रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताएँ (Rabindranath Thakur Poetry )
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताएँ: 18 प्रसिद्ध रचनाएँ हिंदी भावानुवाद के साथ
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताएँ मूल रूप से बांग्ला में लिखी गई थीं, हिंदी में नहीं। उन्हें 1913 में गीतांजलि के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला और वे यह सम्मान पाने वाले पहले एशियाई बने। इस पेज पर उनकी 18 प्रसिद्ध कविताएँ हिंदी भावानुवाद और अर्थ के साथ दी गई हैं।
ठाकुर हिंदी साहित्य के दूसरे कवियों से एक बात में अलग हैं - वे इकलौते कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों के राष्ट्रगान बनीं। भारत का "जन गण मन" और बांग्लादेश का "आमार सोनार बांग्ला", दोनों उन्हीं के लिखे हुए हैं।
📌 अनुवाद को लेकर एक ज़रूरी स्पष्टीकरण
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बांग्ला में लिखा था। उन्होंने अपनी कुछ रचनाओं का अंग्रेज़ी अनुवाद ख़ुद किया, जिनमें गीतांजलि (Song Offerings) सबसे प्रसिद्ध है। हिंदी में जो अनुवाद मिलते हैं, वे बाद के अलग-अलग अनुवादकों के किए हुए हैं।
यहाँ दिए गए सभी हिंदी भावानुवाद ख़ुद की कलम द्वारा नए सिरे से किए गए हैं, ठाकुर के अपने अंग्रेज़ी अनुवादों और मूल बांग्ला पाठ के आधार पर। इसका कारण साफ़ है - ठाकुर की मूल रचनाएँ सार्वजनिक डोमेन में हैं, पर किसी आधुनिक अनुवादक का हिंदी अनुवाद उस अनुवादक की अपनी कृति होती है और उस पर अलग कॉपीराइट लागू होता है।
भावानुवाद का अर्थ है शब्दशः अनुवाद नहीं, बल्कि भाव को हिंदी में उतारना। कविता में यही सही तरीक़ा है, क्योंकि लय और बिंब शब्दशः नहीं उतरते।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का संक्षिप्त परिचय
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ और निधन 7 अगस्त 1941 को हुआ। उन्हें गुरुदेव कहा जाता है। 1913 में गीतांजलि के लिए उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला, और वे यह पाने वाले पहले एशियाई व्यक्ति थे।
वे विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार और दार्शनिक थे तथा भारतीय साहित्य के एकमात्र नोबेल पुरस्कार विजेता हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का जन गण मन और बांग्लादेश का आमार सोनार बांग्ला। उनका जन्म देवेन्द्रनाथ टैगोर और शारदा देवी की संतान के रूप में हुआ और स्कूल की पढ़ाई सेंट जेवियर स्कूल में हुई।
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विवरण |
जानकारी |
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पूरा नाम |
रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) |
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उपनाम |
गुरुदेव, कविगुरु, विश्वकवि |
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जन्म |
7 मई 1861, जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी, कोलकाता |
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निधन |
7 अगस्त 1941, कोलकाता |
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पिता |
देवेन्द्रनाथ ठाकुर |
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माता |
शारदा देवी |
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मूल भाषा |
बांग्ला |
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नोबेल पुरस्कार |
1913, साहित्य (गीतांजलि के लिए) |
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प्रमुख रचनाएँ |
गीतांजलि, गीतिमाल्य, बलाका, गोरा, काबुलीवाला |
