक्षा दी।
Q6. क्या रसखान अष्टछाप के कवि थे?
नहीं, रसखान अष्टछाप के आठ कवियों में शामिल नहीं थे। अष्टछाप में सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, नंददास, गोविंदस्वामी, छीतस्वामी और चतुर्भुजदास थे। रसखान विट्ठलनाथ के शिष्य ज़रूर थे, पर अष्टछाप से अलग।
Q7. "काग के भाग बड़े सजनी" का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि उस कौए का भाग्य बड़ा है जो कृष्ण के हाथ से माखन-रोटी छीन ले गया। रसखान यहाँ ईर्ष्या नहीं, विनम्रता दिखा रहे हैं। कवि कह रहा है कि उसे कृष्ण से जो सामीप्य नहीं मिला, वह एक कौए को मिल गया।
Q8. सवैया और पद में क्या अंतर है?
सवैया चार समान चरणों का वर्णिक छंद है जिसमें हर चरण में 22 से 26 वर्ण होते हैं, और यह लंबी प्रवाहपूर्ण लय में चलता है। पद गाया जाने वाला छंद है जिसमें स्थायी और अंतरा होते हैं, जैसे सूरदास और मीरा के पद।
Q9. रसखान मुसलमान होकर कृष्ण-भक्त कैसे बने?
प्रचलित कथा के अनुसार रसखान पहले किसी सांसारिक प्रेम में थे, फिर कृष्ण की छवि देखकर उनका प्रेम कृष्ण की ओर मुड़ गया। इसके बाद वे ब्रज में बस गए और विट्ठलनाथ के शिष्य बने। उन्होंने सूफ़ी इश्क़ को कृष्ण-भक्ति के माध्यम से व्यक्त किया।
Q10. NCERT में रसखान के सवैये किस कक्षा में हैं?
रसखान के चार सवैये NCERT कक्षा 9 की पुस्तक क्षितिज भाग 1 के "सवैये" अध्याय में हैं। कक्षा 8 की वसंत भाग 3 में भी उनकी रचनाएँ आती हैं, और कई विश्वविद्यालयों की बी.ए. प्रथम सेमेस्टर की पुस्तक में भी उनके पद संकलित हैं।
Q11. क्या रसखान की रचनाएँ कॉपीराइट में हैं?
नहीं, रसखान की रचनाएँ सार्वजनिक डोमेन में हैं क्योंकि वे लगभग चार सौ साल पुरानी हैं। इन्हें कोई भी पढ़, उद्धृत और प्रकाशित कर सकता है। हालाँकि किसी आधुनिक विद्वान की टीका या संपादित संस्करण की भूमिका पर कॉपीराइट लागू हो सकता है।
Q12. क्या मैं भी अपनी कविता ऑनलाइन प्रकाशित कर सकता हूँ?
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निष्कर्ष
रसखान को पढ़ते समय एक बात याद रखिए - वे भक्त कम और प्रेमी ज़्यादा लगते हैं। उन्हें मोक्ष नहीं चाहिए, ब्रज चाहिए। पत्थर बनना मंज़ूर है, बशर्ते वह गोवर्धन हो। यही ज़िद उनके हर सवैये में मिलती है।
इस पेज पर दी गई 15 रचनाएँ शुरुआत के लिए काफ़ी हैं। आगे बढ़ना हो तो सुजान रसखान और प्रेमवाटिका पूरी पढ़िए। और छंद का नाम याद रखिए - ये सवैये हैं, पद नहीं। यही एक बात परीक्षा में आपके नंबर बचा लेगी।
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रसखान ने न अपनी पृष्ठभूमि देखी, न लोगों की राय। उन्होंने वही लिखा जो उनके मन में था, और चार सौ साल बाद भी वही पढ़ा जा रहा है।
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