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स्थापना |
शांतिनिकेतन, विश्व-भारती विश्वविद्यालय |
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विशेष |
दो देशों के राष्ट्रगान के रचयिता |
ठाकुर सिर्फ़ कवि नहीं थे। उन्होंने उपन्यास, कहानियाँ, नाटक, निबंध और लगभग दो हज़ार गीत लिखे, जिन्हें रवींद्र संगीत कहा जाता है। साठ साल की उम्र के बाद उन्होंने चित्रकला भी शुरू की और हज़ारों चित्र बनाए।
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गीतांजलि की प्रसिद्ध कविताएँ
गीतांजलि ठाकुर का सबसे प्रसिद्ध काव्य-संग्रह है, जिसका अर्थ है "गीतों की अंजलि"। इसी के अंग्रेज़ी अनुवाद पर उन्हें 1913 का नोबेल पुरस्कार मिला। इन कविताओं में ईश्वर से सीधी बातचीत है, प्रार्थना कम और संवाद ज़्यादा।
1. जहाँ चित्त भय से मुक्त हो (गीतांजलि 35)
जहाँ मन भय से मुक्त हो और सिर ऊँचा उठा रहे,
जहाँ ज्ञान मुक्त हो,
जहाँ दुनिया संकरी दीवारों में बँटकर टुकड़े न हो गई हो,
जहाँ शब्द सच्चाई की गहराई से निकलते हों,
जहाँ अथक प्रयास पूर्णता की ओर बाँहें फैलाए हो,
जहाँ तर्क की स्वच्छ धारा रूढ़ि के सूखे रेगिस्तान में खोई न हो,
जहाँ मन तुम्हारे हाथों बढ़ता हुआ
विचार और कर्म के विस्तार में जाता हो -
उसी स्वतंत्रता के स्वर्ग में, हे पिता,
मेरे देश को जगने दो।
(भावानुवाद: ख़ुद की कलम | मूल बांग्ला: "চিত্ত যেথা ভয়শূন্য" - चित्त जेथा भयशून्य)
अर्थ: यह गीतांजलि की सबसे प्रसिद्ध कविता है और स्वतंत्रता की सबसे सुंदर परिभाषाओं में गिनी जाती है। ठाकुर यहाँ राजनीतिक आज़ादी से आगे की बात कर रहे हैं - ऐसी आज़ादी जिसमें डर न हो, जाति-धर्म की दीवारें न हों और सोच रूढ़ियों में न अटके।
"संकरी घरेलू दीवारों" वाली पंक्ति सबसे महत्वपूर्ण है। यह जाति, संप्रदाय और संकीर्ण पहचानों की ओर इशारा है। यह कविता भारत की स्वतंत्रता से पहले लिखी गई थी, पर आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
2. जीवन के इस छोटे से पात्र को (गीतांजलि 1)
तुमने मुझे अनंत बनाया है, यही तुम्हारा आनंद है।
इस नाज़ुक पात्र को तुम बार-बार ख़ाली करते हो
और फिर नए जीवन से भर देते हो।
इस छोटी सी बाँसुरी को तुम पहाड़ों और घाटियों में ले गए,
और इसमें से सदा नई धुनें फूँकीं।
तुम्हारे हाथों के अमर स्पर्श से
मेरा छोटा सा हृदय आनंद में अपनी सीमा भूल जाता है
और जन्म लेता है वह गीत, जो कहा नहीं जा सकता।
(भावानुवाद: ख़ुद की कलम | गीतांजलि की पहली कविता)
अर्थ: मनुष्य एक बाँसुरी है और गीत ईश्वर का है। ठाकुर यहाँ जीवन को खालीपन और भराव के चक्र की तरह देखते हैं। हर बार ख़ाली होना अंत नहीं, नई शुरुआत है।
3. मुझे ख़तरों से बचाने की प्रार्थना नहीं
मुझे ख़तरों से बचाने की प्रार्थना करने दो - यह मेरी माँग नहीं,
बस इतना कि मैं ख़तरों का सामना करने से न डरूँ।
मेरी पीड़ा शांत हो जाए, यह न माँगूँ,
बस इतना कि मेरा हृदय उसे जीत सके।
जीवन के युद्ध में मुझे साथी न मिलें तो शिकायत न हो,
बस अपनी ताक़त पर भरोसा बना रहे।
मुझे डर में मुक्ति की भीख न मिले,
बस अपनी सफलता में तुम्हारा हाथ महसूस करने का धैर्य मिले।
(भावानुवाद: ख़ुद की कलम | मूल: "Fruit-Gathering")
अर्थ: यह ठाकुर की सबसे उद्धृत प्रार्थनाओं में है और इसका ढाँचा उलटा है। वे सुरक्षा नहीं माँगते, साहस माँगते हैं। दुख दूर करने की नहीं, दुख झेलने की शक्ति माँगते हैं। प्रार्थना की यह परिभाषा भक्ति साहित्य से बिलकुल अलग है।
4. जब तुम मुझे गाने का आदेश देते हो
जब तुम मुझे गाने को कहते हो,
लगता है मेरा हृदय गर्व से फट जाएगा।
मैं तुम्हारे मुख की ओर देखता हूँ
और आँखों में आँसू आ जाते हैं।
मेरे जीवन का सब कुछ कठोर और बेसुरा
एक मधुर स्वर में घुल जाता है,
और मेरी वंदना समुद्र पार करते
ख़ुशी से उड़ते पंछी की तरह फैल जाती है।
(भावानुवाद: ख़ुद की कलम | गीतांजलि 2)
अर्थ: गाना यहाँ आदेश है, चुनाव नहीं। ठाकुर मानते हैं कि कला ऊपर से मिली ज़िम्मेदारी है। "कठोर और बेसुरा" चीज़ों का "मधुर स्वर" में घुल जाना उनके पूरे काव्य का सार है।
5. मैंने सोचा था यात्रा ख़त्म हो चुकी
मैंने सोचा था कि मेरी यात्रा पूरी हो चुकी है,
रास्ते की आख़िरी सीमा तक पहुँच गया हूँ -
कि आगे रास्ता बंद है, भोजन ख़त्म है,
और अब मौन के एकांत में जाने का समय है।
पर मैंने पाया कि तुम्हारी इच्छा का मुझमें कोई अंत नहीं।
जब पुराने शब्द ज़ुबान पर मर जाते हैं,
तब हृदय से नई धुनें फूट पड़ती हैं,
और जहाँ पुराने रास्ते मिट जाते हैं,
वहाँ नई ज़मीन अपने चमत्कारों के साथ खुल जाती है।
(भावानुवाद: ख़ुद की कलम | गीतांजलि 37)
अर्थ: यह अंत और शुरुआत पर लिखी गई कविता है। जहाँ लगता है सब ख़त्म हो गया, वहीं कुछ नया खुलता है। निराशा के समय पढ़ी जाने वाली उनकी सबसे लोकप्रिय कविता यही है।
देश, स्वतंत्रता और आत्मबल की कविताएँ
इन रचनाओं में ठाकुर का सामाजिक और राष्ट्रीय पक्ष सामने आता है। यहाँ भक्ति की जगह आत्मबल और स्वाभिमान है। इन्हीं में से एक भारत का राष्ट्रगान बनी।
6. एकला चलो रे
अगर तेरी पुकार सुनकर कोई न आए,
तो अकेला चल रे, अकेला चल।
अकेला चल, अकेला चल, अकेला चल रे।
अगर सब मुँह मोड़ लें, सब डर जाएँ,
तो तू खुले मन से बोल,
अपने मन की बात अकेले बोल रे।
अगर सब लौट जाएँ, कोई साथ न चले,
काँटों भरे रास्ते पर,
तो तू लहू से लथपथ पैरों से अकेला चल रे।
अगर कोई दीया न जलाए, अँधेरी रात में,
तूफ़ान में सब दरवाज़े बंद हों,
तो तू अपनी पसली की हड्डी जलाकर
ख़ुद दीया बन जा, अकेला जल रे।
(भावानुवाद: ख़ुद की कलम | मूल बांग्ला: "যদি তোর ডাক শুনে কেউ না আসे" - जोदि तोर डाक शुने केउ ना आशे)
अर्थ: यह ठाकुर की सबसे प्रसिद्ध और सबसे प्रेरक रचना है, जो 1905 में बंग-भंग आंदोलन के दौरान लिखी गई थी। अंतिम अंतरा सबसे शक्तिशाली है - अगर कोई दीया नहीं जलाता, तो अपनी हड्डी जलाकर ख़ुद दीया बन जाओ।
महात्मा गांधी को यह गीत बहुत प्रिय था और इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रभावशाली गीतों में गिना जाता है।
7. जन गण मन (भारत का राष्ट्रगान)
जन गण मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता।
पंजाब सिंधु गुजरात मराठा, द्राविड़ उत्कल बंग।
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा, उच्छल जलधि तरंग।
तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशिष माँगे।
गाहे तव जय गाथा।
जन गण मंगलदायक जय हे, भारत भाग्य विधाता।
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे॥
अर्थ: यह मूल रूप से बांग्ला में लिखे पाँच अंतरों वाले गीत "भारतो भाग्यो बिधाता" का पहला अंतरा है। इसे पहली बार 27 दिसंबर 1911 को कोलकाता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे भारत का राष्ट्रगान स्वीकार किया।
गाने का निर्धारित समय 52 सेकंड है। इसमें भारत के भूगोल का पूरा चित्र है - पंजाब से बंगाल तक और हिमालय से समुद्र तक।
8. जहाँ मैं खड़ा हूँ, वहीं से
मैं तुमसे मुक्ति नहीं माँगता,
इस संसार से भागने की चाह नहीं।
हज़ारों आनंद के बंधनों में
मैं तुम्हारी स्वतंत्रता को महसूस करूँ।
तुम मेरे इस मिट्टी के दीये में
नई-नई ज्योति भरते जाओ,
मैं हर रोज़ इसी संसार में
तुम्हारा स्पर्श पाता रहूँ।
(भावानुवाद: ख़ुद की कलम | गीतांजलि से)
अर्थ: ठाकुर संन्यास के विरोधी थे। वे संसार छोड़कर नहीं, संसार में रहकर ईश्वर पाना चाहते थे। यही उनकी भक्ति को मध्यकालीन भक्ति कवियों से अलग करता है।
अगर आप भी लिखते हैं तो अपनी रचना ख़ुद की कलम के कविता प्लेटफ़ॉर्म पर मुफ़्त प्रकाशित कर सकते हैं।
प्रेम और प्रकृति की कविताएँ
इन कविताओं में ठाकुर का कोमल पक्ष दिखता है। यहाँ प्रेम माँग नहीं, उपस्थिति है और प्रकृति सजावट नहीं, साथी। ये रचनाएँ "द गार्डनर" और "क्रिसेंट मून" से हैं।
9. तुम्हारी आँखें पूछती हैं
तुम्हारी आँखें उदास होकर पूछती हैं,
मेरे मन की बात जानना चाहती हैं -
जैसे चाँद समुद्र की गहराई नापना चाहे।
मैंने अपना जीवन तुम्हारे सामने खोलकर रख दिया है,
कुछ भी छिपाया नहीं, कुछ भी रोका नहीं।
इसीलिए शायद तुम मुझे जान नहीं पातीं।
अगर यह सिर्फ़ एक रत्न होता,
तो मैं इसे सौ टुकड़ों में तोड़कर
एक माला बनाकर तुम्हारे गले में डाल देता।
अगर यह सिर्फ़ एक फूल होता,
गोल, छोटा और मीठा,
तो मैं इसे तोड़कर तुम्हारे बालों में लगा देता।
पर यह एक हृदय है, प्रिय।
इसका न कोई किनारा है, न कोई तल।
(भावानुवाद: ख़ुद की कलम | मूल: "The Gardener" 28)
अर्थ: प्रेम में सबसे बड़ी विडंबना यही है कि पूरी तरह खुल जाने पर भी समझा नहीं जाता। रत्न और फूल की तुलना बताती है कि हृदय को दिया नहीं जा सकता, सिर्फ़ बाँटा जा सकता है।
10. काग़ज़ की नाव
मैं रोज़ एक-एक करके
अपनी काग़ज़ की नावें बहती धारा में छोड़ता हूँ।
बड़े काले अक्षरों में उन पर
अपना नाम और अपने गाँव का नाम लिखता हूँ।
मुझे उम्मीद है कि किसी अनजान देश में कोई
इन्हें पाएगा और जान जाएगा कि मैं कौन हूँ।
मैं अपनी छोटी नावों में
बगीचे के शिउली के फूल भर देता हूँ,
इस उम्मीद में कि भोर के ये फूल
रात में सुरक्षित किनारे तक पहुँच जाएँगे।
(भावानुवाद: ख़ुद की कलम | मूल: "The Crescent Moon")
अर्थ: यह बच्चों पर लिखी उनकी सबसे सुंदर कविता है। बच्चा नाव नहीं बहा रहा, वह ख़ुद को दुनिया तक पहुँचाना चाहता है। यही मासूम इच्छा हर लेखक की भी है।
11. आषाढ़ की पहली बारिश
आषाढ़ का पहला दिन आया,
आकाश में बादल घिर आए।
नदी पार से आती हवा में
भीगी मिट्टी की गंध है।
आज कोई काम मन नहीं लगता,
आज मन कहीं दूर जाना चाहता है -
उस पार, जहाँ बादल झुके हुए हैं।
(भावानुवाद: ख़ुद की कलम | ठाकुर के वर्षा-गीतों के आधार पर)
अर्थ: ठाकुर ने वर्षा ऋतु पर सबसे ज़्यादा गीत लिखे। बंगाल में आषाढ़ का महीना उनके रवींद्र संगीत का सबसे प्रिय विषय है। बारिश उनके यहाँ मौसम नहीं, मन की अवस्था है।
12. दीप जलाओ
जब सूरज डूब जाए और रास्ता न दिखे,
तब अपना दीया जला लो।
हवा तेज़ है, अँधेरा गहरा है,
पर लौ छोटी हो तो क्या हुआ,
वह तुम्हारी अपनी है।
दूसरों के उजाले में चलने वाला
मंज़िल तक पहुँच सकता है,
पर रास्ता नहीं जान पाता।
(भावानुवाद: ख़ुद की कलम | ठाकुर के गीतों के भाव पर आधारित)
अर्थ: अपना दीया जलाने का यह भाव "एकला चलो रे" से जुड़ा है। ठाकुर बार-बार यही कहते हैं कि उधार का उजाला काफ़ी नहीं होता।
छोटी कविताएँ और सूक्तियाँ (स्ट्रे बर्ड्स से)
"स्ट्रे बर्ड्स" में ठाकुर की तीन सौ से ज़्यादा छोटी रचनाएँ हैं, जो एक-दो पंक्तियों में पूरी बात कह देती हैं। ये जापानी हाइकु से प्रभावित मानी जाती हैं। नीचे छह सबसे प्रसिद्ध सूक्तियाँ हैं।
13.
अगर तुम सूरज के डूब जाने पर रोओगे,
तो आँसू तुम्हें तारे भी नहीं देखने देंगे।
अर्थ: जो चला गया उस पर अटके रहने से जो मौजूद है वह भी छूट जाता है। यह ठाकुर की सबसे उद्धृत पंक्ति है।
14.
पानी में पत्थर फेंकने पर लहरें उठती हैं,
पर पत्थर नीचे बैठ जाता है।
दुनिया शोर याद रखती है, गहराई नहीं।
अर्थ: दिखावे और वास्तविक असर के बीच का फ़र्क़। शोर मचाने वाला दिखता है, काम करने वाला नहीं।
15.
हम दुनिया को तब सही समझते हैं
जब हम उसे प्यार करते हैं।
अर्थ: ठाकुर के लिए ज्ञान का रास्ता प्रेम से होकर जाता है, तर्क से नहीं। उनकी पूरी शिक्षा-दृष्टि इसी पर टिकी थी।
16.
छोटा फूल अपनी सुंदरता के लिए
बड़े बग़ीचे की माँग नहीं करता।
अर्थ: सादगी पर लिखी उनकी सबसे संतुलित पंक्ति। बड़ा मंच न मिले तो भी अपना काम कम नहीं होता।
17.
जड़ें शाखा नहीं माँगतीं
कि उनका इनाम क्या मिला।
अर्थ: नीचे रहकर काम करने वाले हिसाब नहीं माँगते। माँ-बाप, शिक्षक और मददगार लोगों के लिए यह पंक्ति अक्सर उद्धृत होती है।
18.
चिड़िया को बादल होने की इच्छा नहीं,
बादल को चिड़िया होने की नहीं।
दोनों आकाश में हैं, यही काफ़ी है।
अर्थ: दूसरे जैसा बनने की होड़ पर सीधी टिप्पणी। अपनी जगह पर रहते हुए भी पूर्णता मिल सकती है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रमुख रचनाएँ
ठाकुर ने कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध और गीत - सब लिखे। उनकी रचनाओं की संख्या इतनी है कि सिर्फ़ गीतों की गिनती लगभग दो हज़ार है। नीचे उनकी सबसे महत्वपूर्ण रचनाएँ दी गई हैं।
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विधा |
रचनाएँ |
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काव्य संग्रह |
गीतांजलि, गीतिमाल्य, गीतालि, बलाका, पूरबी, सोनार तरी, मानसी |
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अंग्रेज़ी अनुवाद (स्वयं किए) |
Song Offerings, The Gardener, The Crescent Moon, Stray Birds, Fruit-Gathering |
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उपन्यास |
गोरा, घरे बाइरे, चोखेर बालि (आँख की किरकिरी), नौका डूबी, शेषेर कबिता |
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कहानियाँ |
काबुलीवाला, पोस्टमास्टर, क्षुधित पाषाण, अतिथि |
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नाटक |
डाकघर, राजा, अचलायतन, विसर्जन, चित्रांगदा |
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निबंध |
साधना, नेशनलिज़्म, द रिलीजन ऑफ़ मैन |
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गीत |
रवींद्र संगीत - लगभग 2,230 गीत |
उन्होंने अपने जीवनकाल में कई उपन्यास, निबंध, लघु कथाएँ, यात्रावृत्तांत, नाटक और हज़ारों गाने लिखे। उनकी गद्य में लिखी छोटी कहानियों को सबसे अधिक लोकप्रिय माना जाता है और उन्हें बांग्ला भाषा में इस विधा की उत्पत्ति का श्रेय दिया जाता है।
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गीतांजलि और नोबेल पुरस्कार की कहानी
ठाकुर को 1913 में गीतांजलि के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला और वे यह सम्मान पाने वाले पहले एशियाई बने। दिलचस्प बात यह है कि पुरस्कार मूल बांग्ला गीतांजलि पर नहीं, बल्कि उसके अंग्रेज़ी अनुवाद "Song Offerings" पर मिला था, जो ठाकुर ने ख़ुद किया था।
मूल बांग्ला गीतांजलि 1910 में प्रकाशित हुई थी और उसमें 157 कविताएँ थीं। अंग्रेज़ी संस्करण 1912 में लंदन से छपा, जिसमें 103 कविताएँ थीं। इनमें से सभी मूल गीतांजलि से नहीं थीं - कुछ गीतिमाल्य, नैवेद्य और खेया जैसे दूसरे संग्रहों से ली गई थीं।
इस अंग्रेज़ी संस्करण की भूमिका आयरिश कवि डब्ल्यू. बी. येट्स ने लिखी थी, जिसने इसे पश्चिम में लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
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तथ्य |
विवरण |
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मूल बांग्ला गीतांजलि |
1910, 157 कविताएँ |
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अंग्रेज़ी Song Offerings |
1912, 103 कविताएँ |
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अनुवादक |
स्वयं रवीन्द्रनाथ ठाकुर |
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भूमिका लेखक |
डब्ल्यू. बी. येट्स |
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नोबेल पुरस्कार |
1913, साहित्य |
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विशेष |
साहित्य का नोबेल पाने वाले पहले एशियाई |
नाइटहुड की उपाधि क्यों लौटाई थी
ठाकुर को 1915 में ब्रिटिश सरकार ने नाइटहुड की उपाधि दी थी, जिससे वे "सर" कहलाने लगे। 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग हत्याकांड हुआ, जिसके विरोध में उन्होंने 1919 में यह उपाधि लौटा दी।
उन्होंने वायसराय लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड को पत्र लिखकर कहा था कि अब उपाधि का बोझ उन्हें शर्मिंदा करता है और वे अपने उन देशवासियों के साथ खड़े होना चाहते हैं जिन्हें अपमान सहना पड़ा।
यह घटना उनके जीवन का सबसे बड़ा राजनीतिक क़दम मानी जाती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि वे किसी राजनीतिक दल में नहीं थे और गांधीजी से उनके कई मुद्दों पर मतभेद भी थे, फिर भी उन्होंने यह क़दम उठाया।
दो देशों के राष्ट्रगान लिखने वाले इकलौते कवि
रवीन्द्रनाथ ठाकुर दुनिया के इकलौते कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो अलग देशों के राष्ट्रगान हैं। भारत का "जन गण मन" और बांग्लादेश का "आमार सोनार बांग्ला", दोनों उन्हीं की लिखी हुई हैं। श्रीलंका का राष्ट्रगान भी उनसे प्रभावित माना जाता है।
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देश |
राष्ट्रगान |
अपनाया गया |
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भारत |
जन गण मन |
24 जनवरी 1950 |
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बांग्लादेश |
आमार सोनार बांग्ला |
1971 |
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श्रीलंका |
श्री लंका मातनी - प्रभाव माना जाता है |
1951 |
वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का जन गण मन और बांग्लादेश का आमार सोनार बांग्ला।
श्रीलंका के मामले में मान्यता है कि उनके शिष्य आनंद समरकून ने शांतिनिकेतन में पढ़ाई के दौरान ठाकुर से प्रेरणा लेकर वह गीत लिखा। कुछ मत यह भी कहते हैं कि मूल धुन ठाकुर की ही थी, पर इस पर विद्वानों में मतभेद है।
ठाकुर की रचनाओं की कॉपीराइट स्थिति
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मूल रचनाएँ अब सार्वजनिक डोमेन में हैं। उन्होंने 1907 में अपनी रचनाओं का कॉपीराइट विश्व-भारती को दे दिया था। वह अवधि दिसंबर 2001 में समाप्त हो गई, जिसके बाद कोई भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित कर सकता है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपनी बौद्धिक संपदा का कॉपीराइट विश्व-भारती को दिया था। कॉपीराइट की विस्तारित अवधि दिसंबर 2001 में समाप्त हो गई और तब से निजी प्रकाशक उनकी रचनाएँ स्वतंत्र रूप से प्रकाशित कर सकते हैं। बर्न कन्वेंशन के अनुसार यह कॉपीराइट 1991 में समाप्त होना था, पर इसे दस साल के लिए और बढ़ा दिया गया था।
पर एक ज़रूरी बात याद रखिए: कॉपीराइट सिर्फ़ ठाकुर की मूल रचनाओं पर से हटा है। किसी आधुनिक अनुवादक का किया हुआ हिंदी या अंग्रेज़ी अनुवाद उस अनुवादक की अपनी कृति होती है और उस पर अलग कॉपीराइट लागू होता है।
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सामग्री |
स्थिति |
|
मूल बांग्ला रचनाएँ |
सार्वजनिक डोमेन (दिसंबर 2001 से) |
|
ठाकुर के अपने अंग्रेज़ी अनुवाद |
सार्वजनिक डोमेन |
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किसी आधुनिक अनुवादक का हिंदी अनुवाद |
अनुवादक का कॉपीराइट, अलग से लागू |
|
आधुनिक विद्वान की टीका या भूमिका |
कॉपीराइट लागू |
इसीलिए इस पेज के सभी हिंदी भावानुवाद ख़ुद की कलम द्वारा नए सिरे से किए गए हैं। अगर आप कहीं और से हिंदी अनुवाद उठाकर प्रकाशित करते हैं, तो अनुवादक की अनुमति लेना ज़रूरी है।
ठाकुर की कविताएँ भक्ति काव्य से कैसे अलग हैं
ठाकुर की कविताओं में ईश्वर आते हैं, पर वे मध्यकालीन भक्त कवियों जैसे नहीं हैं। कबीर और तुलसीदास ईश्वर के सामने समर्पण करते हैं, जबकि ठाकुर उससे बराबरी से बात करते हैं। उनका ईश्वर मंदिर में नहीं, काम करते मज़दूर और खेत की धूल में है।
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आधार |
मध्यकालीन भक्ति काव्य |
रवीन्द्रनाथ ठाकुर |
|
काल |
भक्तिकाल, 15वीं-17वीं सदी |
आधुनिक काल, 19वीं-20वीं सदी |
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भाषा |
ब्रजभाषा, अवधी |
बांग्ला |
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ईश्वर से संबंध |
दास्य, समर्पण |
संवाद, बराबरी |
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संन्यास पर विचार |
संसार त्याग की ओर झुकाव |
संसार में रहकर ही ईश्वर की खोज |
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छंद |
दोहा, चौपाई, पद |
गद्य-कविता और गीत, मुक्त लय |
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दायरा |
भक्ति और नीति |
भक्ति, राष्ट्र, प्रेम, प्रकृति, शिक्षा |
एक और बड़ा अंतर है - ठाकुर ने कोई छाप या भणिता इस्तेमाल नहीं की। कबीर, रहीम और सूरदास अपने नाम को कविता में गूँथते हैं, ठाकुर नहीं।
भक्ति काव्य से तुलना करनी हो तो कबीर के दोहे या सूरदास के पद पढ़िए।
परीक्षा में ठाकुर की कविताओं पर क्या पूछा जाता है
ठाकुर पर सबसे ज़्यादा तथ्यात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं - जन्म-मृत्यु, नोबेल वर्ष, रचनाएँ और राष्ट्रगान। कविता की व्याख्या से ज़्यादा अंक इन्हीं तथ्यों में मिलते हैं, इसलिए तारीख़ें ठीक से याद रखिए।
सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले तथ्य:
• जन्म और निधन: 7 मई 1861 और 7 अगस्त 1941, दोनों कोलकाता में।
• नोबेल पुरस्कार: 1913, गीतांजलि के अंग्रेज़ी अनुवाद Song Offerings के लिए। पहले एशियाई विजेता।
• नाइटहुड: 1915 में मिली, 1919 में जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में लौटाई।
• शांतिनिकेतन: 1901 में स्कूल की शुरुआत, 1921 में विश्व-भारती विश्वविद्यालय बना।
• दो राष्ट्रगान: जन गण मन (भारत) और आमार सोनार बांग्ला (बांग्लादेश)।
वे ग़लतियाँ जो नंबर काटती हैं:
• गीतांजलि को हिंदी रचना बता देना: यह मूल रूप से बांग्ला में है। हिंदी में जो मिलती है वह अनुवाद है।
• नोबेल का वर्ष 1912 लिख देना: अंग्रेज़ी संस्करण 1912 में छपा, पर नोबेल 1913 में मिला।
• ठाकुर को भक्तिकाल का कवि बता देना: वे आधुनिक काल के कवि हैं, भक्तिकाल के नहीं।
• "एकला चलो रे" को गांधीजी की रचना समझ लेना: यह ठाकुर की रचना है, गांधीजी को यह प्रिय थी।
• जन गण मन को पूरा गीत मान लेना: राष्ट्रगान मूल पाँच अंतरों वाले गीत का सिर्फ़ पहला अंतरा है।
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मुख्य बातें (Key Takeaways)
• रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको में हुआ और निधन 7 अगस्त 1941 को हुआ।
• उन्हें 1913 में गीतांजलि के अंग्रेज़ी अनुवाद Song Offerings के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला और वे यह पाने वाले पहले एशियाई थे।
• उनकी मूल भाषा बांग्ला थी। हिंदी में उपलब्ध सभी कविताएँ अनुवाद हैं, उनकी अपनी हिंदी रचनाएँ नहीं।
• वे इकलौते कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों के राष्ट्रगान बनीं - भारत का जन गण मन और बांग्लादेश का आमार सोनार बांग्ला।
• 1915 में मिली नाइटहुड की उपाधि उन्होंने 1919 में जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में लौटा दी थी।
• उनकी मूल रचनाओं का कॉपीराइट दिसंबर 2001 में समाप्त हो गया, पर किसी आधुनिक अनुवादक के अनुवाद पर अलग कॉपीराइट लागू रहता है।
• उन्होंने लगभग 2,230 गीत लिखे, जिन्हें रवींद्र संगीत कहा जाता है, और साठ की उम्र के बाद चित्रकला भी शुरू की।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सबसे प्रसिद्ध कविताएँ कौन सी हैं?
उनकी सबसे प्रसिद्ध कविताओं में "जहाँ चित्त भय से मुक्त हो" (गीतांजलि 35), "एकला चलो रे", "जन गण मन" और "मुझे ख़तरों से बचाने की प्रार्थना नहीं" शामिल हैं। इनमें पहली स्वतंत्रता की परिभाषा है, दूसरी आत्मबल का गीत और तीसरी भारत का राष्ट्रगान।
Q2. क्या रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हिंदी में लिखा था?
नहीं, उन्होंने मूल रूप से बांग्ला में लिखा था। उन्होंने अपनी कुछ रचनाओं का अंग्रेज़ी अनुवाद स्वयं किया, जिनमें गीतांजलि सबसे प्रसिद्ध है। हिंदी में जो कविताएँ मिलती हैं, वे बाद के अलग-अलग अनुवादकों की की हुई हैं।
Q3. ठाकुर को नोबेल पुरस्कार कब और किस रचना पर मिला?
उन्हें 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। यह गीतांजलि के अंग्रेज़ी अनुवाद Song Offerings पर मिला, जो 1912 में लंदन से प्रकाशित हुआ था और जिसका अनुवाद उन्होंने स्वयं किया था। वे यह सम्मान पाने वाले पहले एशियाई थे।
Q4. गीतांजलि में कुल कितनी कविताएँ हैं?
मूल बांग्ला गीतांजलि 1910 में प्रकाशित हुई और उसमें 157 कविताएँ थीं। अंग्रेज़ी संस्करण Song Offerings 1912 में छपा, जिसमें 103 कविताएँ थीं। अंग्रेज़ी संस्करण की सभी कविताएँ मूल गीतांजलि से नहीं थीं, कुछ गीतिमाल्य और नैवेद्य जैसे दूसरे संग्रहों से ली गई थीं।
Q5. "एकला चलो रे" किसने लिखा था?
"एकला चलो रे" रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने 1905 में बंग-भंग आंदोलन के दौरान बांग्ला में लिखा था। मूल पंक्ति है "जोदि तोर डाक शुने केउ ना आशे"। महात्मा गांधी को यह गीत बहुत प्रिय था, पर रचना ठाकुर की है।
Q6. ठाकुर ने नाइटहुड की उपाधि क्यों लौटाई थी?
उन्हें 1915 में ब्रिटिश सरकार ने नाइटहुड दी थी। 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने 1919 में यह उपाधि लौटा दी। उन्होंने वायसराय को पत्र लिखकर कहा कि वे अपमानित देशवासियों के साथ खड़े होना चाहते हैं।
Q7. जन गण मन को राष्ट्रगान कब स्वीकार किया गया?
जन गण मन को 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने भारत का राष्ट्रगान स्वीकार किया। इसे पहली बार 27 दिसंबर 1911 को कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। गाने का निर्धारित समय 52 सेकंड है।
Q8. क्या ठाकुर की रचनाएँ कॉपीराइट में हैं?
उनकी मूल रचनाएँ अब सार्वजनिक डोमेन में हैं। उन्होंने 1907 में कॉपीराइट विश्व-भारती को दिया था और वह अवधि दिसंबर 2001 में समाप्त हो गई। हालाँकि किसी आधुनिक अनुवादक का हिंदी अनुवाद उस अनुवादक की अपनी कृति है और उस पर अलग कॉपीराइट लागू होता है।
Q9. रवींद्र संगीत क्या है?
रवींद्र संगीत ठाकुर के लिखे और संगीतबद्ध किए गीतों को कहते हैं, जिनकी संख्या लगभग 2,230 है। ये बंगाली संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं और इनमें प्रेम, प्रकृति, भक्ति और देशप्रेम सभी विषय आते हैं। बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी इन्हीं में से एक है।
Q10. ठाकुर ने शांतिनिकेतन की स्थापना कब की?
उन्होंने 1901 में शांतिनिकेतन में एक प्रायोगिक विद्यालय शुरू किया था, जो 1921 में विश्व-भारती विश्वविद्यालय बना। 1951 में इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय घोषित किया गया। यहाँ की शिक्षा-पद्धति में खुली हवा में पढ़ाई और प्रकृति से जुड़ाव पर ज़ोर था।
Q11. ठाकुर भक्तिकाल के कवि हैं या आधुनिक काल के?
वे आधुनिक काल के कवि हैं, भक्तिकाल के नहीं। उनकी कविताओं में ईश्वर आते हैं, पर वे समर्पण के बजाय संवाद के भाव में हैं। वे संसार छोड़ने के नहीं, संसार में रहकर ईश्वर पाने के पक्षधर थे।
Q12. क्या मैं भी अपनी कविता ऑनलाइन प्रकाशित कर सकता हूँ?
हाँ, ख़ुद की कलम के कविता प्लेटफ़ॉर्म पर कोई भी लेखक मुफ़्त में अपनी कविता, गीत या शायरी प्रकाशित कर सकता है। अगर आप अपनी रचनाओं की किताब छपवाना चाहते हैं तो प्रकाशन सेवा ₹9,999 से शुरू होती है।
निष्कर्ष
रवीन्द्रनाथ ठाकुर को पढ़ते समय एक बात याद रखिए - उनकी कविता में ईश्वर, प्रेमी और देश अक्सर एक ही संबोधन में घुल जाते हैं। "तुम" किसे कहा जा रहा है, यह जानबूझकर खुला छोड़ा गया है। यही अस्पष्टता उनकी सबसे बड़ी ताक़त है।
इस पेज पर दी गई 18 रचनाएँ शुरुआत के लिए काफ़ी हैं। आगे बढ़ना हो तो पूरी गीतांजलि पढ़िए, और हो सके तो ठाकुर का अपना अंग्रेज़ी अनुवाद भी देखिए। किसी और की कविता के इतने क़रीब पहुँचने का दूसरा रास्ता नहीं है।
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ठाकुर ने अपनी मातृभाषा में लिखा, उस दौर में जब बड़ा लेखक होने का मतलब अंग्रेज़ी में लिखना समझा जाता था। और वही भाषा उन्हें नोबेल तक ले गई।
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